भोलेनाथ ने भक्तों को बचाने के लिए यहां किया ‌था चमत्कार, जानिए शिरगुल मंदिर का इतिहास

भोलेनाथ ने भक्तों को बचाने के लिए यहां किया ‌था चमत्कार, जानिए शिरगुल मंदिर का इतिहास

Shri Shirgul Maharaj

विशालकाय सांप से अपने भक्तों के बचाने के लिए भगवान शिव ने यहां अपना चमत्कार दिखाया था। यहां आज भी किसी देवी देवता की मूर्ति स्‍थापित नहीं है लेकिन इसके बावजूद यहां आने वाले भक्तों की सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं।

जानिए शिरगुल मंदिर का इतिहास, Shirgul Temple History - Himachali Roots , भोलेनाथ ने भक्तों को बचाने के लिए यहां किया ‌था चमत्कार, जानिए शिरगुल मंदिर का इतिहास

शिरगुल/ Shirgul मंदिर हिमाचल के जिला सिरमौर की सबसे ऊंची चोटी है। चूड़धार नाम से इस चोटी पर स्थित भगवान भोलेनाथ के दर्शन के लिए हर साल हजारों सैलानी यहां पहुंचते हैं। खूबसूरत वादियों से होकर गुजरने वाली यह यात्रा सदियों से चली आ रही है। कहते हैं एक बार भगवान शिव ने यहां अपना चमत्कार दिखाया था।

 

कहते एक बार चुरु नाम का शिवभक्त यहां मंदिर आया। इसी बीच अचानक बड़े बड़े पत्‍थरों के बीच से एक विशालकाय सांप बाहर आ गया। {you are reading this Shirgul story at www.himachali.in} यह चुरु और उसके बेटे को मारने दौड़ा। वहीं, बाप बेटे ने भागने की कोशिश की लेकिन सांप से नहीं बच पाए। फिर इन्होंने भगवान शिव से रक्षा की प्रार्थना की।

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भगवान भोलेनाथ ने चमत्कार से विशालकाय पत्‍थर का एक हिस्सा सांप पर जा गिरा जिससे वह वहीं मर गया। इसके बाद शिवभक्त यहां से घर चले गए। कहते हैं उसके बाद से ही यहां का नाम चूड़धार पड़ा। लोगों की श्रद्घा इस शिरगुल मंदिर के लिए बढ़ गई और यहां के लिए धार्मिक यात्राएं शुरू हो गई।

 

यह भी माना जाता है कि इसी चोटी के साथ लगते क्षेत्र में हनुमान को संजीवनी बूटी मिली थी। हर साल गर्मियों के दिनों में चूड़धार की यात्रा शुरू होती है। बरसात और सर्दियों में यहां जमकर बर्फबारी होती है जिससे यह चोटी बर्फ से ढक जाती है।{you are reading this Shirgul story at www.himachali.in} यह चोटी ट्रेकिंग के नजरिए से बेहद उपयुक्त है। खूबसूरत वादियों के बीच पैदल सफर का अपना ही मजा है।


Another Story In English:-

Churdhar Sanctuary is named after the Churdhar peak, which has an elevation of 3647 metres above sea level and is located in Sirmour, Shimla district of the indian state of Himachal Pradesh. Churdhar peak is the highest peak in Sirmour district and is also the highest peak in the outer Himalayas.

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The peak has a great religious significance for the people of Sirmour, Shimla, Chaupal and Solan of Himachal Pradesh and Dehradun of Uttrakhand. Churdhar is a holy place related with Shri Shirgul Maharaj also know as Chureshwar Maharaj, a deity widely worshipped in Sirmour and Chaupal. The major god of area is Lord Shirgul Maharaj. Many gods goes their for religious pilgrim and bath at the holy temple of lord shirgul.

 

History of the Churdhar Shiv Temple:

Shirgul Devta and Bijjat Maharaj are centuries old deit ies of Himachal situated at Churdhar in Sirmaur. Both deities had a centuries old fight but now after 1, 500 year, both the deities are ready to end their fight and they will meet each other very soon at a joint jagaran in the region. People of two panchayats are associated with these deities. {you are reading this Shirgul story at www.himachali.in} Chadhna and Devmanal panchayats are the two panchayats where people couldn’t organise fairs and festivals together due to the fight between their deities. But, now they will come together for a jagaran, local people informed.

 

They stated that once both the deities shared a great relationship with each other which was known as shata-pasha. But due to a fight they did not talk to each other or not even met in local fairs.{you are reading this Shirgul story at www.himachali.in} But now the deities have ordered the local people to stop the fight and organise a deity fair where they will meet each other. It was decided in a joint meeting of both the panchayats, where panchayat pradhan and other members of the villages were present.


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ये चमत्कारी पत्थर दोनों हाथों से नहीं हिलता लेकिन सबसे छोटी अकेली ऊँगली से हिल जाता है , Magical Stone Simsa Mata Temple Himachal Pradesh

हिमाचल में यहाँ है ये चमत्कारी पत्थर

आजकल विज्ञान काफी आगे पहुंच चुका है और इसी के दम पर नामुमकिन बात भी मुमकिन लगने लगी है। लेकिन विज्ञान के बावजूद भी इस दुनिया में कई जगह और कई ऐसी बाते है जिनके बारें में सुनकर आज भी आश्चर्य होता है। वैसे अगर बात भारत की करें, तो आज भी भारत में आए दिन कोई ना कोई चमत्कार सुनने को मिलते ही रहते हैं। अजब-गजब किस्से भी सुनने को मिलते ही रहते हैं।

 

एक पत्थर जो हिलता है एक उंगली से, सुनकर थोडा अजीब लग रहा है ना लेकिन यह सत्य है

Magical Stone Simsa Mata Temple Himachal Pradesh , ये चमत्कारी पत्थर दोनों हाथों से नहीं हिलता लेकिन सबसे छोटी अकेली ऊँगली से हिल जाता है

 

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बिजली महादेव कुल्लू -हर बारह साल में शिवलिंग पर गिरती है बिजली

बिजली महादेव - कुल्लू -हर बारह साल में शिवलिंग पर गिरती है बिजली , Bijali Mahadev temple kullu himachal pradesh

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पूरी कुल्लू घाटी में ऐसी मान्यता है कि यह घाटी एक विशालकाय सांप का रूप है। इस सांप का वध भगवान शिव ने किया था। जिस स्थान पर बिजली महादेव  मंदिर है वहां शिवलिंग पर हर बारह साल में भयंकर आकाशीय बिजली गिरती है। बिजली गिरने से मंदिर का शिवलिंग खंडित हो जाता है। यहां के पुजारी खंडित शिवलिंग के टुकड़े एकत्रित कर मक्खन के साथ इसे जोड़ देते हैं। कुछ ही माह बाद शिवलिंग एक ठोस रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इस शिवलिंग पर हर बारह साल में बिजली क्यों गिरती है और इस जगह का नाम कुल्लू कैसे पड़ा इसके पीछे एक पौराणिक कथा है जो इस प्रकार है।

रहता था कुलान्त राक्षस

कुल्लू घाटी के लोग बताते हैं कि बहुत पहले यहां कुलान्त नामक दैत्य रहता था। दैत्य कुल्लू के पास की नागणधार से अजगर का रूप धारण कर मंडी की घोग्घरधार से होता हुआ लाहौल स्पीति से मथाण गांव आ गया। दैत्य रूपी अजगर कुण्डली मार कर ब्यास नदी के प्रवाह को रोक कर इस जगह को पानी में डुबोना चाहता था। इसके पीछे उसका उद्देश्य यह था कि यहां रहने वाले सभी जीवजंतु पानी में डूब कर मर जाएंगे। भगवान शिव कुलान्त के इस विचार से से चिंतित हो गए।

अजगर के कान में धीरे से बोले भगवान शिव

बड़े जतन के बाद भगवान शिव ने उस राक्षस रूपी अजगर को अपने विश्वास में लिया। शिव ने उसके कान में कहा कि तुम्हारी पूंछ में आग लग गई है। इतना सुनते ही जैसे ही कुलान्त पीछे मुड़ा तभी शिव ने कुलान्त के सिर पर त्रिशूल वार कर दिया। त्रिशूल के प्रहार से कुलान्त मारा गया। कुलान्त के मरते ही उसका शरीर एक विशाल पर्वत में बदल गया। उसका शरीर धरती के जितने हिस्से में फैला हुआ था वह पूरा की पूरा क्षेत्र पर्वत में बदल गया। कुल्लू घाटी का बिजली महादेव से रोहतांग दर्रा और उधर मंडी के घोग्घरधार तक की घाटी कुलान्त के शरीर से निर्मित मानी जाती है। कुलान्त से ही कुलूत और इसके बाद कुल्लू नाम के पीछे यही किवदंती कही जाती है।

भगवान शिव ने इंद्र से कहा था इस स्थान पर गिराएं बिजली

कुलान्त दैत्य के मारने के बाद शिव ने इंद्र से कहा कि वे बारह साल में एक बार इस जगह पर बिजली गिराया करें। हर बारहवें साल में यहां आकाशीय बिजली गिरती है। इस बिजली से शिवलिंग चकनाचूर हो जाता है। शिवलिंग के टुकड़े इकट्ठा करके शिवजी का पुजारी मक्खन से जोड़कर स्थापित कर लेता है। कुछ समय बाद पिंडी अपने पुराने स्वरूप में आ जाती है।

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बिजली शिवलिंग पर ही क्यों गिरती है

आकाशीय बिजली बिजली शिवलिंग पर गिरने के बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव नहीं चाहते चाहते थे कि जब बिजली गिरे तो जन धन को इससे नुकसान पहुंचे। भोलेनाथ लोगों को बचाने के लिए इस बिजली को अपने ऊपर गिरवाते हैं। इसी वजह से भगवान शिव को यहां बिजली महादेव कहा जाता है। भादों के महीने में यहां मेला-सा लगा रहता है। कुल्लू शहर से बिजली महादेव की पहाड़ी लगभग सात किलोमीटर है। शिवरात्रि पर भी यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

सर्दियों में भारी बर्फबारी

यह जगह समुद्र स्तर 2450 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। शीत काल में यहां भारी बर्फबारी होती है। कुल्लू में भी महादेव प्रिय देवता हैं। कहीं वे सयाली महादेव हैं तो कहीं ब्राणी महादेव। कहीं वे जुवाणी महादेव हैं तो कहीं बिजली महादेव।

बिजली महादेव - कुल्लू -हर बारह साल में शिवलिंग पर गिरती है बिजली , Bijali Mahadev temple kullu himachal pradesh

बिजली महादेव का अपना ही महात्म्य व इतिहास है। ऐसा लगता है कि बिजली महादेव के इर्द-गिर्द समूचा कुल्लू का इतिहास घूमता है। हर मौसम में दूर-दूर से लोग बिजली महादेव के दर्शन करने आते हैं।

 


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हत्यादेवी :हिमाचल में यह रहस्यमयी मंदिर साल में सिर्फ एक बार ही खुलता है, पुरोहित की एक गलती से यहां हत्यादेवी बन गई थी राजकुमारी.

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हिमाचल के ममलेश्वर महादेव मंदिर में है 5 हजार साल पुराना भीम का ढोल और 200 ग्राम का गेंहू का दाना

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Mamleshwar Mahadev Temple History : क्या आपने कभी 200 ग्राम वजन का गेंहूं का दाना देखा है वो भी महाभारत काल का यानी की 5000 साल पुराना? यदि नहीं तो आप इसे स्वयं अपनी आँखों से देख सकते है , इसके लिए आपको जाना पड़ेगा ममलेश्वर महादेव मंदिर जो की हिमाचल प्रदेश की करसोगा घाटी के ममेल गांव में स्तिथ है।

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हिमाचल प्रदेश जिसे की देव भूमि भी कहा,  के प्रत्येक कोने में कोई न कोई प्राचीन मंदिर स्तिथ है।  उनी में से एक है ममलेश्वर महादेव मंदिर जो की भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस मंदिर का संबंध पांडवो से भी है क्योकि पांडवो ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इसी गाँव में बिताया था।

ममलेश्वर महादेव मंदिर – यहां है 200 ग्राम वजनी गेहूं का दाना – पांडवों से है संबंध , हिमाचल के ममलेश्वर महादेव मंदिर में है 5 हजार साल पुराना भीम का ढोल और 200 ग्राम का गेंहू का दाना , mamleshwar mahadev temple karsog , mamleshwar temple himachal pradesh , महाभारत कालीन 200 ग्राम वजनी गेंहूं का दाना
ममलेश्वर महादेव : महाभारत कालीन 200 ग्राम वजनी गेंहूं का दाना

 

भीम ने यहां मारा था एक राक्षस को :

 

इस मंदिर में एक धुना है जिसके बारे में मान्यता है की ये महाभारत काल से निरंतर जल रहा है। इस अखंड धुनें के पीछे एक कहानी है की जब पांडव अज्ञातवास में घूम रहे थे तो वे कुछ समय के लिए इस गाँव में रूके । तब इस गांव में एक राक्षस ने एक गुफा में डेरा जमाया हुआ था । उस राक्षस के प्रकोप से बचने के लिये लोगो ने उस राक्षस के साथ एक समझौता किया हुआ था कि वो रोज एक आदमी को खुद उसके पास भेजेंगें उसके भोजन के लिये जिससे कि वो सारे गांव को एक साथ ना मारे ।

 

एक दिन उस घर के लडके का नम्बर आया जिसमें पांडव रूके हुए थे । उस लडके की मां को रोता देख पांडवो ने कारण पूछा तो उसने बताया कि आज मुझे अपने बेटे को राक्षस के पास भेजना है । अतिथि के तौर पर अपना धर्म निभाने के लिये पांडवो में से भीम उस लडके की बजाय खुद उस राक्षस के पास गया । भीम जब उस राक्षस के पास गया तो उन दोनो में भयंकर युद्ध हुआ और भीम ने उस राक्षस को मारकर गांव को उससे मुक्ति दिलाई कहते है की भीम की इस विजय की याद में ही यह अखंड धुना चल रहा है।

 

ममलेश्वर महादेव मंदिर – यहां है 200 ग्राम वजनी गेहूं का दाना – पांडवों से है संबंध , हिमाचल के ममलेश्वर महादेव मंदिर में है 5 हजार साल पुराना भीम का ढोल और 200 ग्राम का गेंहू का दाना , mamleshwar mahadev temple karsog , mamleshwar temple himachal pradesh , महाभारत कालीन 200 ग्राम वजनी गेंहूं का दाना
ममलेश्वर महादेव : अखंड धुना

 

पांडवो से गहरा नाता :

जैसा की हमने ऊपर कहा की इस मंदिर का पांडवो से गहरा नाता है।  इस मंदिर में एक प्राचीन ढोल है जिसके बारे में कहा जाता है की ये भीम का ढोल है।  इसके अलावा मंदिर में स्थापित पांच शिवलिंगों के बारे में कहा जाता है की इसकी स्थापना स्वयं पांडवों ने की थी।

यह प्राचीन ढोल भीम का है ,mamleshwar mahadev temple karsog , mamleshwar temple himachal pradesh , महाभारत कालीन 200 ग्राम वजनी गेंहूं का दाना , अखंड धुना
ममलेश्वर महादेव : पांडवों द्वारा स्थापित शिवलिंग

और सबसे प्रमुख गेंहूँ का दाना है जिसे की पांडवों का बताया जाता है।  यह गेंहूँ का दाना पुजारी के पास रहता है। यदि आप मंदिर जाए और आपको यह देखना हो तो आपको इसके लिए पुजारी से कहना पड़ेगा। पुरात्तव विभाग भी इन सभी चीज़ों की अति प्राचीन होने की पुष्टि कर चूका है।

यह प्राचीन ढोल भीम का है ,mamleshwar mahadev temple karsog , mamleshwar temple himachal pradesh , महाभारत कालीन 200 ग्राम वजनी गेंहूं का दाना , अखंड धुना
ममलेश्वर महादेव : यह प्राचीन ढोल भीम का है

 

ममलेश्वर महादेव के पास ही एक मंदिर जिसमे दी जाती नर बलि :

 

ममलेश्वर महादेव मंदिर के पास एक प्राचीन विशाल मंदिर और है  जो की सदियों से बंद पड़ा है माना जाता है कि इस मंदिर में प्राचीन समय में भूडा यज्ञ किया जाता था जिसमे की नर बलि भी दी जाती थी। तब भी इस मंदिर में केवल पुजारीयो को ही प्रवेश की अनुमति थी। अब भी  इस मंदिर में केवल पुजारी वर्ग को ही जाने की आज्ञा है।

 


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जानिए कांगड़ा की माता ब्रजेश्वरी शक्तिपीठ धाम का इतिहास और क्यों है विशेष मान्यता?

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हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित ब्रजेश्वरी शक्तिपीठ मां का एक ऐसा धाम है, जहां पहुंचकर भक्तों का हर दुख-तकलीफ मां की एक झलक भर देखने से दूर हो जाते हैं। ब्रजेश्वरी देवी धाम 52 शक्तिपीठों में से मां की वह शक्तिपीठ जहां सती का दाहिना वक्ष गिरा था और जहां तीन धर्मों के प्रतीक के रूप में मां की तीन पिंडियों की पूजा होती है। पुराने समय में नगरकोट धाम से मशहूर अब कांगड़ा मां के शक्तिपीठों में से एक है।

 

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पौराणिक इतिहास 

कहते हैं कि जब मां सती ने पिता द्वारा किए गए शिव के अपमान से कुपित होकर अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए थे, तब क्रोधित शिव उनकी देह को लेकर पूरी सृष्टि में घूमे। शिव का क्रोध शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। शरीर के यह टुकड़े धरती पर जहां-जहां गिरे वह स्थान शक्तिपीठ कहलाए। मान्यता है कि यहां माता सती का दाहिना वक्ष गिरा था इसलिए यहां पर ब्रजेश्वरी धाम शक्तिपीठ में मां के वक्ष की पूजा होती है।

तीन धर्मों के प्रतीक में मां की तीन पिंडियों की होती है पूजा 

माता ब्रजेश्वरी का शक्तिपीठ अपने आप में अनूठा और विशेष भी है। यहां मात्र हिंदू भक्त ही शीश नहीं झुकाते बल्कि मुस्लिम और सिख धर्म के श्रद्धालु भी इस धाम में आकर आस्था के फूल चढ़ाते हैं। बज्रेश्वरी देवी मंदिर के तीन गुंबद इन तीन धर्मों के प्रतीक हैं। पहला हिंदू धर्म का प्रतीक है, जिसकी आकृति मंदिर जैसी है तो दूसरा मुस्लिम समाज का और तीसरा गुंबद सिख संप्रदाय का प्रतीक है।

 

तीन गुंबद वाले और तीन संप्रदायों की आस्था का केंद्र कहे जाने वाले माता के इस धाम में मां की पिडियां भी तीन ही हैं। मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित यह पहली और मुख्य पिंडी मां ब्रजेश्वरी की है। दूसरी मां भद्रकाली और तीसरी और सबसे छोटी पिंडी मां एकादशी की है। मां के इस शक्तिपीठ में ही उनके परम भक्त ध्यानु ने अपना शीश अर्पित किया था। इसलिए मां के वह भक्त जो ध्यानु के अनुयायी भी हैं, वह पीले रंग के वस्त्र धारण कर मंदिर में आते हैं और मां का दर्शन पूजन कर स्वयं को धन्य करते हैं।

पांच बार होती है मां की आरती

कहते हैं जो भी भक्त मन में सच्ची श्रद्धा लेकर मां के इस दरबार में पहुंचता है उसकी कोई भी मनोकामना अधूरी नहीं रहती। फिर चाहे मनचाहे जीवनसाथी की कामना हो या फिर संतान प्राप्ति की लालसा, मां अपने हर भक्त की मुराद पूरी करती हैं। मां के इस दरबार में पांच बार आरती का विधान है, जिसका गवाह बनने की ख्वाहिश हर भक्त के मन में होती है। सुबह मंदिर के कपाट खुलते ही सबसे पहले मां की शैय्या को उठाया जाता है। उसके बाद रात्रि शृंगार में ही मां की मंगला आरती की जाती है।

 

मंगला आरती के बाद मां का रात्रि शृंगार उतार कर उनकी तीनों पिंडियों का जल, दूध, दही, घी, और शहद के पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। इसके बाद पीले चंदन से मां का शृंगार कर उन्हें नए वस्त्र और सोने के आभूषण पहनाए जाते हैं। इसके बाद चना पूरी, फल और मेवे का भोग लगाकर संपन्न होती है मां की प्रात:कालीन आरती। यहां, दोपहर की आरती और भोग चढ़ाने की रस्म को गुप्त रखा जाता है। दोपहर की आरती के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं, तब श्रद्धालु मंदिर परिसर में ही बने एक विशेष स्थान पर अपने बच्चों का मुंडन करवाते हैं। मान्यता है कि यहां बच्चों का मुंडन करवाने से मां बच्चों के जीवन की समस्त आपदाओं को हर लेती हैं।

दोपहर बाद मंदिर के कपाट दोबारा भक्तों के लिए खोल दिए जाते हैं और भक्त मां का आशीर्वाद लेने पहुंच जाते हैं। कहते हैं एकादशी के दिन चावल का प्रयोग नहीं किया जाता है लेकिन इस शक्तिपीठ में मां एकादशी स्वयं मौजूद है इसलिए यहां भोग में चावल ही चढ़ाया जाता है। सूर्यास्त के बाद इन पिंडियों को स्नान कराकर पंचामृत से इनका दोबारा अभिषेक किया जाता है। लाल चंदन, फूल व नए वस्त्र पहनाकर मां का शृंगार किया जाता है। इसके साथ ही सायंकाल आरती संपन्न होती है। शाम की आरती का भोग भक्तों में प्रसाद रूप में बांटा जाता है। रात को मां की शयन आरती की जाती है, जब मंदिर के पुजारी मां की शैय्या तैयार कर मां की पूजा अर्चना करते हैं।

 

भगवान भैरव की मूर्ति में है विशेषता

मंदिर परिसर में ही भगवान भैरव का भी मंदिर है। इस मंदिर में महिलाओं का जाना वर्जित हैं। यहां विराजे भगवान भैरव की मूर्ति विशेष है। कहते हैं कि जब भी कांगड़ा पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो इस मूर्ति की आंखों से आंसू और शरीर से पसीना निकलने लगता है। तब मंदिर के पुजारी विशाल हवन का आयोजन कर मां से आने वाली आपदा को टालने का निवेदन करते हैं। यह ब्रजेश्वरी शक्तिपीठ का चमत्कार और महिमा ही है कि आने वाली हर आपदा मां के आशीष से टल जाती है।

 

कांगड़ा का इतिहास 

कांगड़ा नगर समुद्र तल से करीब 2350 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह नगर बाणगंगा व मांझी नदियों के बीच बसा हुआ है। दक्षिण में पुराना किला व उत्तर में ब्रजेश्वरी  देवी के मंदिर के सुनहरे कलश इस नगर के प्रधान चिह्न हैं। एक ओर पुराना कांगड़ा व दूसरी और पहले भवन अब (नया कांगड़ा) की नई बस्तियां हैं। कांगड़ा घाटी रेलवे व पठानकोट-कुल्लू और धर्मशाला-होशियारपुर सड़कों द्वारा यातायात की सुविधा प्राप्त है।

 

कांगड़ा पहले नगरकोट के नाम से प्रसिद्ध था। कहा जाता है कि इसे राजा सुसर्मा चंद ने महाभारत के युद्ध के बाद बसाया था। छठी शताब्दी में नगरकोट जालंधर व त्रिगर्त राज्य की राजधानी था। 18वीं शताब्दी में राजा संसार चंद कटोच के राज्यकाल में यहां पर कला कौशल का बोलबाला था। कांगड़ा कलम विश्वविख्यात है और चित्रशैली में अनुपम स्थान रखती है। कांगड़ा किले, मंदिर, बासमती चावल व कटी नाक की पुन: व्यवस्था और नेत्र चिकित्सा के लिए दूर-दूर तक विख्यात था।

 

ब्रजेश्वरी देवी मंदिर

ब्रजेश्वरी मंदिर इस क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय मंदिर है। कहा जाता है पहले यह मंदिर बहुत समृद्ध था। इस मंदिर को बहुत बार विदेशी लुटेरों द्वारा लूटा गया। महमूद गजनवी ने 1009 ई. में इस शहर को लूटा और मंदिर को नष्ट कर दिया था। यह मंदिर वर्ष 1905 में जोरदार भूकंप से पूरी तरह नष्ट हो गया था। 1920 में इसे दोबारा बनवाया गया।

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कैसे पहुंचें ब्रजेश्वरी  देवी मंदिर

-वायु मार्ग : कांगडा से सात किलोमीटर की दूरी पर एयरपोर्ट है जो सीधी दिल्ली से जुड़ा हुआ है।
-रेल मार्ग : पठानकोट कांगडा का निकटतम ब्रॉड गेज रेल मुख्यालय है। पठानकोट-कांगडा से लगभग 90 किलोमीटर पर है।
-पठानकोट से जोगेंद्रनगर नैरोगेज रेल ट्रैक पर कांगड़ा मंदिर और कांगड़ा रेलवे स्टेशन हैं।
-सड़क : कांगड़ा सड़क से धर्मशाला से जुड़ा है जो 18 किलोमीटर दूर है। धर्मशाला हिमाचल और निकटवर्ती शहरों से जुड़ा हुआ है।

 


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शिकारी देवी का यह मंदिर करसोग , जनजेलही घाटी में एक उच्चे शिखर पर 11000 फ़ीट की उचाई में स्थित है. मगर सबसे हैरत वाली बात ये  कि मंदिर पर छत नहीं लग पाई। कहा जाता है कि कई बार मंदिर पर छत लगवाने काम शुरू किया गया। लेकिन हर बार….Read More!

 

हत्यादेवी :हिमाचल में यह रहस्यमयी मंदिर साल में सिर्फ एक बार ही खुलता है, पुरोहित की एक गलती से यहां हत्यादेवी बन गई थी राजकुमारी.

हिमालय की गोद में बसे इस मंदिर का यह रहस्यमयी कक्ष साल में सिर्फ एक दिन के लिए ही खुलता है। यहां राजकुमारी के साथ कुछ ऐसा हुआ था कि वह हत्यादेवी बन गई थी। हत्यादेवी की एक गांव पर असीम कृपा है जबकि एक गांव के लोग यहां जाने से भी डरते हैं। आइए जानते हैं पूरी कहानी…Read More!

आज हम आपको पहाड़ों पर बसे देवी भीमाकाली मंदिर की परंपरा शक्ति और इतिहास से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं

भीमाकाली मंदिर के साथ अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं जिनके अनुसार आदिकाल मंदिर के स्वरूप का वर्णन करना कठिन है परंतु पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि वर्तमान भीमाकाली मंदिर सातवीं-आठवीं शताब्दी के बीच बना है। भीमाकाली शिवजी की अनेक मानस पुत्रियों में से एक है। मत्स्य पुराण में भीमा नाम की एक मूर्ति का उल्लेख आता है।….Read More!

जानिए क्या है बाबा बालकनाथ जी एवं इनके पूजनीय स्थल दयोटसिद्ध से जुड़ा इतिहास और क्यों है विशेष मान्यता?

बाबा बालकनाथ जी की कहानी बाबा बालकनाथ अमर कथा में पढ़ी जा सकती है, ऐसी मान्यता है, कि बाबाजी का जन्म सभी युगों में हुआ जैसे कि सत्य युग,त्रेता युग,द्वापर युग और वर्तमान में कल युग और हर एक युग में उनको अलग-अलग नाम से जाना गया जैसे “सत युग” में “ स्कन्द ”, “ त्रेता युग” में “ कौल” और “ द्वापर युग” में “महाकौल” के नाम से जाने गये। अपने हर अवतार में उन्होंने गरीबों एवं निस्सहायों की सहायता करके उनके दुख दर्द और तकलीफों का नाश किया।…..Read More!

शायद इससे आप वाकिफ न हो, आज हम आपको हिडिंबा देवी के मंदिर के इतिहास से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश— के कुल्‍लू में मनाली में स्थित हिडिंबा देवी का मंदिर है। इसका इतिहास पांडवों से जुड़ा हुआ है। शायद इससे आप वाकिफ न हो। आपको इसी मंदिर के इतिहास आज हम रू-ब-रू कराने जा रहे हैं। आप जानते हैं कि जुए में सब कुछ हारने पर धृतराष्ट्र व दुर्योधन ने पाण्डवों को वारणावत नाम स्थान में भेज दिया था। यहां उन्हें जीवित जला देने की योजना बनाई गई थी। पाण्डवों के रहने के लिए पूरा महल लाख का बनाया गया था जो जरा सी आग लगते ही जल उठे। पाण्डवों का इस साजिश का पता चल गया और उन्होंने रात को भीतर ही भीतर एक सुरंग खोद डाली….Read More!

 

 


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जानिए क्या है चौरासी मंदिर का रहस्य, ऐसा एक मंदिर जहां मरने के बाद सबसे पहले पहुंचती है आत्मा

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Chaurasi Temple History & Facts

चौरासी मंदिर जहां मरने के बाद सबसे पहले पहुंचती है आत्मा” एक मंदिर ऐसा है जहां मरने के बाद हर किसी को जाना ही पड़ता है चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक। यह मंदिर किसी और दुनिया में नहीं बल्कि भारत की जमीन पर स्थित है।{You are reading Chaurasi Temple History & Facts on www.himachali.in} देश की राजधानी दिल्ली से करीब 500 किलोमीटर की दूरी पर हिमाचल के चम्बा जिले में भरमौर नामक स्थान में स्थित इस मंदिर के बारे में कुछ बड़ी अनोखी मान्यताएं प्रचलित हैं।

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यहां पर एक ऐसा मंदिर है जो घर की तरह दिखाई देता है। इस मंदिर के पास पहुंच कर भी बहुत से लोग मंदिर में प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। बहुत से लोग मंदिर को बाहर से प्रणाम करके चले आते हैं। इसका कारण यह है कि, इस मंदिर में धर्मराज यानी यमराज रहते हैं। संसार में यह इकलौता मंदिर है जो धर्मराज को समर्पित है। इस मंदिर में एक खाली कमरा है जिसे चित्रगुप्त का कमरा माना जाता है।

 

चित्रगुप्त यमराज के सचिव हैं जो जीवात्मा के कर्मो का लेखा-जोखा रखते हैं। मान्यता है कि जब किसी प्राणी की मृत्यु होती है तब यमराज के दूत उस व्यक्ति की आत्मा को पकड़कर सबसे पहले इस मंदिर में चित्रगुप्त के सामने प्रस्तुत करते हैं।{You are reading Chaurasi Temple History & Facts on www.himachali.in} चित्रगुप्त जीवात्मा को उनके कर्मो का पूरा ब्योरा देते हैं इसके बाद चित्रगुप्त के सामने के कक्ष में आत्मा को ले जाया जाता है।

 

इस कमरे को यमराज की कचहरी कहा जाता है। कहा जाता है कि यहां पर यमराज कर्मों के अनुसार आत्मा को अपना फैसला सुनाते हैं। यह भी मान्यता है इस मंदिर में चार अदृश्य द्वार हैं जो स्वर्ण, रजत, तांबा और लोहे के बने हैं। यमराज का फैसला आने के बाद यमदूत आत्मा को कर्मों के अनुसार इन्हीं द्वारों से स्वर्ग या नर्क में ले जाते हैं। गरूड़ पुराण में भी यमराज के दरबार में चार दिशाओं में चार द्वार का उल्लेख किया गया है।

 

Credits:- Vicky Thakur 

Click Here To Reach Author Of This Post On Facebook :- Vicky Thakur


A-Z Information Of Chaurasi Temple

Chaurasi Temple is located in the center of Bharmour town and it holds immense religious importance because of temples built around 1400 years ago. Life of people in Bharmour centres around the temple complex-Chaurasi, named so because of 84 shrines built in the periphery of Chaurasi Temple. Chaurasi is hindi word for number eighty four.

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The beautiful shikhara style temple of Manimahesh occupies the center of the complex. It is believed that when 84 Siddhas, who had come from kurukshetra, were passing through Bharmour to visit Manimahesh, they fell in love with the calmness of Bharmour and reconciled to meditate here.{You are reading Chaurasi Temple History & Facts on www.himachali.in} Chaurasi Temple Complex was built approximately in 7th century, although repairs of many temples have been carried out in later period.

 

There is another legend associated with Chaurasi temple complex. It is believed that shortly after Sahil Varman’s accession of Brahampura (ancient name of Bharmour), 84 yogis visited this place. They were greatly pleased with the King’s hospitality.{You are reading Chaurasi Temple History & Facts on www.himachali.in} As King had no heir, Yogis promised him ten sons. They were requested by the King to stay back in Brahampura till the prediction of Yogis was fulfilled.

 

In due course of time the king was blessed with ten sons and a daughter. Daughter was named Champavati and because of liking of Champavati new capital Chamba was established. It is believed that Chaurasi temple complex in Bharmour was built to honour these 84 Yogis and named Chaurasi after them. There are 84 big and small temples in Chaurasi temple complex.

 

Chaurasi is a spacious level ground in center of Bharmour where the galaxy of temples mostly in the form of Shivlingas exists. The Chaurasi Temple Complex offers a delightful, clean and a scenic view.

 

Major temples at Chaurasi temple complex

Ganesha Temple 
Lakshana devi (Lakhna devi) Temple
Swami Kartik (kelang) Temple
Manimahesh temple (Lord Shiva)
Maa Chamunda Temple
Hanuman Temple
Maa Sheetla Temple
Dharameshwar Mahadev temple 
Nandi temple
Jai krishan Giriji temple
Nar Singh temple
Ardh Ganga or Ardh Gaya
Trameshwar Mahadev
Surya linga Mahadev Kuber Linga Mahadev

Best Time To Visit

The weather in Bharmour is pleasant and ideal for people who are looking for a respite from hot and sultry weather.

  • Summer (April- June) is pleasant and temperature varies from 17oC-38oC.
  • Winter (November-February) is cold and temperature can range from 0oC-15oC.
  • Rainy season (July- September) is moderate and temperature can range about 16oC-30oC.

The best time to visit is between May and October when you can enjoy pleasant weather and beauty of nature.

Hotels Near Chaurasi Temple

Bharmour View Hotel

Bharmour View Hotel is located strategically at a distance of 50m from the bus stand. At the same time, it is close to Chaurasi temple. Tourists visiting the hotel have a comfortable stay because the rooms are well furnished and provided with all basic facilities at affordable prices.

Chourasi Hotel

This hotel is situated in the lap of nature and offers a great scenic view.{You are reading Chaurasi Temple History & Facts on www.himachali.in} It is close to Chourasi temple and also provides affordable and comfortable rooms with all basic amenities.

Hotel Ashiana Regency (Chamba)

This hotel is located in Jhulakhiriand and it offers room bookings online at affordable rates. The hotel is centrally located and provides comfortable rooms with all major amenities.

How To Reach Chaurasi Temple

Air Route

The nearest airport is at Gaggal which is 180 km from Bharmour. The airport can be reached either by renting a taxi or a bus from Bharmour bus stand.

Train Route

The nearest railway station is at Pathankot (Punjab), which lies 168 km from Bharmour. This distance takes about 3 hours by road.



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काठगढ़ महादेव, यहां है अदभुत आधा शिव आधा पार्वती रूप शिवलिंग, दो भागों का शिवरात्रि पर हो जाता है ‘मिलन’

kathgarh Mahadev temple kangra himachal pradesh, lord shiva and parvati , lord vishnu , lord brahma , काठगढ़ महादेव : कांगड़ा जिले में है अदभुत शिवलिंग, दो भागों का शिवरात्रि पर हो जाता है मिलन- Himachali Roots ,काठगढ़ महादेव,  अर्धनारीश्वर अदभुत: शिवलिंग धार्मिक दृष्टि से पूरा संसार ही शिव का रूप है। इसलिए शिव के अलग-अलग अद्भुत स्वरूपों के मंदिर और देवालय हर जगह पाए जाते हैं। ऐसा ही एक मंदिर स्थित है – हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित काठगढ़ महादेव । इस मंदिर का शिवलिंग ऐसे स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है, जो संभवत: किसी अन्य शिव मंदिर में नहीं दिखाई देता। काठगढ़ महादेव संसार में एकमात्र शिवलिंग माने जाते हैं, जो आधा शंकर और आधा पार्वती का रूप लिए हुए हैं, यानि एक शिवलिंग में दो भाग हैं। शिव और शक्ति के अर्द्धनारीश्वर स्वरुप श्री संगम के दर्शन से मानव जीवन में आने वाले सभी पारिवारिक और मानसिक दु:खों का अंत हो जाता है।

काठगढ़ महादेव,  अर्धनारीश्वर अदभुत: शिवलिंग

 

धार्मिक दृष्टि से पूरा संसार ही शिव का रूप है। इसलिए शिव के अलग-अलग अद्भुत स्वरूपों के मंदिर और देवालय हर जगह पाए जाते हैं। ऐसा ही एक मंदिर स्थित है – हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित काठगढ़ महादेव । इस मंदिर का शिवलिंग ऐसे स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है, जो संभवत: किसी अन्य शिव मंदिर में नहीं दिखाई देता।  काठगढ़ महादेव  संसार में एकमात्र शिवलिंग माने जाते हैं, जो आधा शंकर और आधा पार्वती का रूप लिए हुए हैं, यानि एक शिवलिंग में दो भाग हैं। शिव और शक्ति के अर्द्धनारीश्वर स्वरुप श्री संगम के दर्शन से मानव जीवन में आने वाले सभी पारिवारिक और मानसिक दु:खों का अंत हो जाता है।

 

काठगढ़ महादेव का अर्धनारीश्वर रूप, अदभुत: शिवलिंग के दो भागों का शिवरात्रि पर हो जाता है ‘मिलन’

 

ईशान संहिता के अनुसार इस शिवलिंग का प्रादुर्भाव फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि को हुआ था। यह पावन शिवलिंग अष्टकोणीय है तथा काले-भूरे रंग का है। लगभग 7-8 फुट ऊंचा भगवान शिव आशुतोष का प्रतिमा स्वरूप व लगभग 6-7 फुट ऊंचा इसी के साथ सटा हुआ माता पार्वती का प्रतिमा स्वरूप विराजमान है।

 

दो भागों में विभाजित आदि शिवलिंग का अंतर ग्रहों एवं नक्षत्रों के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है और शिवरात्रि पर दोनों का ‘मिलन’ हो जाता है। शिवरात्रि के अवसर पर हर साल यहां पर तीन दिवसीय भारी मेला लगता है। इस दिन भगवान शिव की शादी माता पार्वती के साथ हुई थी। उनकी शादी का उत्सव मनाने के लिए रात में शिव जी की बारात निकाली जाती है। रात में पूजा कर फलाहार किया जाता है। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेल पत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।

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शिव पुराण में वर्णित काठगढ़ महादेव कथा

काठगढ़ महादेव मंदिर के दक्षिण में ब्यास नदी है। इस धर्मस्थल से दो नदियों का मिलन स्थान है। इस मंदिर के साथ कई पौराणिक किंवदंतियां जुड़ी हुई है। लोगों के कथनानुसार मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू प्रकट है। कहा जाता है कि व्यास नदी के किनारे स्थित इस मंदिर के बारे में शिव पुराण में भी व्याख्या मिलती है। ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच श्रेष्ठता का विवाद उत्पन्न हो गया और दोनों महेश्वर और पाशुपात अस्त्रों जैसे दिव्यास्त्र लेकर युद्ध हेतु उन्मुख हो उठे।

 

इससे तीनों लोकों में नाश की आशंका होने लगी और भगवान शिव शंकर महाअग्नि तुल्य स्तंभ के रूप में ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच में प्रकट हो गए। इससे दोनों देवताओं के दिव्यास्त्र स्वत: ही शांत हो गए और युद्ध खत्म हो गया। यही अग्नि तुल्य स्तंभ, काठगढ़ महादेव  के रूप में जाना जाने लगा।

 

कहा जाता है कि त्रेता युग में जब महाराज दशरथ की शादी हुई थी तो उनकी बारात पानी पीने के लिए यहां रुकी थी और यहां एक कुएं का निर्माण किया गया था। यह कुआं आज भी यहां स्थापित हैं। जब भी भरत व शत्रुघ्न अपने ननिहाल कैकेय देश (वर्तमान कश्मीर) जाते थे तो वे व्यास नदी के पवित्र जल से स्नान करके राजपुरोहित व मंत्रियों सहित यहां स्थापित शिवलिंग की पूजा-अर्चना कर आगे बढ़ते थे।

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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि काठगढ़ महादेव

 

एक किंवदंती में कहा गया है कि सिकंदर महान का विजयी अभियान यहीं आकर रुका था। विश्वविजेता सिकंदर ईसा से 326 वर्ष पूर्व जब पंजाब पहुंचा, तो प्रवेश से पूर्व मीरथल नामक गांव में अपने सैनिकों को खुले मैदान में विश्राम की सलाह दी। इस स्थान पर उसने देखा कि एक फ़कीर शिवलिंग की पूजा में व्यस्त था। उसने फ़कीर से कहा- ‘आप मेरे साथ यूनान चलें। मैं आपको दुनिया का हर ऐश्वर्य दूंगा।’ फ़कीर ने सिकंदर की बात को अनसुना करते हुए कहा- ‘आप थोड़ा पीछे हट जाएं और सूर्य का प्रकाश मेरे तक आने दें।

फ़कीर की इस बात से प्रभावित होकर सिकंदर ने भोले नाथ के इस अलौकिक स्वरूप की पूजा-अर्चना की और यहां यूनानी सभ्यता की पहचान छोड़ते हुए शिवलिंग के चारों ओर अष्टकोणिय चबूतरों का निर्माण करवाया था। शिवालय की ऐतिहासिक चारदीवारी में यूनानी शिल्पकला का प्रतीक व प्रमाण आज भी मौजूद हैं।

रणजीत सिंह ने किया पुनरुद्धार

 

बताया जाता है कि इस मंदिर ने महाराजा रणजीत सिंह के कार्यकाल में सबसे ज्यादा प्रसिद्धि प्राप्त की थी। कहते हैं, महाराजा रणजीत सिंह ने जब गद्दी संभाली, तो पूरे राज्य के धार्मिक स्थलों का भ्रमण किया।

 

वह जब काठगढ़ पहुंचे, तो इतना आनंदित हुए कि उन्होंने आदि शिवलिंग पर सुंदर मंदिर का निर्माण करवाया और शिवलिंग की इस महिमा का गुणगान भी चारों ओर करवाया। मंदिर के पास ही बने एक कुएं का जल उन्हें इतना पसंद था कि वह हर शुभकार्य के लिए यहीं से जल मंगवाते थे।


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कामरू नाग :हिमाचल की एक झील जिसमें गड़ा है अरबों का खजाना

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आज हम आपको एक ऐसी झील के बारे में बताने जा रहे है जिसके बारे में कहा जाता है की उसमे अरबों रुपए का खजाना दफन है यह है हिमाचल प्रदेश  के पहाड़ो में स्थित कामरू नाग / कमरुनाग झील। यह झील हरे भरे देवदार के पेड़ो से घिरी हुई है जो मंडी कारासेग मार्ग पर स्थित है। इस झील से बाल्‍ह घाटी का सुंदर व्‍यू दिखता है। सर्दियों के दिनों में यह झील पूरी तरह से बर्फ के रूप में जम जाती है।

कामरू नाग :हिमाचल की एक झील, जिसमें गड़ा है अरबों का खजाना ,kamrunag lake and temple , mystical-kamrunag-lake-in-himachal-pradesh , kamrunag mandi himachal pradesh , आज हम आपको एक ऐसी झील के बारे में बताने जा रहे है जिसके बारे में कहा जाता है की उसमे अरबो रुपए का खजाना दफन है यह है हिमाचल प्रदेश  के पहाड़ो में स्थित कामरू नाग / कमरुनाग झील। यह झील हरे भरे देवदार के पेड़ो से घिरी हुई है जो मंडी कारासेग मार्ग पर स्थित है। इस झील से बाल्‍ह घाटी का सुंदर व्‍यू दिखता है। सर्दियों के दिनों में यह झील पूरी तरह से बर्फ के रूप में जम जाती है।

 

पुरे साल में 14 और 15 जून को यानी देसी महीने के हिसाब से एक तारीख और हिमाचली भाषा में साजा। गर्मियों के इन दो दिनों में बाबा कामरू नाग  / कमरुनाग पूरी दुनिया को दर्शन देते है। इसलिए लोगों का यहां जन सेलाव पहले ही उमड पड़ता है। क्योंकि बाबा घाटी के सबसे बड़े देवता हैं और हर मन्नत पुरी करते हैं। हिमाचल प्रदेश के मण्डी से लगभग 60 किलोमीटर दूर आता है रोहांडा, यहीं से पैदल यात्रा शुरु होती है। कठिन पहाड़ चड़कर घने जंगल से होकर गुजरना पड़ता है। इस तरह लगभग 8 किलोमीटर चलना पड़ता है।

 

मंदिर के पास ही एक झील है, जिसे कामरू नाग / कमरुनाग झील के नाम से जाना जाता है। यहां पर लगने वाले मेले में हर साल भक्तों की काफी भीड़ जुटती है और पुरानी मान्यताओं के अनुसार भक्त झील में सोने-चांदी के गहनें तथा पैसे डालते हैं। सदियों से चली आ रही इस परम्परा के आधार पर यह माना जाता है कि इस झील के गर्त में अरबों का खजाना दबा पड़ा है।

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पानी पर तैरते कुछ पैसे एवं आभूषण, इस झीक की सतह पे इसी तरह खरभों का खज़ाना है !

देव कामरू नाग / कमरुनाग को वर्षा का देव माना जाता है। एक मान्यता के अनुसार भगवान कमरुनाग को सोने-चांदी व पैसे चढ़ाने की प्राचीन मान्यता है। यहां जून में लगने वाले मेले के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा झील में सोने-चांदी के गहनों को अर्पित करते हुए देखा जा सकता है। स्थानीय लोगों की मानें तो सदियों से चली आ रही इस परंपरा के आधार पर यह माना जाता है कि झील के गर्त में काफी बड़ा खजाना दबा हुआ है। कमरुनाग में लोहड़ी पर भव्य पूजा का आयोजन किया जाता है।

 

कामरू नाग / कमरुनाग जी का जिक्र महाभारत में भी आता है। इन्हें बबरुभान जी के नाम से भी जाना जाता था। ये धरती के सबसे शक्तिशाली योधा थे। लेकिन कृष्ण नीति से हार गए। इन्होने कहा था कि कोरवों और पांडवों का युद्ध देखेंगे और जो सेना हारने लगेगी में उसका साथ दुंगा। लेकिन भगवान् कृष्ण भी डर गए कि इस तरह अगर इन्होने कोरवों का साथ दे दिया तो पाण्डव जीत नहीं पायेंगे। कृष्ण जी ने एक शर्त लगा कर इन्हे हरा दिया और बदले में इनका सिर मांग लिया। लेकिन कामरू नाग / कमरुनाग जी ने एक खवाइश जाहिर की कि वे महाभारत का युद्ध देखेंगे। इसलिए भगवान् कृष्ण ने इनके काटे हुए सिर को हिमालय के एक उंचे शिखर पर पहुंचा दिया। लेकिन जिस तर्फ इनका सिर घूमता वह सेना जीत की ओर बढ्ने लगती। तब भगवान कृष्ण जी ने सिर को एक पत्थर से बाँध कर इन्हे पांडवों की तरफ घुमा दिया। इन्हें पानी की दिक्कत न हो इसलिए भीम ने यहाँ अपनी हथेली को गाड कर एक झील बना दी।

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यह भी कहा जाता है कि इस झील में सोना चांदी चडाते से मन्नत पुरी होती है। लोग अपने शरीर का कोई भी गहना यहाँ चडा देते हैं। झील पैसों से भरी रहती है, ये सोना – चांदी कभी भी झील से निकाला नहीं जाता क्योंकि ये देवतायों का होता है। ये भी मान्यता है कि ये झील सीधे पाताल तक जाती है। इस में देवतायों का खजाना छिपा है। हर साल जून महीने में 14 और 15 जून को बाबा भक्तों को दर्शन देते हैं। झील घने जंगल में है और इन् दिनों के बाद यहाँ कोई भी पुजारी नहीं होता। यहाँ बर्फ भी पड जाती है।

 

यहाँ से कोई भी इस खज़ाने को चुरा नही सकता। क्योंकि माना जाता है कि कामरू नाग / कमरुनाग के खामोश प्रहरी इसकी रक्षा करते हैं। एक नाग की तरह दिखने बाला पेड इस पहाड के चारों ओर है। जिसके बारे मे कहते हैं कि ये नाग देवता अपने असली रुप में आ जाता है। अगर कोई इस झील के खजाने को हाथ भी लगाए।

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जानिए क्यों पांडवों द्वारा निर्मित शिकारी देवी मंदिर पर आज तक छत नहीं लग पाई?

क्यों पांडवों द्वारा निर्मित शिकारी देवी मंदिर पर आज तक छत नहीं लग पाई? , Shikari devi temple mandi himachal pradesh , Shikari devi roofless temple made by pandavas

शिकारी देवी का यह मंदिर करसोग , जनजेलही घाटी में एक उच्चे शिखर पर 11000 फ़ीट की उचाई में स्थित है. मगर सबसे हैरत वाली बात ये  कि मंदिर पर छत नहीं लग पाई। कहा जाता है कि कई बार मंदिर पर छत लगवाने काम शुरू किया गया। लेकिन हर बार कोशिश नाकाम रही। यह माता का चमत्कार है कि आज तक की गई सारी कोशिशें भी शिकारी माता को छत प्रदान न कर सकी|

 

माता शिकारी देवी नाम कैसे पडा – जिस जगह पर यह मंदिर है, वह बहुत घने जंगल के मध्य ने स्थित है. अत्यधिक जंगल होने के कारण यहाँ जंगली जीव-जन्तु भी बहुतयात में हैं |

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पुराने जमाने में लोग शिकार करने के लिए इस घने जंगल में आया करते थे और पहाड़ की चोटी पर जहाँ माता का मंदिर है, वहीँ से जंगल में शिकार का जायजा लेते थे | कभी-२ मन्दिर में जाकर माँ को प्रणाम करते और आग्रह करते कि आज कोई अच्छा शिकार हाथ लगे, कई बार शिकारियों की मुराद भी पूरी हो जाती थी, तब तक यहाँ का नाम शिकारी नहीं था |

लोग अक्सर शिकार की तलाश में आते रहते थे, तो यह स्थान शिकारगाह में ही तब्दील हो गया, शिकार वाला जंगल होने के कारण, लोगों ने इसे शिकारी कहना शुरू कर दिया. धीरे-2 यहाँ स्थापित दुर्गा माँ भी शिकारी माता के नाम से जानी जाने लगी और प्रसिद्ध हो गई |

 

मान्यता है कि आंखों में कोई बीमारी होने पर अगर शिकारी देवी माता को बनावटी आंख चढाई जाए तो आंखों की बीमारी ठीक हो जाती है। लाखों लोग हर साल आखें ठीक होने पर शिकारी माता मंदिर में चांदी की आखें चढ़ाते हैं।

 

शिकारी माता मंदिर का इतिहास – मार्कण्डेय ऋषि ने मंदिर वाली जगह पर वर्षो तक माँ दुर्गा की तपश्या करी तथा माँ दुर्गा ने उनके तप से
प्रसन्न होकर उन्हें शक्ति के रूप में दर्शन दिया व यहा स्थापित हुई|

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इसके बाद पांडव अपने अज्ञातवास के समय यहा आये थे तथा उन्होंने शक्ति रूप में विध्यमान माता की तपश्या करी जिस से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें महाभारत के युद्ध में कौरवो से विजयी प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया. पांडव ने यहा से जाते वक्त माँ के मंदिर का निर्माण किया परन्तु यह कोई भी जानता की आखिर इस मंदिर के छत का निर्माण पांडवो द्वारा क्यों नही किया गया.

शिकारी माता मंदिर आने का समय- शिकारी देवी मंदिर आने का सबसे अच्छा समय गर्मियों का मौसम है

शिकारी देवी माता मंदिर; प्रमुख शहरों से मंदिर की दूरी:

  1. मंडी-80KM
  2. कुल्लू -155KM
  3. मनाली-200KM
  4. शिमला-180KM
  5. धर्मशाला-240KM
  6. चंडीगढ़ -300KM

शायद इससे आप वाकिफ न हो, माता शिकारी देवी मंदिर मंडी हिमाचल प्रदेश:

  • हिमाचल के मंडी में 2850 मीटर की ऊंचाई पर बना शिकारी देवी मंदिर आज भी लोगों के लिए रहस्य बना हुआ है। आज तक कोई भी शख्स इस मंदिर की छत नहीं लगवा पाया।
  • कहा जाता है कि मार्कण्डेय ऋषि ने यहां सालों तक तपस्या की थी। उन्हीं की तपस्या से खुश होकर मां दुर्गा शक्ति रूप में स्‍थापित हुई। बाद में पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान मंदिर का निर्माण किया।
  • पांडवों ने यहां तपस्या की थी। मां दुर्गा तपस्या से प्रसन्‍न हुईं और पांडवों को कौरवों के खिलाफ युद्घ में जीत का आर्शीवाद दिया। इस दौरान यहां मंदिर का निर्माण तो किया गया मगर पूरा मंदिर नहीं बन पाया।
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    Trek To Shikari Devi
  • मां की पत्‍थर की मूर्ति स्थापित करने के बाद पांडव यहां से चले गए। यहां हर साल बर्फ तो खूब गिरती है मगर मां के स्‍थान पर कभी भी बर्फ नहीं टिकती।
  • क्योंकि ये पूरा क्षेत्र वन्य जीवों से भरा पड़ा था, इसीलिए शिकारी अक्सर यहां आने लगे। शिकारी भी माता से शिकार में सफलता की प्रार्थना करते थे और उन्हें कामयाबी भी मिलने लगी। इसी के बाद इस मंदिर का नाम शिकारी देवी के नाम से पड़ गया।
  • मगर सबसे हैरत वाली बात ये थी कि मंदिर पर छत नहीं लग पाई। कहा जाता है कि कई बार मंदिर पर छत लगवाने काम शुरू किया गया। लेकिन हर बार कोशिश नाकाम रही। माता की शक्ति के आगे कभी भी छत नहीं लग पाई।
  • आज भी हर साल यहां लाखों श्रद्घालु पहुंचते हैं। मंदिर तक पहुंचने का रास्ता भी बेहद ही सुंदर है। चारों तरफ हरियाली ही हरियाली दिखती है।
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वास्तव में यह है पहाड़ों पर बसे श्री नैना देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश से जुड़ा इतिहास और पुराण…

Naina Devi Temple Bilaspur Himachal Pradesh , Shaktipeeth Nainadevi

श्री नैना देवी मंदिर 1177 मीटर की ऊंचाई पर जिला बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश मे स्थित है | कई पौराणिक कहानियां मंदिर की स्थापना के साथ जुडी हुई हैं |

एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवी सती ने खुदको यज्ञ में जिंदा जला दिया, जिससे भगवान शिव व्यथित हो गए | उन्होंने सती के शव को कंधे पर उठाया और तांडव नृत्य शुरू कर दिया.

 

इसने स्वर्ग में सभी देवताओं को भयभीत कर दिया कि भगवान शिव का यह रूप प्रलय ला सकता है| भगवान विष्णु से यह आग्रह किया कि अपने चक्र से सती के शरीर को 51 टुकड़ों में काट दें | श्री नैना देवी मंदिर वह जगह है जहां सती की आंखें गिरीं |

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मंदिर से संबंधित एक अन्य कहानी नैना नाम के गुज्जर लड़के की है| एक बार वह अपने मवेशियों को चराने गया और देखा कि एक सफेद गाय अपने थनों से एक पत्थर पर दूध बरसा रही है| उसने अगले कई दिनों तक इसी बात को देखा| एक रात जब वह सो रहा था, उसने देवी माँ को सपने मे यह कहते हुए देखा कि वह पत्थर उनकी पिंडी है|

नैना ने पूरी स्थिति और उसके सपने के बारे में राजा बीर चंद को बताया| जब राजा  ने देखा कि यह वास्तव में हो रहा है, उसने उसी स्थान पर श्री नैना देवी नाम के मंदिर का निर्माण करवाया|

 

श्री नैना देवी मंदिर महिशपीठ नाम से भी प्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ पर माँ श्री नयना देवी जी ने महिषासुर का वध किया था| किंवदंतियों के अनुसार, महिषासुर एक शक्तिशाली राक्षस था जिसे श्री ब्रह्मा द्वारा अमरता का वरदान प्राप्त था, लेकिन उस पर शर्त यह थी कि वह एक अविवाहित महिला द्वारा ही परास्त हो सकता था|इस वरदान के कारण, महिषासुर ने पृथ्वी और देवताओं पर आतंक मचाना शुरू कर दिया | राक्षस के साथ सामना करने के लिए सभी देवताओं ने अपनी शक्तियों को संयुक्त किया और एक देवी को बनाया जो उसे हरा सके| देवी को सभी देवताओं द्वारा अलग अलग प्रकार के हथियारों की भेंट प्राप्त हुई| महिषासुर देवी की असीम सुंदरता से मंत्रमुग्ध हो गया और उसने शादी का प्रस्ताव देवी के समक्ष रखा| देवी ने उसे कहा कि अगर वह उसे हरा देगा तो वह उससे शादी कर लेगी|लड़ाई के दौरान, देवी ने दानव को परास्त किया और उसकी दोनों ऑंखें निकाल दीं|

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एक और कहानी सिख गुरु गोबिंद सिंह जी के साथ जुडी हुई है|जब उन्होंने मुगलों के खिलाफ अपनी सैन्य अभियान 1756 में छेड़ दिया, वह श्री नैना देवी गये और देवी का आशीर्वाद लेने के लिए एक महायज्ञ किया| आशीर्वाद मिलने के बाद, उन्होंने सफलतापूर्वक मुगलों को हरा दिया|

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आवागमन

वायु मार्ग

हवाई जहाज से जाने वाले पर्यटक चंडीगढ़ विमानक्षेत्र तक वायु मार्ग से जा सकते है। इसके बाद बस या कार की सुविधा ले सकते है। दूसरा नजदीकी हवाई अड्डा’अमृतसर विमानक्षेत्र में है।

 

रेल मार्ग कायम नैना देवी जाने के लिए पर्यटक चंडीगढ और पालमपुर तक रेल सुविधा ले सकते है। इसके पश्चात बस, कार व अन्य वाहनो से मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। चंडीगढ देश के सभी प्रमुख शहरो से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है।

सड़क मार्ग

नैनादेवी दिल्ली से 350 कि॰मी॰ कि दूरी पर स्थित है। दिल्ली से करनाल, चण्डीगढ, रोपड़ होते हुए पर्यटक नैना देवी पहुंच सकते है। सड़क मार्ग सभी सुविधाओ से युक्त है। रास्ते मे काफी सारे होटल है जहां पर विश्राम किया जा सकता है। सड़के पक्की बनी हुई है।

प्रमुख शहरो से दूरी

  • दिल्ली: 350 कि॰मी॰ दूर
  • जालंधर: 115 कि॰मी॰ दूर
  • लुधियाना: 125 कि॰मी॰ दूर
  • चिन्तपूर्णी: 110 कि॰मी॰ दूर
  • चंडीगढ: 115 कि॰मी॰ दूर

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