जानिए लाहौल-स्पीति के उदयपुर गांव में सातवीं सदी में बने इस मृकुला देवी मंदिर का इतिहास

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सातवीं शताब्दी से लाहौल-स्पीति के उदयपुर गांव में बसा मृकुला देवी मंदिर

हिमाचल को देवभूमि से जाना जाता है। यहां के लोगों की देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था है, तो वहीं इन्हीं देवी-देवताओं की यहां के लोगों पर अपार कृपा भी रहती है। हिमाचल के देवी-देवताओं का कोने-कोने में वास है और यहां की धरती पर बसने वाले देवी-देवताओं के प्रति अपार श्रद्धा यहां के लोगों में हमेशा देखने को मिलती है। यहां के तीज-त्यौहार,संस्कृति, उत्सव व मेले इसका मुख्य उदाहरण है।

 

हम आपको धर्म आस्था के जरिए इस बार जिला लाहौल-स्पीति के गांव उदयपुर में सातवीं शताब्दी में बनाये गये प्रसिद्ध मंदिर मृकुला देवी से परिचित करवाने जा रहे हैं।

 

मां महिषासुर्मर्दिनि के नाम से भी जाना जाता है मंदिर में स्थापित मृकुला देवी मूर्ति को

जिला लाहौल-स्पीति के मुख्यालय केलांग से 56 किलोमीटर दूर स्थित है खूबसूरत गांव उदयपुर। इस गांव में मृकुला देवी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है जिसे सातवीं शताब्दी में बनाया गया है। यह मंदिर प्राचीन काष्ठ कला का अद्भुत उदाहरण है।मंदिर में स्थापित मूर्ति को मां महिषासुर्मर्दिनि के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह मूर्ति अष्ठधातु से बनी है।

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श्रद्धालु यहां मंदिर में श्रद्धा अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं। कोई महिषासुर्मर्दिनि मां के नाम से तो कोई नवदुर्गा भवानी के नाम से पूजा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि मां काली खप्पर वाली कलकत्ते से आई है जिसका प्रमाण मंदिर प्रांगण में शिला पर बने पैरों के निशान हैं। उसके बाद ऐसा निशान कापुंर्जो नामक स्थान पर है। ऐसा ही निशान चिनाव नदी के पार भी है तथा उसी सीध में पहाड़ी पर भी चरण चिन्ह हैं।

 

दोरजेफामो के नाम से पूजते हैं बौद्ध धर्म के अनुयायी 

ऐसा भी बताया जाता है कि बौद्ध धर्म अनुयायी इन्हें दोरजेफामो के नाम से पूजते हैं। यहां चिरकाल से एक गोम्पा रहा है। ऐसी मान्यता है कि गुरू पदमसंभव ने प्रवास के दौरान यहां गोम्पे में पूजा-अर्चना एवं सिद्धियां की होंगी। बौद्ध धर्म ग्रन्थों में उदयपुर में चिनाव एवं मियाडनाला नदी के संगम स्थल को तान्दी संगम से भी पवित्र माना गया है।

 

उदयपुर गांव कभी मारूल या मर्गुल कहलाता था। इसके नामकरण के बारे में ऐसा बताया जाता है कि एक बार चम्बा नरेश राजा उदयसिंह यहां प्रवास पर आए। राजा ने मां मृकुला देवी के मंदिर में दर्शन करने के उपरान्त वहां प्रांगण के साथ सहो नामक स्थान पर आकर आदेश जारी किया कि आज के बाद यह गांव उदयपुर कहलाएगा। तब से यह गांव उदयपुर के नाम से प्रसिद्ध है।

 

  • चंबा के राजा मेरूवर्मन ने सातवीं शताब्दी में करवाया था मृकुला देवी मंदिर का निर्माण 

  •  कश्मीरी कन्नौज शैली में बना है मृकुला देवी मंदिर 

तांदी से एक सड़क पट्टन घाटी होकर उदयपुर तक जाती है। उदयपुर से एक सड़क पांगी घाटी की तरफ मुड़ जाती है। उदयपुर खूबसूरत कस्बा है। यहां स्थित मृकुला देवी मंदिर खास तौर से दर्शनीय है। मंदिर बाहर से देखने पर साधारण घर जैसा लगता है, लेकिन इसके भीतर एक ऐसा अनोखा कला संसार है जिसे देखकर कलाप्रेमी अभिभूत हो उठते हैं।

कश्मीरी कन्नौज शैली में बने इस मंदिर के भीतर देवदार के शहतीरों और तख्तों पर खुदी मूर्तियां बिल्कुल सजीव लगती हैं। कहा जाता है कि इस मृकुला देवी मंदिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में चंबा के राजा मेरूवर्मन ने करवाया था। कुछ विद्वान इसे कश्मीर के राजा अजय वर्मन और राजा ललितादित्य द्वारा निर्मित बताते हैं। मंदिर में लकड़ी की दीवारों पर एक ओर महाभारत के दृश्य हैं और दूसरी तरफ रामायण के प्रसंग।

 

शहतीरों पर बौद्ध इतिहास के प्रसंग भी चित्रित हैं। राजा बलि द्वारा वामन को धरती दान और सागर मंथन आदि पौराणिक गाथाओं का भी प्रभावशाली चित्रण किया गया है। कुछ चित्रों में गंधर्वो को योग मुद्राओं व अप्सराओं को नृत्य मुद्रा में दर्शाया गया है।

उदयपुर गांव के आसपास कई प्राकृतिक झरने हैंजिन्हें देखकर सैलानी आनंदित हो उठते हैं। सर्दियों में तो बर्फबारी के कारण यहां कोई सैलानी नहीं आतापर रोहतांग दर्रे के खुलते ही यहां मृकुला देवी मंदिर की अद्भुत कलाकृतियां देखने के लिए देश भर के कलाप्रेमी सैलानियों का तांता लग जाता है। यहां के लोग खुले दिल से सैलानियों का स्वागत करते हैं। 

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Udaipur Valley, Lahul Spiti , Himachal Pradesh

इस गांव की उत्तर दिशा में मंदिर के साथ एक चरणामृत सा चश्मा है। एक अन्य प्राचीन चश्मा गांव की पूर्व दिशा में है जो कोईडी मूर्ति  के नाम से प्रसिद्ध है। यह संयोग ही है कि दोनों चश्मों के साथ-साथ विशालकाय कायल के पेड़ हैं जो आज भी मौजूद हैं। उदयपुर गांव के दक्षिण-पश्चिम से चिनाब नदी बहती है।

 

ऐसा बताते हैं कि उदयपुर कभी 140 घरों का गांव था जो उजड़ गया था। इसके उजडऩे की पुष्टि यहां खुदाई में दीवारों के अवशेष मिलने से होती है। गांव के लोगों का मानना है कि वर्तमान के उदयपुर गांव में 60 साल पहले केवल 4 घर थे और अब यह गांव एक किलोमीटर के कस्बे में फैल चुका है। उदयपुर के पश्चिम में देवदार के पेड़ों का घना जंगल कभी रियोढन नाम से जाना जाता था। आज इसे लोग मिनी मनाली के नाम से जानते हैं। यह उदयपुर से एक किलोमीटर की दूरी पर मनाली-जम्मू राजमार्ग पर स्थित है। उससे चार किलोमीटर की दूरी पर प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण मडग्राम (पांच गांवों का समूह) है। यहां ढलानदार घासनियों, समतल खेत और कुदरती नज़ारों को देखकर हर पर्यटक मंत्रमुगध हो जाता है।

 


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हिमाचल के उत्तर पूर्व में स्थित एक बेहद खूबसूरत जिला है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से घिरा यह क्षेत्र ऊपरी, मध्य और निचले किन्नौर हिस्सों में बंटा हुआ है। यहां पहुंचने का मार्ग दुर्गम होने के कारण यह क्षेत्र काफी लम्बे समय तक पर्यटकों से अछूता रहा है, लेकिन अब साहसिक और रोमांचप्रिय पर्यटक यहां बड़ी संख्या में आने लगे हैं। प्राकृतिक दृश्यावली से भरपूर इस नगर की सीमा तिब्बत से सटी हुई है, जो इसे सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से लगभग 25० किमी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर स्थित यह नगर स्थित है। पहाड़ों और जंगलों के बीच कलकल ध्वनि से बहती सतलुत और स्पीति नदी का संगीत यहां की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है। स्पीति नदी आगे चलकर खाब में सतलुज से मिल जाती है। विश्व की विशालतम जांस्कर और ग्रेट हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के आकर्षक नजारे यहां से देखे जा सकते हैं। इस अनूठी घाटी की यात्रा हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से शुरू होती है और कहीं सुरम्य तो कहीं खतरनाक, ढलानदार पहाड़ी सडक़ें. पहाड़ों का वक्ष चीरकर जिस तरह सडक़ें बनाई गईं हैं, 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और बाकी क्षेत्र हरियाली से लहलहा उठा। भले ही यह मात्र किंवदंती ही हो लेकिन रंगीन फसलों, फूलों का परिधान ओढ़े सांगला घाटी स्वर्ग से कम नहीं लगती। अनेक घुमक्कड़ों ने अपने संस्मरणों में इस घाटी के नैसर्गिक सौन्दर्य का वर्णन किया है। सांगला में बेरिंग नाग मन्दिर और बौद्ध मठ दर्शनीय है। सांगला में ही कृषि विश्वविद्यालय का क्षेत्रीय अनुसंधान उपकेन्द्र स्थित है। सांगला के ऊपर कामरू गांव है। यहां का पांच मंजिला ऐतिहासिक किला कला का उत्कृष्ट नमूना है। गांव के बीच में ही नारायण मन्दिर और बौद्ध मन्दिर स्थित हैं और दोनों मन्दिरों का एक ही प्रांगण है। नारायण मन्दिर की काष्ठकला देखती ही बनती है। सांगला घाटी से किन्नर कैलाश के दर्शन भी किये जा सकते हैं। वास्तव में किन्नर कैलाश के पृष्ठ भाग में ही यह घाटी फैली हुई है। यहां पर आप किन्नौरी शोलें और टोपियां खरीद सकते हैं। कल्पा यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य की तरह यहां के लोग भी सुन्दर हैं। किन्नर बालाएं फूलों से सुसज्जित अपनी परम्परागत टोपियां पहनती हैं। टोपियों के दोनों ओर पीपल पत्र नामक चांदी का एक गहना बना होता है और चांदी के ही एक नक्काशीदार कड़े पर कसा रहता है। अपने शरीर को ये ऊनी कम्बल से साड़ी की भांति लपेटे रखती हैं। इस ऊनी कम्बल को स्थानीय भाषा में ‘दोहडू’ कहा जाता है। किन्नरियों में मेहमानों के आदर-सत्कार की भावना भी बहुत होती है। मेहमानों का स्वागत वे अपने हाथों से शराब पेश करके करती हैं। ऐसा करते समय उन्हें कोई संकोच नहीं होता, क्योंकि शराब को किन्नर समाज में महत्व प्राप्त है, लेकिन ताज्जुब की बात यह भी है कि जहां किन्नरियां शराब को बनाने से लेकर पेश करने तक का कार्य अपने हाथों से करती हैं, वहीं वे स्वयं शराब को मुंह तक नहीं लगातीं। शॉल बुनने में तो उनका कोई सानी नहीं है। उनकी बनाई शालों में प्रकृति के विभिन्न रूप परिलक्षित होते हैं। सर्दियों में जब भारी बर्फबारी के कारण किन्नौर का सम्पर्क शेष दुनिया से कट जाता है तो किन्नरियां ऊनी कपड़े, कालीन और अन्य चीजें बुनने का काम करती हैं। उनके बनाये ऊनी वस्त्रों में डोहरियां, पट्टू, गुदमा आदि उल्लेखनीय हैं।किन्नौर घाटी वर्ष में तकरीबन छह मास बर्फ की सफेद चादर से ढकी रहती है। अगस्त से अक्तूबर तक का मौसम यहां खुशगवार होता है। इन्हीं दिनों यहां सैलानियों और घुमक्कड़ों का सैलाब उमड़ता है। सेब, खुबानी, चूली, बग्गूगोशे, चिलगोजे और अंगूर यहां उम्दा किस्म के होते हैं। अंगूर की शराब भी यहां बड़े चाव से पी जाती है। किन्नौर में वर्ष भर त्यौहारों का सिलसिला चलता रहता है। ‘फूलैच’ किन्नौर घाटी का प्रमुख त्यौहार है। इस त्यौहार को ‘उख्यांग’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘उख्यांग’ दो शब्दों ‘ऊ’ और ‘ख्यांग’ से मिलकर बना है। ‘ऊ’ का अर्थ है फूल और ‘ख्यांग’ फूलों को देखना। यह त्यौहार फूलों के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से घिरा कल्पा- ओल्ड हिन्दुस्तान तिब्बत रोड़ पर स्थित कल्पा किन्नौर का प्रारंभिक जिला मुख्यालय था। समुद्र तल से 2759 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव शिमला से 260 किमी. दूर है। हेरिटेज विलेज की तमाम खूबियां यहां देखी जा सकती हैं। प्रात: काल में बर्फीले पहाड़ों के बीच में उगता हुआ सूर्य की स्वर्णिम आभा यहां से बेहद खूबसूरत लगती है। यहां का नारायण नागनी मंदिर स्थानीय कला का बेजोड़ उदाहरण है। कल्पा में अनेक प्राचीन बौद्ध मठ बने हुए हैं। यह गांव 6०5० मीटर ऊंचे किन्नर कैलाश के बहुत ही निकट स्थित है। किन्नर कैलाश को भगवान शिव का शीतकालीन आवास माना जाता है। सांगला किन्नौर का यह लोकप्रिय गांव बास्पा नदी के दायें तट पर स्थित है। समुद्र तल से 2621 मीटर ऊंचा स्थित यह गांव अपनी अति उपजाऊ भूमि के लिए लोकप्रिय है। यह गांव ढलान पर बसा हुआ है जिसके पीछे रालदांग पर्वत की विशाल चोटियां देखी जा सकती हैं। यहां के जंगलों और सदैव बर्फ से आच्छादित पर्वत चोटियों की सुंदरता इसे अन्य स्थानों से अलग बनाती है। बास्पा नदी के बहने के कारण इस स्थान को बस्पा घाटी भी कहा जाता है। यह घाटी किन्नौर जिले की सबसे खूबसूरत घाटियों में एक है। सांगला – (2,860 मी.) किन्नौर क्षेत्र में सबसे बड़ा एवं दर्शनीय गांव हैं, जो करचम से 18 कि.मी. दूर हैं। यहां केसर के खेत, फलोद्यान और ऊपर जाने पर आल्पस के चरागाह हैं। किन्नौर कैलाश चोटी मन मोह लेती हैं। यहां से काली देवी का किले जैसा मंदिर ‘कमरू फोर्ट‘ भी देखा जा सकता हैं।सांगला से 14 किलोमीटर आगे रकछम गांव है। समुद्र तल से करीब तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित रकछम का नामकरण रॉक और छम के मिलन से हुआ है। रॉक अर्थात चट्टान या पत्थर और छम यानी पुल। कहते हैं कभी यहां पत्थर का पुल हुआ करता था, जिस वजह से गांव का नाम ही रकछम पड़ गया। रकछम से 12 किलोमीटर दूर किन्नौर जिले का आखिरी गांव है- छितकुल। लगभग साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर चीन की सीमा के साथ सटा है यह गांव। आबादी होगी कोई पांच सौ के करीब। साठ-सत्तर घर हैं। एक ओर वास्पा नदी बहती है तो दूसरी ओर दैत्याकार नंगे पहाड़ दिखते हैं। साल में चार माह से ज्यादा यह हिमपात के कारण दुनिया से कटा रहता है। उत्तराखण्ड के गंगोत्री और चीन के तिब्बत इलाके से सटे इस गांव में आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी, पशु चिकित्सालय, ब्रांच पोस्ट ऑफिस, पुलिस पोस्ट और स्कूल जैसी आधुनिक सुविधाएं हैं। सांगला के बाद दूसरी खूबसूरत घाटी कल्पा है, लेकिन कल्पा पहुंचने के लिये पहले फिर से करछम लौटना पड़ता है। करछम से करीब 20 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद आता है- पियो और यहां से 15 किलोमीटर आगे कल्पा है। दुर्गम चढ़ाई तय करने के बाद जब सैलानी कल्पा पहुंचता है, तो एक शहर सरीखा कस्बा देख उसकी बांछें खिल जाती हैं। यही कल्पा किन्नौर घाटी का मुख्यालय है और यहां सभी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं। कहते हैं कि यहां मूसलाधार बरसात नहीं होती बल्कि हल्की हल्की सी फुहारें पड़ती हैं। यहां के झरनों की छटा निराली है। ये गुनगुनाते झरने यहां सैलानी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं, वही यहां के खेतों और बागों को सींचते भी हैं। खरीददारी किन्नौर हैंडलूम और हस्तशिल्प के सामानों के लिए प्रसिद्ध है। यहां से शॉल, टोपियां, मफलर, लकड़ी की मूर्तियां और धातुओं से बना बहुत-सा सामान खरीदा जा सकता है। इसके अलावा किन्नौर फलों और ड्राई फूडस के उत्पादन के लिए भी काफी जाना जाता है। सेब, बादाम, चिलगोजा, ओगला, अंगूर और अखरोट आदि भी यहां से खरीदे जा सकते हैं। काल्पा, रिकांग पिऊ, करचम ताप्री आदि स्थानों में अनेक दुकानें है, जहां से इनकी खरीदारी की जा सकती है। कोठी काल्पा तहसील के इस विशाल प्राचीन गांव को कोष्टांपी के नाम से भी जाना जाता है। इस गांव के खेत और फलों के पेडृ इसकी सुंदरता को और बढृा देते हैं। देवी सुआंग चन्द्रिका मंदिर यहां बना हुआ है। यहां के स्थानीय निवासी इस देवी का बहुत सम्मान करते हैं और इसे बहुत शक्तिशाली मानते हैं। भैरों को समर्पित यहां एक अन्य मंदिर भी खासा लोकप्रिय है। निचार यह गांव तरांगा और वांगटू के बीच सतलुज नदी के बाएं तट पर बसा हुआ है। समुद्र तल से 215० मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव प्राकृतिक दृश्यावली से भरपूर है। यदि इस गांव से ऊपर की ओर जाया जाए तो घोरल, एंटीलोप्स, काले और लाल भालुओं को देखा जा सकता है। नाको कल्पा से 117 किमी. की दूरी पर नाको स्थित है। हंगरांग घाटी में स्थित यह गांव समुद्र तल से 36०० मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह गांव यहां की नाको झील के कारण भी लोकप्रिय है जिसमें गर्मियों के दौरान नौकायन की सुवधा है। सर्दियों में इस झील का पानी जम जाता है और उसमे स्केटिंग की जाती है। बौद्ध मठ भी यहां देखा जा सकता है। काजा एक जमाने में काजा स्पीति के प्रमुख की राजधानी थी। स्पीति नदी के बाएं किनारे पर स्थित यह नगर समुद्र तल से 36०० मीटर की ऊंचाई पर है। वर्तमान में काजा स्पीति सब डिवीज़न का मुख्यालय है। इस खूबसूरत स्थान में बहुत से बौद्ध मठ और हिन्दु मंदिर देखे जा सकते हैं। छितकुल समुद्र तल से 345० मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह बास्पा घाटी का अंतिम और सबसे ऊंचा गांव है। बास्पा नदी के दाहिने तट पर स्थित इस गांव में स्थानीय देवी माथी के तीन मंदिर बने हुए हैं। कहा जाता है कि माथी के सबसे प्रमुख मंदिर को 5०० साल पहले गढ़वाल के एक निवासी ने बनवाया था। भोजपत्र नामक वृक्षों के जंगलों से घिरा यह अल्पास के खूबसूरत चरागाहों और हिम भूदृश्यों के लिए जाना जाता हैं। करछम करछम (1899 मी.) सतलुज और बस्पा नदियों के संगम स्थल जोअरी, वांग्तु और तापरी गांवों के बाद आता हैं, जहां से सुन्दर बस्पा और सांगला घाटी प्रारंभ होती हैं। पोवारी पोवारी रामपुर से 70 कि.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर अंतिम मुख्य ठहराव हैं। रिकांग पिओ रिकांग पिओ 2670 मी.) शिमला से 231 कि.मी. और पोवारी से 7 कि.मी. दूर स्थित, किन्नौर जिले का मुख्यालय हैं। यहां स्थित उप-जिला मुख्यालय से किन्नौर घाटी में पर्यटन हेतु अनुमति ली जा सकती हैं। निकट ही भगवान बुद्ध की प्रतिमायुक्त कालाचक्र मंदिर से किन्नौर कैलाश का सुन्दर दृश्य दिखाई देता हैं। कोठी: कोठी, रिकांग पिओ से मात्र 3 कि.मी. दूर स्थित है, जहां चंडिका देवी का मंदिर हैं। पहाड़ों की गोद और देवदार के झुरमुट के बीच स्थापित इस मंदिर की शैली और शिल्प असाधारण हैं। देवी की स्वर्ण-निर्मित प्रतिमा अप्रतिम हैं। कल्पा कल्पा रिकोंग पिओ से 7 कि.मी. दूर स्थित ह। नदी के पार, कल्पा के सामने किन्नर कैलाश श्रृंखला हैं। भोर के समय जब उगते सूर्य की लाल और हल्की सुनहरी किरणें हिमानी चौटियों को चूमती हैं तो वह दृश्य बड़ा नयनाभिराम होता हैं पांगी पांगी रिकांग पिओ से चिलगोजा चीड़ के जंगलों से गुजरते हुए 10 कि.मी. दूर स्थित हैं। यह सेब के उद्यानों से घिरा है, जहां बुद्ध मंदिर, शेशरी नाग मंदिर दर्शनीय हैं। रिब्बा रिब्बा पोवारी से 16 कि.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर स्थित, अपने अंगूर के बगीचों और अंगूर से बनाई गई स्थानीय शराब ‘अंगूरी‘ के लिए मशहूर है। मूरंग मूरंग राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर पोवारी से 26 कि.मी. दूर, खूमानी की वाटिकाओं के मध्य स्थित हैं। पुह पुह राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर पोवारी से 58 कि.मी. दूर स्थित हैं जहां हरियाले खेत, खूमानी व अंगूर के बगीचे और बादाम के उद्यान देखे जा सकते हैं। यहां ठहरने की आरामदायक सुविधाएं हैं। चांगो एवं लियों चांगो एवं लियों सेब के उद्यानों से भरपूर हैं। चांगो में बुद्ध मठ भी स्थित है। सुमधो सुमधो स्पिति एवं पारे-चू नदियों के संगम स्थल पर स्थित, किन्नौर का अंतिम गांव हैं। कैसे पहुंचें: वायु मार्ग किन्नौर का निकटतम एयरपोर्ट शिमला में है। दिल्ली से शिमला के लिए सीधी फ्लाइट है। रेल मार्ग शिमला को रेलवे स्टेशन किन्नौर का निकटतम रेलवे स्टेशन है जो कालका से नेरो गैज लाइन से जुड़ा हुआ है। शिमला से कालका की दूरी 96 किमी.है। सडक़ मार्ग  सडक़ मार्ग से किन्नौर पहुंचने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग 22 की प्रयोग किया जाता है। दिल्ली, चंडीगढ़, शिमला, मनाली और कुल्लू से किन्नौर के लिए टैक्सी भी की जा सकती है।

पौराणिक किन्नरों की भूमि किन्नौर हिमाचल के उत्तर पूर्व में स्थित एक बेहद खूबसूरत जिला है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से घिरा यह क्षेत्र ऊपरी, मध्य और निचले किन्नौर हिस्सों में बंटा हुआ है। यहां पहुंचने का मार्ग दुर्गम होने के कारण यह क्षेत्र काफी लम्बे समय तक पर्यटकों से अछूता रहा है, लेकिन अब साहसिक और रोमांचप्रिय पर्यटक यहां बड़ी संख्या में आने लगे हैं।

 

प्राकृतिक दृश्यावली से भरपूर इस नगर की सीमा तिब्बत से सटी हुई है, जो इसे सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से लगभग 25० किमी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर स्थित यह नगर स्थित है। पहाड़ों और जंगलों के बीच कलकल ध्वनि से बहती सतलुत और स्पीति नदी का संगीत यहां की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है। स्पीति नदी आगे चलकर खाब में सतलुज से मिल जाती है। विश्व की विशालतम जांस्कर और ग्रेट हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के आकर्षक नजारे यहां से देखे जा सकते हैं। इस अनूठी घाटी की यात्रा हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से शुरू होती है और कहीं सुरम्य तो कहीं खतरनाक, ढलानदार पहाड़ी सडक़ें.

 

पहाड़ों का वक्ष चीरकर जिस तरह सडक़ें बनाई गईं हैं, इंजीनियरों के अथक परिश्रम और कार्यकुशलता का नमूना हैं। रास्ते में झर-झर झरते झरनों को देखकर मन प्रफुल्लित हो उठता है। ऐसा ही सफर तय करके आता है भावनगर। हिमाचल की मशहूर संजय विद्युत परियोजना यहीं है। पूरी तरह से भूमिगत यह परियोजना उच्च स्तरीय तकनीक का जीवंत उदाहरण है। यहां से करीब दस किलोमीटर आगे वांगतू पुल है। पहले यहां पुलिस चौकी पर परमिट चैक किये जाते थे लेकिन अब यह क्षेत्र सैलानियों के लिये खोल दिये जाने के कारण ऐसा नहीं होता।

 

लेकिन औपचारिकता निभाने के लिये पुलिसकर्मी अपनी तसल्ली जरूर करते हैं। वांगतू से आगे आता है टापरी और फिर कड़छम। कड़छम इस जिले की दो प्रमुख नदियों सतलुज और वास्पा का संगम कहलाता है। वास्पा नदी यहां सतलुज के आगोश में समा जाती है। यहां से एक मार्ग इस घाटी के एक खूबसूरत स्थल सांगला को जाता है। सांगला किन्नौर की सर्वाधिक प्रसिद्ध और रमणीय घाटी है। समुद्र तल से करीब ढाई हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित सांगला घाटी को पहले वास्पा घाटी भी कहा जाता था। ऐसी भी मान्यता है कि पूरी सांगला घाटी कभी एक विशालकाय झील थी, लेकिन कालान्तर में इस झील का पानी वास्पा नदी में तब्दील हो गया और बाकी क्षेत्र हरियाली से लहलहा उठा। भले ही यह मात्र किंवदंती ही हो लेकिन रंगीन फसलों, फूलों का परिधान ओढ़े सांगला घाटी स्वर्ग से कम नहीं लगती।

अनेक घुमक्कड़ों ने अपने संस्मरणों में इस घाटी के नैसर्गिक सौन्दर्य का वर्णन किया है। सांगला में बेरिंग नाग मन्दिर और बौद्ध मठ दर्शनीय है। सांगला में ही कृषि विश्वविद्यालय का क्षेत्रीय अनुसंधान उपकेन्द्र स्थित है। सांगला के ऊपर कामरू गांव है। यहां का पांच मंजिला ऐतिहासिक किला कला का उत्कृष्ट नमूना है।

 

गांव के बीच में ही नारायण मन्दिर और बौद्ध मन्दिर स्थित हैं और दोनों मन्दिरों का एक ही प्रांगण है। नारायण मन्दिर की काष्ठकला देखती ही बनती है। सांगला घाटी से किन्नर कैलाश के दर्शन भी किये जा सकते हैं। वास्तव में किन्नर कैलाश के पृष्ठ भाग में ही यह घाटी फैली हुई है। यहां पर आप किन्नौरी शोलें और टोपियां खरीद सकते हैं।

 

कल्पा

यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य की तरह यहां के लोग भी सुन्दर हैं। किन्नर बालाएं फूलों से सुसज्जित अपनी परम्परागत टोपियां पहनती हैं। टोपियों के दोनों ओर पीपल पत्र नामक चांदी का एक गहना बना होता है और चांदी के ही एक नक्काशीदार कड़े पर कसा रहता है। अपने शरीर को ये ऊनी कम्बल से साड़ी की भांति लपेटे रखती हैं। इस ऊनी कम्बल को स्थानीय भाषा में ‘दोहडू’ कहा जाता है।

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किन्नरियों में मेहमानों के आदर-सत्कार की भावना भी बहुत होती है। मेहमानों का स्वागत वे अपने हाथों से शराब पेश करके करती हैं। ऐसा करते समय उन्हें कोई संकोच नहीं होता, क्योंकि शराब को किन्नर समाज में महत्व प्राप्त है, लेकिन ताज्जुब की बात यह भी है कि जहां किन्नरियां शराब को बनाने से लेकर पेश करने तक का कार्य अपने हाथों से करती हैं, वहीं वे स्वयं शराब को मुंह तक नहीं लगातीं। शॉल बुनने में तो उनका कोई सानी नहीं है।

उनकी बनाई शालों में प्रकृति के विभिन्न रूप परिलक्षित होते हैं। सर्दियों में जब भारी बर्फबारी के कारण किन्नौर का सम्पर्क शेष दुनिया से कट जाता है तो किन्नरियां ऊनी कपड़े, कालीन और अन्य चीजें बुनने का काम करती हैं। उनके बनाये ऊनी वस्त्रों में डोहरियां, पट्टू, गुदमा आदि उल्लेखनीय हैं।किन्नौर घाटी वर्ष में तकरीबन छह मास बर्फ की सफेद चादर से ढकी रहती है। अगस्त से अक्तूबर तक का मौसम यहां खुशगवार होता है।

 

इन्हीं दिनों यहां सैलानियों और घुमक्कड़ों का सैलाब उमड़ता है। सेब, खुबानी, चूली, बग्गूगोशे, चिलगोजे और अंगूर यहां उम्दा किस्म के होते हैं। अंगूर की शराब भी यहां बड़े चाव से पी जाती है। किन्नौर में वर्ष भर त्यौहारों का सिलसिला चलता रहता है। ‘फूलैच’ किन्नौर घाटी का प्रमुख त्यौहार है। इस त्यौहार को ‘उख्यांग’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘उख्यांग’ दो शब्दों ‘ऊ’ और ‘ख्यांग’ से मिलकर बना है। ‘ऊ’ का अर्थ है फूल और ‘ख्यांग’ फूलों को देखना। यह त्यौहार फूलों के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।

ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से घिरा

कल्पा- ओल्ड हिन्दुस्तान तिब्बत रोड़ पर स्थित कल्पा किन्नौर का प्रारंभिक जिला मुख्यालय था। समुद्र तल से 2759 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव शिमला से 260 किमी. दूर है। हेरिटेज विलेज की तमाम खूबियां यहां देखी जा सकती हैं। प्रात: काल में बर्फीले पहाड़ों के बीच में उगता हुआ सूर्य की स्वर्णिम आभा यहां से बेहद खूबसूरत लगती है। यहां का नारायण नागनी मंदिर स्थानीय कला का बेजोड़ उदाहरण है। कल्पा में अनेक प्राचीन बौद्ध मठ बने हुए हैं। यह गांव 6०5० मीटर ऊंचे किन्नर कैलाश के बहुत ही निकट स्थित है। किन्नर कैलाश को भगवान शिव का शीतकालीन आवास माना जाता है।

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किन्नर कैलाश
  • सांगला

  • किन्नौर का यह लोकप्रिय गांव बास्पा नदी के दायें तट पर स्थित है। समुद्र तल से 2621 मीटर ऊंचा स्थित यह गांव अपनी अति उपजाऊ भूमि के लिए लोकप्रिय है। यह गांव ढलान पर बसा हुआ है जिसके पीछे रालदांग पर्वत की विशाल चोटियां देखी जा सकती हैं। यहां के जंगलों और सदैव बर्फ से आच्छादित पर्वत चोटियों की सुंदरता इसे अन्य स्थानों से अलग बनाती है। बास्पा नदी के बहने के कारण इस स्थान को बस्पा घाटी भी कहा जाता है। यह घाटी किन्नौर जिले की सबसे खूबसूरत घाटियों में एक है। सांगला – (2,860 मी.) किन्नौर क्षेत्र में सबसे बड़ा एवं दर्शनीय गांव हैं, जो करचम से 18 कि.मी. दूर हैं। यहां केसर के खेत, फलोद्यान और ऊपर जाने पर आल्पस के चरागाह हैं। किन्नौर कैलाश चोटी मन मोह लेती हैं। यहां से काली देवी का किले जैसा मंदिर ‘कमरू फोर्ट‘ भी देखा जा सकता हैं।सांगला से 14 किलोमीटर आगे रकछम गांव है। समुद्र तल से करीब तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित रकछम का नामकरण रॉक और छम के मिलन से हुआ है।
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  • रॉक अर्थात चट्टान या पत्थर और छम यानी पुल। कहते हैं कभी यहां पत्थर का पुल हुआ करता था, जिस वजह से गांव का नाम ही रकछम पड़ गया। रकछम से 12 किलोमीटर दूर किन्नौर जिले का आखिरी गांव है- छितकुल। लगभग साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर चीन की सीमा के साथ सटा है यह गांव। आबादी होगी कोई पांच सौ के करीब। साठ-सत्तर घर हैं। एक ओर वास्पा नदी बहती है तो दूसरी ओर दैत्याकार नंगे पहाड़ दिखते हैं। साल में चार माह से ज्यादा यह हिमपात के कारण दुनिया से कटा रहता है। उत्तराखण्ड के गंगोत्री और चीन के तिब्बत इलाके से सटे इस गांव में आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी, पशु चिकित्सालय, ब्रांच पोस्ट ऑफिस, पुलिस पोस्ट और स्कूल जैसी आधुनिक सुविधाएं हैं। सांगला के बाद दूसरी खूबसूरत घाटी कल्पा है, लेकिन कल्पा पहुंचने के लिये पहले फिर से करछम लौटना पड़ता है।
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  • करछम से करीब 20 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद आता है- पियो और यहां से 15 किलोमीटर आगे कल्पा है। दुर्गम चढ़ाई तय करने के बाद जब सैलानी कल्पा पहुंचता है, तो एक शहर सरीखा कस्बा देख उसकी बांछें खिल जाती हैं। यही कल्पा किन्नौर घाटी का मुख्यालय है और यहां सभी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं। कहते हैं कि यहां मूसलाधार बरसात नहीं होती बल्कि हल्की हल्की सी फुहारें पड़ती हैं। यहां के झरनों की छटा निराली है। ये गुनगुनाते झरने यहां सैलानी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं, वही यहां के खेतों और बागों को सींचते भी हैं।

खरीददारी

किन्नौर हैंडलूम और हस्तशिल्प के सामानों के लिए प्रसिद्ध है। यहां से शॉल, टोपियां, मफलर, लकड़ी की मूर्तियां और धातुओं से बना बहुत-सा सामान खरीदा जा सकता है। इसके अलावा किन्नौर फलों और ड्राई फूडस के उत्पादन के लिए भी काफी जाना जाता है। सेब, बादाम, चिलगोजा, ओगला, अंगूर और अखरोट आदि भी यहां से खरीदे जा सकते हैं। काल्पा, रिकांग पिऊ, करचम ताप्री आदि स्थानों में अनेक दुकानें है, जहां से इनकी खरीदारी की जा सकती है।

कोठी

काल्पा तहसील के इस विशाल प्राचीन गांव को कोष्टांपी के नाम से भी जाना जाता है। इस गांव के खेत और फलों के पेडृ इसकी सुंदरता को और बढृा देते हैं। देवी सुआंग चन्द्रिका मंदिर यहां बना हुआ है। यहां के स्थानीय निवासी इस देवी का बहुत सम्मान करते हैं और इसे बहुत शक्तिशाली मानते हैं। भैरों को समर्पित यहां एक अन्य मंदिर भी खासा लोकप्रिय है।

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Chandika Temple Kothi, Kinnaur

निचार

यह गांव तरांगा और वांगटू के बीच सतलुज नदी के बाएं तट पर बसा हुआ है। समुद्र तल से 215० मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव प्राकृतिक दृश्यावली से भरपूर है। यदि इस गांव से ऊपर की ओर जाया जाए तो घोरल, एंटीलोप्स, काले और लाल भालुओं को देखा जा सकता है।

Nichar Kinnaur , जन्नत-ए-हिमाचल: किन्नौर घाटी की सम्पूर्ण जानकारी- Himachali Roots , complete information about kinnaur himachal pradesh , kinnaur tourism , places to see in kinnaur , places of interest in kinnaur , history of kinnaur , Kinnaur himachal pradesh , history and information about kinnaur in hindi , प्रकृति की जन्नत: किन्नौर, खूबसूरती की छटा बिखरेती किन्नौर घाटी
Nichar Village, Kinnaur

नाको

कल्पा से 117 किमी. की दूरी पर नाको स्थित है। हंगरांग घाटी में स्थित यह गांव समुद्र तल से 36०० मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह गांव यहां की नाको झील के कारण भी लोकप्रिय है जिसमें गर्मियों के दौरान नौकायन की सुवधा है। सर्दियों में इस झील का पानी जम जाता है और उसमे स्केटिंग की जाती है। बौद्ध मठ भी यहां देखा जा सकता है।

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Nako Lake & Village, Kinnaur

काजा

एक जमाने में काजा स्पीति के प्रमुख की राजधानी थी। स्पीति नदी के बाएं किनारे पर स्थित यह नगर समुद्र तल से 36०० मीटर की ऊंचाई पर है। वर्तमान में काजा स्पीति सब डिवीज़न का मुख्यालय है। इस खूबसूरत स्थान में बहुत से बौद्ध मठ और हिन्दु मंदिर देखे जा सकते हैं।

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छितकुल

समुद्र तल से 345० मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह बास्पा घाटी का अंतिम और सबसे ऊंचा गांव है। बास्पा नदी के दाहिने तट पर स्थित इस गांव में स्थानीय देवी माथी के तीन मंदिर बने हुए हैं। कहा जाता है कि माथी के सबसे प्रमुख मंदिर को 5०० साल पहले गढ़वाल के एक निवासी ने बनवाया था। भोजपत्र नामक वृक्षों के जंगलों से घिरा यह अल्पास के खूबसूरत चरागाहों और हिम भूदृश्यों के लिए जाना जाता हैं।

Chitkul Kinnaur , जन्नत-ए-हिमाचल: किन्नौर घाटी की सम्पूर्ण जानकारी- Himachali Roots , complete information about kinnaur himachal pradesh , kinnaur tourism , places to see in kinnaur , places of interest in kinnaur , history of kinnaur , Kinnaur himachal pradesh , history and information about kinnaur in hindi , प्रकृति की जन्नत: किन्नौर, खूबसूरती की छटा बिखरेती किन्नौर घाटी
Chitkul Village, Kinnaur

करछम

करछम (1899 मी.) सतलुज और बस्पा नदियों के संगम स्थल जोअरी, वांग्तु और तापरी गांवों के बाद आता हैं, जहां से सुन्दर बस्पा और सांगला घाटी प्रारंभ होती हैं।

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Karcham, Kinnaur

पोवारी

पोवारी रामपुर से 70 कि.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर अंतिम मुख्य ठहराव हैं।

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रिकांग पिओ

रिकांग पिओ 2670 मी.) शिमला से 231 कि.मी. और पोवारी से 7 कि.मी. दूर स्थित, किन्नौर जिले का मुख्यालय हैं। यहां स्थित उप-जिला मुख्यालय से किन्नौर घाटी में पर्यटन हेतु अनुमति ली जा सकती हैं। निकट ही भगवान बुद्ध की प्रतिमायुक्त कालाचक्र मंदिर से किन्नौर कैलाश का सुन्दर दृश्य दिखाई देता हैं।

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PWD Headquarters, Reckong Peo

 

कल्पा

कल्पा रिकोंग पिओ से 7 कि.मी. दूर स्थित ह। नदी के पार, कल्पा के सामने किन्नर कैलाश श्रृंखला हैं। भोर के समय जब उगते सूर्य की लाल और हल्की सुनहरी किरणें हिमानी चौटियों को चूमती हैं तो वह दृश्य बड़ा नयनाभिराम होता हैं

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पांगी

पांगी रिकांग पिओ से चिलगोजा चीड़ के जंगलों से गुजरते हुए 10 कि.मी. दूर स्थित हैं। यह सेब के उद्यानों से घिरा है, जहां बुद्ध मंदिर, शेशरी नाग मंदिर दर्शनीय हैं।

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रिब्बा

रिब्बा पोवारी से 16 कि.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर स्थित, अपने अंगूर के बगीचों और अंगूर से बनाई गई स्थानीय शराब ‘अंगूरी‘ के लिए मशहूर है।

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Ribba In Winters

मूरंग

मूरंग राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर पोवारी से 26 कि.मी. दूर, खूमानी की वाटिकाओं के मध्य स्थित हैं।

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पुह

पुह राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर पोवारी से 58 कि.मी. दूर स्थित हैं जहां हरियाले खेत, खूमानी व अंगूर के बगीचे और बादाम के उद्यान देखे जा सकते हैं। यहां ठहरने की आरामदायक सुविधाएं हैं।

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चांगो एवं लियों

चांगो एवं लियों सेब के उद्यानों से भरपूर हैं। चांगो में बुद्ध मठ भी स्थित है।

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सुमधो

सुमधो स्पिति एवं पारे-चू नदियों के संगम स्थल पर स्थित, किन्नौर का अंतिम गांव हैं।

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कैसे पहुंचें:

 

वायु मार्ग

किन्नौर का निकटतम एयरपोर्ट शिमला में है। दिल्ली से शिमला के लिए सीधी फ्लाइट है।

रेल मार्ग

शिमला को रेलवे स्टेशन किन्नौर का निकटतम रेलवे स्टेशन है जो कालका से नेरो गैज लाइन से जुड़ा हुआ है। शिमला से कालका की दूरी 96 किमी.है।

सडक़ मार्ग

 सडक़ मार्ग से किन्नौर पहुंचने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग 22 की प्रयोग किया जाता है। दिल्ली, चंडीगढ़, शिमला, मनाली और कुल्लू से किन्नौर के लिए टैक्सी भी की जा सकती है।


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आखिर क्या है इस रहस्यमयी झील में जो गया लौटकर नहीं आया

फुंडुजी , Fundudzi Lake , आखिर क्या है इस रहस्यमयी झील में जो गया लौटकर नहीं आया

जो भी हमने लेख में लिखा है इस से हमारा मतलब अन्धविश्वास फैलाना नहीं है. जो भी जानकारी प्रकाशित की गयी है वो दुनिआ के जाने माने समाचार पत्रों एवं न्यूज़ चैनल्स से एकत्रित की गयी है. आप भी इसे गूगल में डायरेक्ट सर्च करके सच का पता लगा सकते हैं. तो आइये अब शुरू करें:


दुनिया में कई ऐसे रहस्य हैं जिनसे पर्दा उठाने की जब भी कोशिश की गई रहस्य और गहरा होता गया। ऐसा ही एक रहस्य छुपा है दक्षिण अफ्रीका के एक झील में जिसका नाम है पांडुजी ( फुंडुजी , Fundudzi )

फुंडुजी , Fundudzi Lake , आखिर क्या है इस रहस्यमयी झील में जो गया लौटकर नहीं आया

यह झील दक्षिण अफ्रीका के उत्तरी ट्रांसवाल क्षेत्र में स्थित है। माना जाता है कि यह शापित झील है। इस झील के पास जो भी गया है उसकी मौत हो गयी है। अगर वह जीवित लौट आया भी तो अधिक दिनों तक जिंदा नहीं रह पाया।

इसका कारण क्या है इसे जानने की कई बार कोशिश की गई लेकिन हर बार जांच टीम के लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। यही कारण है कि आज तक यह झील एक रहस्य बना हुआ है।

 

इस झील में मुटाली नदी से पानी आता है। इस नदी के स्रोत का भी पता नहीं चल पाया है। जबकि झील का पानी अजीबो-गरीब तरीके से ज्वार भाटा की तरह उठता गिरता रहता है।

 

झील के आस-पास के क्षेत्र में रहने वाले लोगों का मानना है कि यह झील का स्वामी एक विशाल अजगर है जो मुटाली नदी के क्षेत्र में रहता है। यह उर्वरा के देवता हैं। यह नहीं चाहते कि कोई भी इस झील के आस-पास आए।

 

देवता हर साल एक अविवाहित स्त्री की बलि मांगते हैं और इन्हें खुश रखने के लिए डोम्बा नृत्य का आयोजन किया जाता है।


सन् 1953 में प्रोफेसर बर्न साइड अपने एक सहयोगी के साथ अलग-अलग आकार की 16 शीशियां लेकर फुंडुजी झील की तरफ चल पडे़। उन्होंने इस काम में पास ही के बावेंडा कबीले के लोगों को भी शामिल करना चाहा, लेकिन कबीले के लोगों ने जैसे ही फुंडुजी झील का नाम सुना तो वे बिना एक पल की देर लगाए वहां से भाग खडे़ हुए।

कबीले के एक बुजुर्ग आदिवासी ने बर्न साइड को सलाह दी कि अगर उन्हें अपनी और अपने सहयोगी की जान प्यारी है तो फुंडुजी झील के बारे में न सोचें। प्रोफेसर बर्न साइड वृद्ध आदिवासी की बात सुनकर परेशान जरूर हुए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। साहस जुटाकर वह फिर झील की तरफ चल पडे़। एक लंबा सफर तय कर जब वे झील के किनारे पहुंचे तब तक रात की स्याही फैल चुकी थी। अंधेरा इतना घना था कि पास की चीज भी दिखाई नहीं दे रही थी। प्रोफेसर बर्न ने अपने सहयोगी के साथ सुबह का इंतजार करना ही बेहतर समझा। सुबह होते ही बर्न साइड ने झील के पानी को देखा, जो काले रंग का था।
उन्होंने अपनी अंगुली को पानी में डुबोया और फिर जबान से लगाकर चखा। उनका मुंह कड़वाहट से भर गया। इसके बाद उन्होंने अपने साथ लाई गईं शीशियों में झील का पानी भर लिया। प्रोफेसर ने झील के आसपास उगे पौधों और झाड़ियों के कुछ नमूने भी एकत्रित किए। शाम हो चुकी थी। वे और उनके सहयोगी एक खुली जगह पर रात गुजारने के मकसद से रुक गए। झील के बारे में सुनी बातों को लेकर वे आशंकित थे ही, इसलिए उन्होंने तय किया कि बारी-बारी से सोया जाए। जब प्रोफेसर बर्न साइड सो रहे थे तब उनके सहयोगी ने कुछ अजीबो-गरीब आवाजें सुनीं। उसने घबराकर प्रोफेसर को जगाया। बर्न साइड ने टार्च जलाकर देखा, लेकिन उन्हें कुछ भी पता नहीं चला।
सवेरे चलने के समय जैसे ही उन्होंने पानी की शीशियों को संभाला तो वे यह देखकर हैरान रह गए कि शीशियां खाली थीं। हैरानी की एक बात यह भी थी, कि शीशियों के ढक्कन ज्यों के त्यों ही लगे हुए थे। वे एक बार फिर फुंडुजी झील की तरफ चल पडे़। बर्न साइड खुद को अस्वस्थ महसूस कर रहे थे। उनके पेट में दर्द भी हो रहा था। वे झील के किनारे पहुंचे। बोतलों में पानी भरा और फिर वापस लौट पडे़।
रास्ते में रात गुजारने के लिए वे एक स्थान पर रुके, लेकिन इस बार उनकी आंखों में नींद नहीं थी। सुबह दोनों यह देखकर फिर हैरान रह गए कि शीशियां खाली थीं। बर्न साइड का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था, इसलिए वे खाली हाथ ही लौट पडे़। घर पहुंचने पर नौवें दिन बर्न साइड की मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक आंतों में सूजन आ जाने के कारण बर्न साइड की मौत हुई थी। प्रोफेसर द्वारा एकत्रित झील के समीप उगे पौधों के नमूने भी इतने खराब हो चुके थे कि उनका परीक्षण कर पाना मुमकिन नहीं था।

बर्न साइड का जो सहयोगी उनके साथ फुंडुजी झील का रहस्य जानने गया था, उनकी मौत के एक हफ्ते बाद पिकनिक मनाने समुद्र में गया। वह एक नाव में बैठकर समुद्र के किनारे से बहुत दूर चला गया। दो दिन बाद समुद्र तट पर उसकी लाश पाई गई। यह था खौफनाक फुंडुजी झील का अभिशाप। यह अभिशप्त झील एक रहस्य बनकर रह गई है।

 


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शिव बाड़ी यानी शिव का वास स्थान। गगरेट स्थित प्राचीन द्रोण शिव मंदिर | कहते हैं कि यह स्थल महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की नगरी थी। यहां भगवान शिव का एवं भव्य मंदिर है।धारणा है कि शिव बाड़ी निर्माण स्वयं शिवजी ने किया था। कहते….Read More!

 

हिमाचल प्रदेश, चंबा में स्थित मां शिव शक्ति मंदिर का इतिहास एवं अन्य दिलचस्प बातें!

“छतराड़ी स्थित मां शिव शक्ति” हिमाचल प्रदेश, जिला चंबा के में छतराड़ी स्थित मां शिव शक्ति के बारे में कुछ जानकारी हमारी संस्कृति देवत्व प्रधान संस्कृति रही है। देवत्व यानि देनेवाली संस्कृति, समर्पण की संस्कृति। हिमाचल एक प्राकृतिक क्षेत्र है जिसके बारह जिलों में……Read More!

 

हिमाचल के कांगडा में स्थित शक्तिपीठ चामुण्डा, आइये जानें मंदिर से जुड़ा इतिहास एवं पुराण!

चामुण्डा देवी का मंदिर भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक है, जो कि पश्चिम पालमपुर से लगभग 10 किलोमीटर, कांगडा से 24 किलोमीटर व धर्मशाला से 15 किलोमीटर की दूरी पर, कांगडा जिले, हिमाचल प्रदेश में स्थित है। यह मंदिर माँ चामुंडा देवी का समर्पित है जोकि भगवती काली….Read More!

 

पत्थर के मंदिरों की घाटी के नाम से प्रसिद्ध हाटकोटी मंदिर से जुड़ा इतिहास

हिमाचल के विख्‍यात मन्दिरों में से एक “माँ हाटकोटी” हिमाचल जिसे देवभूमि की संज्ञा प्राप्त है और यहां के देवी-देवताओं के प्रति लोगों की आस्था भी उतनी ही गहरी है। ना केवल प्रदेश के लोगों की अपितु यहां के देवी-देवताओं के प्रति प्रदेश के साथ-साथ अन्य देश-विदेशों से आने वाले….Read More!

 

देवभूमि हिमाचल के 12 जिलों में स्थित प्रमुख मंदिर एवं उनसे जुड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारी!

Temples of himachal pradesh , all temples in himachal pradesh , famous temples of himachal pradesh , temples in hamirpur , temples in bilaspur , temples in una , temples in solan, temples in shimla, temples in sirmour , temples in mandi , temples in kullu , temples in kangra, temples in kinnaur, temples in chamba , temples in lahul spiti , हिमाचल  — को प्राचीन काल से ही देवभूमि के नाम से संबोधित किया गया है। यदि हम कहें कि हिमाचल देवी-देवताओं का निवास स्थान है तो बिल्कुल भी गलत नही होगा। हमारे कई धर्मग्रन्थों में भी हिमाचल वाले क्षेत्र का वर्णन मिलता है। महाभारत, पद्मपुराण और कनिंघम जैसे धर्मग्रन्थों में इस भू-भाग का जिक्र कई बार आता है। इस सब से हम अनुमान लगा सकते है कि यह पवित्र भूमि आदि काल से ही देवी-देवताओं की प्रिय रही है। इसलिए ऐसी पावन धरा पर जन्म लेना और यहां जीने का अवसर मिलना सौभाग्य की बात है। आज हम हिमाचल के अलग-अलग जिलो में महत्वपूर्ण मंदिरों की बात करेंगे। हमीरपुर हमीरपुर में वैसे तो अनगिनत मंदिर है परंतु इस जिले के कुछ महत्वपूर्ण मंदिर इस तरह से हैं: 1. बाबा बालक नाथ  यह मंदिर शिवालिक पहाड़ियों पे स्थित है। यह हमीरपुर के दियोटसिद्ध में स्थित है। 2. मुरली मनोहर मंदिर  यह मंदिर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण राजा संसारचंद ने 1790 में कराया था। 3.गौरी शंकर मंदिर  यह मंदिर हमिरपुर के सुजानपुर टिहरा में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण राजा संसारचंद ने 1793 ई. में करवाया था। बिलासपुर बिलासपुर जिला प्राचीन समय में कहलूर के नाम से जाना जाता था। इस जिले के महत्वपूर्ण मंदिर है: 1. श्री नैना देवी मंदिर  यह एक बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है। न सिर्फ हिमाचल बल्कि पूरे भारत वर्ष में इसकी मान्यता है। यह इक्यावन(51) शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां सती के नैन गिरे थे। इस मसन्दिर का निर्माण वीरचंद ने करवाया था। 2. गोपाल जी मंदिर  यह मंदिर भी भगवान मदन गोपाल को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण राजा आनंद चंद ने 1938 ई. में करवाया था। 3. देवभाटी मंदिर  देवभाटी मंदिर ब्रह्मपुखर का निर्माण राजा दीपचंद ने करवाया था। ऊना ऊना जिले के लोग बड़े धार्मिक विचारों के है। यहां के विभिन्न मंदिर इस प्रकार है: 1. चिंतपूर्णी मंदिर यह मंदिर भी हिमाचल में ही नही अपितु भारत वर्ष में प्रसिद्ध है। यह भी एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है ऐसी मान्यता है कि यहाँ माता का मस्तक गिरा था। इसलिए माता को छिन्नमस्ता भी कहते हैं। कुछ मान्यताएं कहती हैं कि यहां देवी के चरण गिरे थे। 2.भ्रमोति यह मंदिर भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। आप मे से बहुत कम इसके बारे में जानते होंगे क्योंकि ब्रह्मा जी के पूरे संसार मे केवल दो ही मंदिर है एक पुष्कर राजस्थान व दूसरा यहां ऊना में, परन्तु ये पुष्कर जितना प्रसिद्ध नहीं है। 3.गरीब नाथ यह मंदिर बहुत ही सुंदर जगह पर है। यह मंदिर सतलुज नदी के भीतर बना हुआ है तथा मंदिर में जाने के लिए नाव पे जाना पड़ता है। यहां पर शिवजी की भी एक बहुत ही सुंदर प्रतिमा है। सोलन सोलन में बहुत मंदिर है आपको यह जानकर खुशी होगी कि सोलन शहर का नाम वहां की देवी शूलिनी के नाम पर ही पड़ा है। यहां के प्रमुख मंदिर है: 1. शूलिनी देवी  यह मंदिर सोलन में ही स्थित है। हर वर्ष यहां पर शूलिनी माता का मेला लगता है। यह मेला एक सप्ताह तक चलता है। 2.जटोली मंदिर  यह मंदिर ओचघाट के समीप है। यह एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाता है। इसका नाम शिव की लम्बी लम्बी जटाओं से पड़ा है। 3. काली का टिब्बा  यह सोलन के चैल में स्थित काली देवी का मंदिर है। यहाँ से आप चुरचांदनी और शिवालिक पहाड़ियों का मनोरम दृश्य देख सकते है। सिरमौर सिरमौर में हिमाचल के काफी पवित्र स्थान है यहाँ भगवान परशुराम की माता रेणुका जी का मंदिर है व ऐसी मान्यता है कि वे यहां झील के रूप मे हैं।अन्य मुख्य मंदिर इस प्रकार है: 1. शिर्गुल मंदिर यह मंदिर चूड़धार पहाड़ी पर स्थित है।यह मंदिर भगवान शिर्गुल को समर्पित है। यह बहुत ही ऊंचाई पर स्थित है लगभग 3647 मी. ,यहां भगवान शिव की प्रतिमा है। 2. गायत्री मंदिर गायत्री माता को वेदों की माता भी कहा जाता है। यह मंदिर रेणुका में स्थित है। इस का निर्माण महात्मा पराया नंद ब्रह्मचारी ने करवाया था। 3. बाला सुंदरी मंदिर यह मंदिर सिरमौर के त्रिलोकपुर में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण दीप प्रकाश ने 1573 ई. में करवाया था यरह माता बाल सुंदरी को समर्पित है। मंडी मंडी को हिमाचल की छोटी काशी भी कहते है। यहाँ पर इक्यासी(81) मंदिर है जबकि वाराणसी में अस्सी(80) मंदिर है। जिले के मुख्य मंदिर इस प्रकार है: 1. भूतनाथ मंदिर राजा अजबर सेन ने इस मंदिर का निर्माण 1526 ई. में करवाया था।यह मंदिर मंडी में स्थित है। 2 श्यामाकाली मंदिर यह मन्दिर मंडी में स्थित है तथा इसका निर्माण राजा श्यामसेन ने करवाया था। 3 पराशर मंदिर यह मंदिर बाणसेन ने बनवाया था। यह मंडी की प्रसिद्ध झील पराशर के किनारे स्थित है। शिमला हिमाचल की राजधानी शिमला तो आप सब से परिचित ही है। आप सब को यह जान कर हैरानी होगी कि शिमला का नाम भी किसी देवी के नाम पर पड़ा है। जी हाँ शिमला का नाम श्यामला देवी से पड़ा है। श्यामला देवी भगवती काली का दूसरा नाम है। यहाँ के प्रमुख मंदिर है: 1. जाखू मंदिर ऐसी मान्यता है कि जब श्री हनुमान जी लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लेने गए थे तो उन्होंने यहां पर विश्राम किया था।यह मंदिर शिमला के जाखू में स्थित है। यह भगवान हनुमान जी को समर्पित है।यहाँ हनुमान जी की 108 फुट ऊंची मूर्ति बनाई गई है। 2. सूर्य मंदिर यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है। कोणार्क के बाद ये दूसरा सूर्य मंदिर है भारत में। यह शिमला के ‘नीरथ ‘ में स्थित है। 3 कालीबाड़ी मंदिर यह मंदिर शिमला में स्थित है। यह मंदिर काली माता को समर्पित है।इन्हें ही श्यामला देवी भी कहा जाता है। इन्ही के नाम पर शिमला शहर का नामकरण हुया है। कुल्लू कुल्लू में बहुत देवी देवताओं ने वास किया था। कुल्लू राजवंश की कुल देवी माता हिडिम्बा को माना जाता है। निरमण्ड को कुल्लू की छोटी काशी कहते हैं।यहाँ के मुख्य मंदिर इस प्रकार है: 1. हिडिम्बा देवी हिडिम्बा देवी का मंदिर मानाली में स्थित है जिसे कुल्लू के राजा बहादुर सिंह ने 1553 ई. में बनवाया था। हिडिम्बा देवी भीम की पत्नी थी। यह मंदिर पैगोडा शैली का बना हुआ है। इस मंदिर में हर वर्ष मई के महीने में डूंगरी मेला लगता है। 2. बिजली महादेव मंदिर यह मंदिर कुल्लू से 14 किलोमीटर दूर ब्यास नदी के किनारे स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है यहां शिवलिंग पर बिजली गिरती है। 3. जामलु मंदिर यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध मलाणा गांव में स्थित है। मलाणा गांव में पूरे विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र आज भी मन जाता है। यह मंदिर जमदग्नि ऋषि को समर्पित है। कांगड़ा कांगड़ा जिला भी पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है यहाँ का ब्रृजेश्वरी मन्दिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते है व उनकी कई मनोकामनाएं पूर्ण होती है।यहाँ के मुख्य मंदिर इस प्रकार है: 1. बृजेश्वरी मंदिर यह मंदिर 51 शक्ति पीठो में से एक है। यहां माता सती का धड़ गिरा था। यह मंदिर कांगड़ा बस स्टॉप से 3 कम की दूरी पर स्थित है। 2. मसरूर मंदिर इस मंदिर को रॉक कट मंदिर भी कहते है। यह पांडवो द्वारा निर्मित बहुत ही प्राचीन मंदिर है। यह भगवान शिव को समर्पित है। इसे हिमाचल का अजंता भी कहते है।यह मंदिर कांगड़ा के नगरोटा सूरियां में स्थित है। 3. ज्वालामुखी मंदिर यह भी 51 शक्तिपीठों में से एक एक है।यहाँ माता सत्ती की जीभ गिरी थी। अकबर ने यहाँ सोने का छतर चढ़ाया था जो माता ने स्वीकार नहीं किया व वह किसी अन्य धातु में परिवर्तित हो गया। महाराजा रणजीत सिंह ने यहाँ 1813 ई . में स्वर्ण जल का गुम्बद बनवाया था। यह कांगड़ा जिले के ज्वालामुखी में स्थित है। किन्नौर यहाँ हिमाचल के अति प्राचीन मंदिर मिलते है।ऐसा मानना है कि पांडव अपने अज्ञात वास के दौरान यहाँ रहे थे।यहाँ के मंदिरों में मुख्यता लकडी व पत्थरो पे शिल्प के नमूने मिलते है।यहाँ के मुख्य ममंदिर इस प्रकार है: 1.चंडिका मंदिर यह मंदिर किन्नौर के कोठी में स्थित है तथा यह माता चंडिका को समर्पित है। चंडिका बाणासुर की पुत्री थी। चंडिका माता को दुर्गा माता का स्वरूप माना जाता है। 2. माठि देवी मंदिर यह मंदिर छितकुल जो भारत का आखिरी गांव है वहाँ स्थित है। छितकुल गांव के लोग माठि देवी को बहुत मानते है। 3. मोरंग मंदिर किन्नौर यह पांडवो द्वारा निर्मित बहुत ही सुंदर मन्दिर है। यह पहाड़ की चोटी पर स्थित है तथा प्राचीन समय में पांडवो ने इस के निर्माण करवाया था। किन्नौर के लोग आज भी इस मंदिर को बड़ा मानते है। चम्बा चम्बा जिला को शिव भूमि भी कहा जाता है।यहाँ शिव जी का निवास स्थान मणिमहेश भी है।हर वर्ष लोग मणिमहेश की यात्रा में बड़ चड कर भाग लेते है।यह यात्रा मुख्यता जुलाई -अगस्त मास में होती है।यहां के अन्य मुख्य मंदिर है: 1. लक्ष्मी देवी मंदिर इस मंदिर का निर्माण साहिल वर्मन द्वारा कराया गया था।यह चम्बा में स्थित है।यह मुख्यता छह मंदिरो का समूह है। 2 . सुई माता मंदिर यह मंदिर माता नैना देवी जो साहिल वर्मन की पत्नी थी उनको समर्पित है।माता नैना देवी ने चम्बा में पानी लाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था।यहाँ हर वर्ष उनकी याद में सुई मेला लगता है। 3. मणिमहेश मंदिर इस मन्दिर का निर्माण मेरु वर्मन ने करवाया था।चम्बा के भरमौर में चौरासी मंदिरो का समूह भी है।मणिमहेश यात्रा के समय इन मंदिरो के दर्शन जरूर करते है श्रद्धालु। लाहौल स्पीति लाहौल स्पीति हिमाचल का सबसे दुर्गम व सबसे बड़ा जिला है। यहाँ के लोग मुख्यता हिन्दू व बौद्ध धर्म को मानते है।यहाँ के प्रसिद्ध मंदिर इस प्रकार है: 1. मृकुला देवी यह मंदिर लाहौल के उदयपुर में स्थित है।इस मंदिर का निर्माण अजय वर्मन द्वारा करवाया गया था।यह मुख्यता लकड़ी से बना हुआ मंदिर है। 2. त्रिलोकीनाथ मंदिर यह मंदिर लाहौल स्पीति के उदयपुर में स्थित है। यहाँ पर अविलोकतेश्वर की मूर्ति है। यह मंदिर हिंदुयों और बोध दोनों सम्प्रदायों के लिए पूजनीय है। 3. गुरु घंटाल गोम्पा Gandhola Monastery लाहौल के तुपचलिंग गांव में स्थित है। यहाँ अविलोकतेश्वर की 8 वीं शताब्दी की मूर्ति है जिसका निर्माण पद्मसंभव नर करवाया था। यहाँ हर वर्ष जून माह में घंटाल उत्सव मनाया जाता है

हिमाचल  — को प्राचीन काल से ही देवभूमि के नाम से संबोधित किया गया है। यदि हम कहें कि हिमाचल देवी-देवताओं का निवास स्थान है तो बिल्कुल भी गलत नही होगा। हमारे कई धर्मग्रन्थों में भी हिमाचल वाले क्षेत्र का वर्णन मिलता है। महाभारत, पद्मपुराण और कनिंघम जैसे धर्मग्रन्थों में इस भू-भाग का जिक्र कई बार आता है। इस सब से हम अनुमान लगा सकते है कि यह पवित्र भूमि आदि काल से ही देवी-देवताओं की प्रिय रही है। इसलिए ऐसी पावन धरा पर जन्म लेना और यहां जीने का अवसर मिलना सौभाग्य की बात है। आज हम हिमाचल के अलग-अलग जिलो में महत्वपूर्ण मंदिरों की बात करेंगे।

Temples of himachal pradesh , all temples in himachal pradesh , famous temples of himachal pradesh , temples in hamirpur , temples in bilaspur , temples in una , temples in solan, temples in shimla, temples in sirmour , temples in mandi , temples in kullu , temples in kangra, temples in kinnaur, temples in chamba , temples in lahul spiti , हिमाचल  — को प्राचीन काल से ही देवभूमि के नाम से संबोधित किया गया है। यदि हम कहें कि हिमाचल देवी-देवताओं का निवास स्थान है तो बिल्कुल भी गलत नही होगा। हमारे कई धर्मग्रन्थों में भी हिमाचल वाले क्षेत्र का वर्णन मिलता है। महाभारत, पद्मपुराण और कनिंघम जैसे धर्मग्रन्थों में इस भू-भाग का जिक्र कई बार आता है। इस सब से हम अनुमान लगा सकते है कि यह पवित्र भूमि आदि काल से ही देवी-देवताओं की प्रिय रही है। इसलिए ऐसी पावन धरा पर जन्म लेना और यहां जीने का अवसर मिलना सौभाग्य की बात है। आज हम हिमाचल के अलग-अलग जिलो में महत्वपूर्ण मंदिरों की बात करेंगे। हमीरपुर हमीरपुर में वैसे तो अनगिनत मंदिर है परंतु इस जिले के कुछ महत्वपूर्ण मंदिर इस तरह से हैं: 1. बाबा बालक नाथ  यह मंदिर शिवालिक पहाड़ियों पे स्थित है। यह हमीरपुर के दियोटसिद्ध में स्थित है। 2. मुरली मनोहर मंदिर  यह मंदिर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण राजा संसारचंद ने 1790 में कराया था। 3.गौरी शंकर मंदिर  यह मंदिर हमिरपुर के सुजानपुर टिहरा में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण राजा संसारचंद ने 1793 ई. में करवाया था। बिलासपुर बिलासपुर जिला प्राचीन समय में कहलूर के नाम से जाना जाता था। इस जिले के महत्वपूर्ण मंदिर है: 1. श्री नैना देवी मंदिर  यह एक बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है। न सिर्फ हिमाचल बल्कि पूरे भारत वर्ष में इसकी मान्यता है। यह इक्यावन(51) शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां सती के नैन गिरे थे। इस मसन्दिर का निर्माण वीरचंद ने करवाया था। 2. गोपाल जी मंदिर  यह मंदिर भी भगवान मदन गोपाल को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण राजा आनंद चंद ने 1938 ई. में करवाया था। 3. देवभाटी मंदिर  देवभाटी मंदिर ब्रह्मपुखर का निर्माण राजा दीपचंद ने करवाया था। ऊना ऊना जिले के लोग बड़े धार्मिक विचारों के है। यहां के विभिन्न मंदिर इस प्रकार है: 1. चिंतपूर्णी मंदिर यह मंदिर भी हिमाचल में ही नही अपितु भारत वर्ष में प्रसिद्ध है। यह भी एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है ऐसी मान्यता है कि यहाँ माता का मस्तक गिरा था। इसलिए माता को छिन्नमस्ता भी कहते हैं। कुछ मान्यताएं कहती हैं कि यहां देवी के चरण गिरे थे। 2.भ्रमोति यह मंदिर भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। आप मे से बहुत कम इसके बारे में जानते होंगे क्योंकि ब्रह्मा जी के पूरे संसार मे केवल दो ही मंदिर है एक पुष्कर राजस्थान व दूसरा यहां ऊना में, परन्तु ये पुष्कर जितना प्रसिद्ध नहीं है। 3.गरीब नाथ यह मंदिर बहुत ही सुंदर जगह पर है। यह मंदिर सतलुज नदी के भीतर बना हुआ है तथा मंदिर में जाने के लिए नाव पे जाना पड़ता है। यहां पर शिवजी की भी एक बहुत ही सुंदर प्रतिमा है। सोलन सोलन में बहुत मंदिर है आपको यह जानकर खुशी होगी कि सोलन शहर का नाम वहां की देवी शूलिनी के नाम पर ही पड़ा है। यहां के प्रमुख मंदिर है: 1. शूलिनी देवी  यह मंदिर सोलन में ही स्थित है। हर वर्ष यहां पर शूलिनी माता का मेला लगता है। यह मेला एक सप्ताह तक चलता है। 2.जटोली मंदिर  यह मंदिर ओचघाट के समीप है। यह एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाता है। इसका नाम शिव की लम्बी लम्बी जटाओं से पड़ा है। 3. काली का टिब्बा  यह सोलन के चैल में स्थित काली देवी का मंदिर है। यहाँ से आप चुरचांदनी और शिवालिक पहाड़ियों का मनोरम दृश्य देख सकते है। सिरमौर सिरमौर में हिमाचल के काफी पवित्र स्थान है यहाँ भगवान परशुराम की माता रेणुका जी का मंदिर है व ऐसी मान्यता है कि वे यहां झील के रूप मे हैं।अन्य मुख्य मंदिर इस प्रकार है: 1. शिर्गुल मंदिर यह मंदिर चूड़धार पहाड़ी पर स्थित है।यह मंदिर भगवान शिर्गुल को समर्पित है। यह बहुत ही ऊंचाई पर स्थित है लगभग 3647 मी. ,यहां भगवान शिव की प्रतिमा है। 2. गायत्री मंदिर गायत्री माता को वेदों की माता भी कहा जाता है। यह मंदिर रेणुका में स्थित है। इस का निर्माण महात्मा पराया नंद ब्रह्मचारी ने करवाया था। 3. बाला सुंदरी मंदिर यह मंदिर सिरमौर के त्रिलोकपुर में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण दीप प्रकाश ने 1573 ई. में करवाया था यरह माता बाल सुंदरी को समर्पित है। मंडी मंडी को हिमाचल की छोटी काशी भी कहते है। यहाँ पर इक्यासी(81) मंदिर है जबकि वाराणसी में अस्सी(80) मंदिर है। जिले के मुख्य मंदिर इस प्रकार है: 1. भूतनाथ मंदिर राजा अजबर सेन ने इस मंदिर का निर्माण 1526 ई. में करवाया था।यह मंदिर मंडी में स्थित है। 2 श्यामाकाली मंदिर यह मन्दिर मंडी में स्थित है तथा इसका निर्माण राजा श्यामसेन ने करवाया था। 3 पराशर मंदिर यह मंदिर बाणसेन ने बनवाया था। यह मंडी की प्रसिद्ध झील पराशर के किनारे स्थित है। शिमला हिमाचल की राजधानी शिमला तो आप सब से परिचित ही है। आप सब को यह जान कर हैरानी होगी कि शिमला का नाम भी किसी देवी के नाम पर पड़ा है। जी हाँ शिमला का नाम श्यामला देवी से पड़ा है। श्यामला देवी भगवती काली का दूसरा नाम है। यहाँ के प्रमुख मंदिर है: 1. जाखू मंदिर ऐसी मान्यता है कि जब श्री हनुमान जी लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लेने गए थे तो उन्होंने यहां पर विश्राम किया था।यह मंदिर शिमला के जाखू में स्थित है। यह भगवान हनुमान जी को समर्पित है।यहाँ हनुमान जी की 108 फुट ऊंची मूर्ति बनाई गई है। 2. सूर्य मंदिर यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है। कोणार्क के बाद ये दूसरा सूर्य मंदिर है भारत में। यह शिमला के ‘नीरथ ‘ में स्थित है। 3 कालीबाड़ी मंदिर यह मंदिर शिमला में स्थित है। यह मंदिर काली माता को समर्पित है।इन्हें ही श्यामला देवी भी कहा जाता है। इन्ही के नाम पर शिमला शहर का नामकरण हुया है। कुल्लू कुल्लू में बहुत देवी देवताओं ने वास किया था। कुल्लू राजवंश की कुल देवी माता हिडिम्बा को माना जाता है। निरमण्ड को कुल्लू की छोटी काशी कहते हैं।यहाँ के मुख्य मंदिर इस प्रकार है: 1. हिडिम्बा देवी हिडिम्बा देवी का मंदिर मानाली में स्थित है जिसे कुल्लू के राजा बहादुर सिंह ने 1553 ई. में बनवाया था। हिडिम्बा देवी भीम की पत्नी थी। यह मंदिर पैगोडा शैली का बना हुआ है। इस मंदिर में हर वर्ष मई के महीने में डूंगरी मेला लगता है। 2. बिजली महादेव मंदिर यह मंदिर कुल्लू से 14 किलोमीटर दूर ब्यास नदी के किनारे स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है यहां शिवलिंग पर बिजली गिरती है। 3. जामलु मंदिर यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध मलाणा गांव में स्थित है। मलाणा गांव में पूरे विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र आज भी मन जाता है। यह मंदिर जमदग्नि ऋषि को समर्पित है। कांगड़ा कांगड़ा जिला भी पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है यहाँ का ब्रृजेश्वरी मन्दिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते है व उनकी कई मनोकामनाएं पूर्ण होती है।यहाँ के मुख्य मंदिर इस प्रकार है: 1. बृजेश्वरी मंदिर यह मंदिर 51 शक्ति पीठो में से एक है। यहां माता सती का धड़ गिरा था। यह मंदिर कांगड़ा बस स्टॉप से 3 कम की दूरी पर स्थित है। 2. मसरूर मंदिर इस मंदिर को रॉक कट मंदिर भी कहते है। यह पांडवो द्वारा निर्मित बहुत ही प्राचीन मंदिर है। यह भगवान शिव को समर्पित है। इसे हिमाचल का अजंता भी कहते है।यह मंदिर कांगड़ा के नगरोटा सूरियां में स्थित है। 3. ज्वालामुखी मंदिर यह भी 51 शक्तिपीठों में से एक एक है।यहाँ माता सत्ती की जीभ गिरी थी। अकबर ने यहाँ सोने का छतर चढ़ाया था जो माता ने स्वीकार नहीं किया व वह किसी अन्य धातु में परिवर्तित हो गया। महाराजा रणजीत सिंह ने यहाँ 1813 ई . में स्वर्ण जल का गुम्बद बनवाया था। यह कांगड़ा जिले के ज्वालामुखी में स्थित है। किन्नौर यहाँ हिमाचल के अति प्राचीन मंदिर मिलते है।ऐसा मानना है कि पांडव अपने अज्ञात वास के दौरान यहाँ रहे थे।यहाँ के मंदिरों में मुख्यता लकडी व पत्थरो पे शिल्प के नमूने मिलते है।यहाँ के मुख्य ममंदिर इस प्रकार है: 1.चंडिका मंदिर यह मंदिर किन्नौर के कोठी में स्थित है तथा यह माता चंडिका को समर्पित है। चंडिका बाणासुर की पुत्री थी। चंडिका माता को दुर्गा माता का स्वरूप माना जाता है। 2. माठि देवी मंदिर यह मंदिर छितकुल जो भारत का आखिरी गांव है वहाँ स्थित है। छितकुल गांव के लोग माठि देवी को बहुत मानते है। 3. मोरंग मंदिर किन्नौर यह पांडवो द्वारा निर्मित बहुत ही सुंदर मन्दिर है। यह पहाड़ की चोटी पर स्थित है तथा प्राचीन समय में पांडवो ने इस के निर्माण करवाया था। किन्नौर के लोग आज भी इस मंदिर को बड़ा मानते है। चम्बा चम्बा जिला को शिव भूमि भी कहा जाता है।यहाँ शिव जी का निवास स्थान मणिमहेश भी है।हर वर्ष लोग मणिमहेश की यात्रा में बड़ चड कर भाग लेते है।यह यात्रा मुख्यता जुलाई -अगस्त मास में होती है।यहां के अन्य मुख्य मंदिर है: 1. लक्ष्मी देवी मंदिर इस मंदिर का निर्माण साहिल वर्मन द्वारा कराया गया था।यह चम्बा में स्थित है।यह मुख्यता छह मंदिरो का समूह है। 2 . सुई माता मंदिर यह मंदिर माता नैना देवी जो साहिल वर्मन की पत्नी थी उनको समर्पित है।माता नैना देवी ने चम्बा में पानी लाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था।यहाँ हर वर्ष उनकी याद में सुई मेला लगता है। 3. मणिमहेश मंदिर इस मन्दिर का निर्माण मेरु वर्मन ने करवाया था।चम्बा के भरमौर में चौरासी मंदिरो का समूह भी है।मणिमहेश यात्रा के समय इन मंदिरो के दर्शन जरूर करते है श्रद्धालु। लाहौल स्पीति लाहौल स्पीति हिमाचल का सबसे दुर्गम व सबसे बड़ा जिला है। यहाँ के लोग मुख्यता हिन्दू व बौद्ध धर्म को मानते है।यहाँ के प्रसिद्ध मंदिर इस प्रकार है: 1. मृकुला देवी यह मंदिर लाहौल के उदयपुर में स्थित है।इस मंदिर का निर्माण अजय वर्मन द्वारा करवाया गया था।यह मुख्यता लकड़ी से बना हुआ मंदिर है। 2. त्रिलोकीनाथ मंदिर यह मंदिर लाहौल स्पीति के उदयपुर में स्थित है। यहाँ पर अविलोकतेश्वर की मूर्ति है। यह मंदिर हिंदुयों और बोध दोनों सम्प्रदायों के लिए पूजनीय है। 3. गुरु घंटाल गोम्पा Gandhola Monastery लाहौल के तुपचलिंग गांव में स्थित है। यहाँ अविलोकतेश्वर की 8 वीं शताब्दी की मूर्ति है जिसका निर्माण पद्मसंभव नर करवाया था। यहाँ हर वर्ष जून माह में घंटाल उत्सव मनाया जाता है

हमीरपुर

हमीरपुर में वैसे तो बहुत सारे मंदिर हैं परंतु इस जिले के कुछ महत्वपूर्ण मन्दिर इस तरह से हैं:

1. बाबा बालक नाथ 

यह मंदिर शिवालिक पहाड़ियों पे स्थित है। यह हमीरपुर के दियोटसिद्ध में स्थित है।

2. मुरली मनोहर मंदिर

यह मंदिर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। इस मन्दिर का निर्माण राजा संसारचंद ने 1790 में कराया था।

3.गौरी शंकर मंदिर 

यह मन्दिर हमिरपुर के सुजानपुर टिहरा में स्थित है। इस मन्दिर का निर्माण राजा संसारचंद ने 1793 ई. में करवाया था।


बिलासपुर

बिलासपुर जिला प्राचीन समय में कहलूर के नाम से जाना जाता था। इस जिले के महत्वपूर्ण मंदिर हैं :

1. श्री नैना देवी मंदिर

यह एक बहुत ही प्रसिद्ध मन्दिर है। न सिर्फ हिमाचल बल्कि पूरे भारत वर्ष में इसकी मान्यता है। यह इक्यावन(51) शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां सती के नैन गिरे थे। इस मन्दिर का निर्माण वीरचंद ने करवाया था।

2. गोपाल जी मंदिर

यह मन्दिर भी भगवान मदन गोपाल को समर्पित है। इस मन्दिर का निर्माण राजा आनंद चंद ने 1938 ई. में करवाया था।

3. देवभाटी मंदिर 

देवभाटी मन्दिर ब्रह्मपुखर का निर्माण राजा दीपचंद ने करवाया था।


ऊना

ऊना जिले के लोग बड़े धार्मिक विचारों के है। यहां के विभिन्न मंदिर इस प्रकार हैं :

1. चिंतपूर्णी मंदिर

यह मन्दिर भी हिमाचल में ही नही अपितु भारत वर्ष में प्रसिद्ध है। यह भी एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है ऐसी मान्यता है कि यहाँ माता का मस्तक गिरा था। इसलिए माता को छिन्नमस्ता भी कहते हैं। कुछ मान्यताएं कहती हैं कि यहां देवी के चरण गिरे थे।

2.भ्रमोति

यह मन्दिर भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। आप मे से बहुत कम इसके बारे में जानते होंगे क्योंकि ब्रह्मा जी के पूरे संसार मे केवल दो ही मन्दिर है एक पुष्कर राजस्थान व दूसरा यहां ऊना में, परन्तु ये पुष्कर जितना प्रसिद्ध नहीं है।

3.गरीब ना

यह मंदिर बहुत ही सुंदर जगह पर है। यह मंदिर सतलुज नदी के भीतर बना हुआ है तथा मन्दिर में जाने के लिए नाव पे जाना पड़ता है। यहां पर शिवजी की भी एक बहुत ही सुंदर प्रतिमा है।


सोलन

सोलन में बहुत मंदिर है आपको यह जानकर खुशी होगी कि सोलन शहर का नाम वहां की देवी शूलिनी के नाम पर ही पड़ा है। यहां के प्रमुख मंदिर हैं:

1. शूलिनी देवी 

यह मन्दिर सोलन में ही स्थित है। हर वर्ष यहां पर शूलिनी माता का मेला लगता है। यह मेला एक सप्ताह तक चलता है।

2.जटोली मंदिर 

यह मन्दिर ओचघाट के समीप है। यह एशिया का सबसे ऊंचा शिव मन्दिर माना जाता है। इसका नाम शिव की लम्बी लम्बी जटाओं से पड़ा है।

3. काली का टिब्बा 

यह सोलन के चैल में स्थित काली देवी का मन्दिर है। यहाँ से आप चुरचांदनी और शिवालिक पहाड़ियों का मनोरम दृश्य देख सकते है।


सिरमौर

सिरमौर में हिमाचल के काफी पवित्र स्थान है यहाँ भगवान परशुराम की माता रेणुका जी का मंदिर है व ऐसी मान्यता है कि वे यहां झील के रूप मे हैं।अन्य मुख्य मंदिर इस प्रकार हैं :

1. शिर्गुल मंदिर

यह मन्दिर चूड़धार पहाड़ी पर स्थित है।यह मंदिर भगवान शिर्गुल को समर्पित है। यह बहुत ही ऊंचाई पर स्थित है लगभग 3647 मी. ,यहां भगवान शिव की प्रतिमा है।

2. गायत्री मंदिर

गायत्री माता को वेदों की माता भी कहा जाता है। यह मन्दिर रेणुका में स्थित है। इस का निर्माण महात्मा पराया नंद ब्रह्मचारी ने करवाया था।

3. बाला सुंदरी मंदिर

यह मन्दिर सिरमौर के त्रिलोकपुर में स्थित है। इस मन्दिर का निर्माण दीप प्रकाश ने 1573 ई. में करवाया था यरह माता बाल सुंदरी को समर्पित है।





मंडी

मंडी को हिमाचल की छोटी काशी भी कहते है। यहाँ पर इक्यासी(81) मंदिर है जबकि वाराणसी में अस्सी(80) मंदिर हैं । जिले के मुख्य मंदिर इस प्रकार हैं :

1. भूतनाथ मंदिर

राजा अजबर सेन ने इस मन्दिर का निर्माण 1526 ई. में करवाया था।यह मन्दिर मंडी में स्थित है।

2 श्यामाकाली मंदिर

यह मन्दिर मंडी में स्थित है तथा इसका निर्माण राजा श्यामसेन ने करवाया था।

3 पराशर मंदिर

यह मन्दिर बाणसेन ने बनवाया था। यह मंडी की प्रसिद्ध झील पराशर के किनारे स्थित है।


शिमला

 

हिमाचल की राजधानी शिमला तो आप सब से परिचित ही है। आप सब को यह जान कर हैरानी होगी कि शिमला का नाम भी किसी देवी के नाम पर पड़ा है। जी हाँ शिमला का नाम श्यामला देवी से पड़ा है। श्यामला देवी भगवती काली का दूसरा नाम है। यहाँ के प्रमुख मंदिर हैं :

1. जाखू मंदिर

ऐसी मान्यता है कि जब श्री हनुमान जी लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लेने गए थे तो उन्होंने यहां पर विश्राम किया था।यह मन्दिर शिमला के जाखू में स्थित है। यह भगवान हनुमान जी को समर्पित है।यहाँ हनुमान जी की 108 फुट ऊंची मूर्ति बनाई गई है।

2. सूर्य मंदिर

यह मन्दिर भगवान सूर्य को समर्पित है। कोणार्क के बाद ये दूसरा सूर्य मन्दिर है भारत में। यह शिमला के ‘नीरथ ‘ में स्थित है।

3 कालीबाड़ी मंदिर

यह मंदिर शिमला में स्थित है। यह मन्दिर काली माता को समर्पित है।इन्हें ही श्यामला देवी भी कहा जाता है। इन्ही के नाम पर शिमला शहर का नामकरण हुया है।





कुल्लू

 

कुल्लू में बहुत देवी देवताओं ने वास किया था। कुल्लू राजवंश की कुल देवी माता हिडिम्बा को माना जाता है। निरमण्ड को कुल्लू की छोटी काशी कहते हैं।यहाँ के मुख्य मंदिर इस प्रकार हैं :

1. हिडिम्बा देवी

हिडिम्बा देवी का मन्दिर मानाली में स्थित है जिसे कुल्लू के राजा बहादुर सिंह ने 1553 ई. में बनवाया था। हिडिम्बा देवी भीम की पत्नी थी। यह मंदिर पैगोडा शैली का बना हुआ है। इस मंदिर में हर वर्ष मई के महीने में डूंगरी मेला लगता है।

2. बिजली महादेव मंदिर

यह मन्दिर कुल्लू से 14 किलोमीटर दूर ब्यास नदी के किनारे स्थित है। यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है यहां शिवलिंग पर बिजली गिरती है।

3. जामलु मंदिर

यह मन्दिर विश्व प्रसिद्ध मलाणा गांव में स्थित है। मलाणा गांव में पूरे विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र आज भी मन जाता है। यह मन्दिर जमदग्नि ऋषि को समर्पित है।


कांगड़ा

कांगड़ा जिला भी पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है यहाँ का ब्रृजेश्वरी मन्दिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते है व उनकी कई मनोकामनाएं पूर्ण होती है।यहाँ के मुख्य मंदिर इस प्रकार हैं :

1. बृजेश्वरी मंदिर

यह मंदिर 51 शक्ति पीठो में से एक है। यहां माता सती का धड़ गिरा था। यह मंदिर कांगड़ा बस स्टॉप से 3 कम की दूरी पर स्थित है।

2. मसरूर मंदिर

इस मंदिर को रॉक कट मंदिर भी कहते है। यह पांडवो द्वारा निर्मित बहुत ही प्राचीन मंदिर है। यह भगवान शिव को समर्पित है। इसे हिमाचल का अजंता भी कहते है।यह मंदिर कांगड़ा के नगरोटा सूरियां में स्थित है।

3. ज्वालामुखी मंदिर

यह भी 51 शक्तिपीठों में से एक एक है।यहाँ माता सत्ती की जीभ गिरी थी। अकबर ने यहाँ सोने का छतर चढ़ाया था जो माता ने स्वीकार नहीं किया व वह किसी अन्य धातु में परिवर्तित हो गया। महाराजा रणजीत सिंह ने यहाँ 1813 ई . में स्वर्ण जल का गुम्बद बनवाया था। यह कांगड़ा जिले के ज्वालामुखी में स्थित है।





किन्नौर

यहाँ हिमाचल के अति प्राचीन मंदिर मिलते है।ऐसा मानना है कि पांडव अपने अज्ञात वास के दौरान यहाँ रहे थे।यहाँ के मंदिरों में मुख्यता लकडी व पत्थरो पे शिल्प के नमूने मिलते है।यहाँ के मुख्य ममंदिर इस प्रकार है:

 

1.चंडिका मंदिर

यह मन्दिर किन्नौर के कोठी में स्थित है तथा यह माता चंडिका को समर्पित है। चंडिका बाणासुर की पुत्री थी। चंडिका माता को दुर्गा माता का स्वरूप माना जाता है।

2. माठि देवी मंदिर

यह मन्दिर छितकुल जो भारत का आखिरी गांव है वहाँ स्थित है। छितकुल गांव के लोग माठि देवी को बहुत मानते है।

3. मोरंग मंदिर किन्नौर

यह पांडवो द्वारा निर्मित बहुत ही सुंदर मन्दिर है। यह पहाड़ की चोटी पर स्थित है तथा प्राचीन समय में पांडवो ने इस के निर्माण करवाया था। किन्नौर के लोग आज भी इस मन्दिर को बड़ा मानते है।


चम्बा

चम्बा जिला को शिव भूमि भी कहा जाता है।यहाँ शिव जी का निवास स्थान मणिमहेश भी है।हर वर्ष लोग मणिमहेश की यात्रा में बड़ चड कर भाग लेते है।यह यात्रा मुख्यता जुलाई -अगस्त मास में होती है।यहां के अन्य मुख्य मंदिर हैं :

1. लक्ष्मी देवी मंदिर

इस मन्दिर का निर्माण साहिल वर्मन द्वारा कराया गया था।यह चम्बा में स्थित है।यह मुख्यता छह मंदिरो का समूह है।

2 . सुई माता मंदिर

यह मन्दिर माता नैना देवी जो साहिल वर्मन की पत्नी थी उनको समर्पित है।माता नैना देवी ने चम्बा में पानी लाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था।यहाँ हर वर्ष उनकी याद में सुई मेला लगता है।

3. मणिमहेश मंदिर

इस मन्दिर का निर्माण मेरु वर्मन ने करवाया था।चम्बा के भरमौर में चौरासी मंदिरो का समूह भी है।मणिमहेश यात्रा के समय इन मंदिरो के दर्शन जरूर करते है श्रद्धालु।





लाहौल स्पीति

लाहौल स्पीति हिमाचल का सबसे दुर्गम व सबसे बड़ा जिला है। यहाँ के लोग मुख्यता हिन्दू व बौद्ध धर्म को मानते हैं। यहाँ के प्रसिद्ध मंदिर इस प्रकार हैं :

1. मृकुला देवी

यह मन्दिर लाहौल के उदयपुर में स्थित है।इस मन्दिर का निर्माण अजय वर्मन द्वारा करवाया गया था।यह मुख्यता लकड़ी से बना हुआ मन्दिर है।

2. त्रिलोकीनाथ मंदिर

यह मन्दिर लाहौल स्पीति के उदयपुर में स्थित है। यहाँ पर अविलोकतेश्वर की मूर्ति है। यह मन्दिर हिंदुयों और बोध दोनों सम्प्रदायों के लिए पूजनीय है।

3. गुरु घंटाल गोम्पा

Gandhola Monastery लाहौल के तुपचलिंग गांव में स्थित है। यहाँ अविलोकतेश्वर की 8 वीं शताब्दी की मूर्ति है जिसका निर्माण पद्मसंभव नर करवाया था। यहाँ हर वर्ष जून माह में घंटाल उत्सव मनाया जाता है।


आशा है आप सब को यह छोटा सा प्रयास पसंद आया होगा। अगर आपको लगता है कि इस सूची में और मंदिर भी शामिल होने चाहिए थे तो कॉमेंट करके बताएं।


लेखक: प्रतीक बचलस 


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‘मानव सभ्यता का जन्म पृथ्वी पर हुआ है पर उसका अंत धरती पर होने के लिए नहीं बना है.’

पृथ्वी से 16 प्रकाश वर्ष दूर इस ग्रह पर हो सकती है जीवन की संभावना

क्रिस्टोफ़र नोलन को यूं ही एक Visionary निर्देशक नहीं कहा जाता. 2014 में आई Interstellar के ज़रिए वे बता चुके थे कि अगर हमारी धरती के हालात यूं ही बने रहे, तो हमें पृथ्वी का विकल्प तलाशने के लिए अनंत ब्रहांड में उतरना ही होगा. अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच परमाणु हमलों की संभावनाओं, दुनिया में तेज़ी से बढ़ती आबादी और ग्लोबल वॉर्मिंग जैसे कई खतरे हमारे सामने मुंह बाए खड़े हैं. ऐसे में वैज्ञानिकों की लगातार कोशिश बनी रहती है, एक ऐसे ग्रह को ढूंढने की, जहां पृथ्वी की तरह जीवन बसाया जा सके.

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यूनिवर्सिटी ऑफ़ टैक्सास Arlington (UTA) के Astrophysicists का मानना है कि धरती जैसा ही एक ग्रह महज 16 प्रकाश वर्ष दूर एक स्टार सिस्टम में मौजूद हो सकता है. इस खोज में एक भारतीय वैज्ञानिक भी शामिल है.

इन वैज्ञानिकों ने स्टार सिस्टम Gliese 832 की जांच की. जांच का मकसद इस सिस्टम में मौजूद एलियन वर्ल्ड में Exoplanets को ढूंढना था. Exoplanets दरअसल वो ग्रह होते हैं जो हमारे सोलर सिस्टम से बाहर होते है. जांच में सामने आया कि इस स्टार से 0.25 से लेकर 2.0 एस्ट्रोनॉमिकल यूनिट की दूरी पर पृथ्वी जैसा ग्रह होने की भी संभावना है. इस ग्रह का विन्यास (Configuration) भी काफी स्थायी था.

Gliese 832 एक Red Dwarf है, यानि एक ऐसा तारा जो छोटा है और इस जगह का तापमान भी सूरज की तुलना में ठंडा है. सूरज की तुलना में Gliese 832 का Mass आधा है. ये स्टार ज्यूपिटर जितने बड़े ग्रह Gliese 832b और एक पृथ्वी जितने बड़े ग्रह Gliese 832c की परिक्रमा कर रहा है.

पृथ्वी जैसे एक नए ग्रह की तलाश के मद्देनज़र ये महत्वपूर्ण शुरुआत है. Gliese 832b और Gliese 832c को रेडियल वेलोसिटी तकनीक की मदद से खोजा गया है. ये तकनीक सेंट्रल स्टार की रफ़्तार में होने वाले बदलावों को सामने लाती है.

इस यूनिवर्सिटी में फ़िजिक्स रिसर्चर सुमन सात्याल के मुताबिक, इस ग्रह का घन पृथ्वी की तुलना में 15 गुना ज़्यादा हो सकता है. ऐसी संभावना है कि ये सितारा पिछले 1 अरब सालों से स्थायी तौर पर अपनी कक्षा में परिक्रमा कर रहा हो. हालांकि दुनिया अभी तक प्रकाश की गति जितना तेज़ कोई भी यंत्र बना नहीं पाई है लेकिन अगर ऐसा होता है तो यूनिवर्स के कई और सोलर सिस्टम में जीवन की संभावना को तलाशने का प्रतिशत काफी बढ़ सकता है.

 


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विरासत के नियमों का पालन कर रहे इस गांव में पुलिस के आने पर भी प्रतिबंध है। किसी भी जाति के प्रेमी युगल जब तक इस मंदिर की सीमा में रहते हैं तब तक उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता….Read More!

 

जय बाबा जलाधारी मंदिर पालमपुर, यहां पहाड़ से निकलता था दूध

बाबा जलाधारी / दूधाधारी की पौराणिक कथा पालमपुर उपमंडल में सुलाह से करीब 21 किलोमीटर दूरी पर स्थित दूसरे अमरनाथ के नाम प्रसिद्ध बाबा जलाधारी मंदिर क्यारवां में श्रावण माह के हर सोमवार को भारी संख्या में श्रद्धालु शिव भगवान की पूजा अर्चना कर मनवांछित फल….Read More!

 

काठगढ़ महादेव, यहां है अदभुत आधा शिव आधा पार्वती रूप शिवलिंग, दो भागों का शिवरात्रि पर हो जाता है ‘मिलन’

काठगढ़ महादेव,  अर्धनारीश्वर अदभुत: शिवलिंग   धार्मिक दृष्टि से पूरा संसार ही शिव का रूप है। इसलिए शिव के अलग-अलग अद्भुत स्वरूपों के मंदिर और देवालय हर जगह पाए जाते हैं। ऐसा ही एक मंदिर स्थित है – हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित काठगढ़ महादेव । इस मंदिर….Read More

 

कामरू नाग :हिमाचल की एक झील जिसमें गड़ा है अरबों का खजाना!

आज हम आपको एक ऐसी झील के बारे में बताने जा रहे है जिसके बारे में कहा जाता है की उसमे अरबों रुपए का खजाना दफन है यह है हिमाचल प्रदेश  के पहाड़ो में स्थित कामरू नाग / कमरुनाग झील। यह झील हरे भरे देवदार के पेड़ो से घिरी हुई है जो .…Read More!

 

वास्तव में यह है कांगड़ा की शक्तिपीठ ज्वालामुखी देवी से जुड़ा इतिहास और पुराण, यहाँ अकबर ने भी मानी थी हार, होती है नौ चमत्कारिक ज्वाला की पूजा

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलोमीटर दूर ज्वालामुखी देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। ज्वाला मंदिर को जोता वाली मां का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता है। यह मंदिर माता के अन्य मंदिरों की तुलना में अनोखा है, क्योंकि यहां पर किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है, बल्कि पृथ्वी के गर्भ .…Read More!

 

जानिए क्यों पांडवों द्वारा निर्मित शिकारी देवी मंदिर पर आज तक छत नहीं लग पाई?

शिकारी देवी का यह मंदिर करसोग , जनजेलही घाटी में एक उच्चे शिखर पर 11000 फ़ीट की उचाई में स्थित है. मगर सबसे हैरत वाली बात ये  कि मंदिर पर छत नहीं लग पाई। कहा जाता है कि कई बार मंदिर पर छत लगवाने काम शुरू किया गया। लेकिन हर बार….Read More!

 

हत्यादेवी :हिमाचल में यह रहस्यमयी मंदिर साल में सिर्फ एक बार ही खुलता है, पुरोहित की एक गलती से यहां हत्यादेवी बन गई थी राजकुमारी.

हिमालय की गोद में बसे इस मंदिर का यह रहस्यमयी कक्ष साल में सिर्फ एक दिन के लिए ही खुलता है। यहां राजकुमारी के साथ कुछ ऐसा हुआ था कि वह हत्यादेवी बन गई थी। हत्यादेवी की एक गांव पर असीम कृपा है जबकि एक गांव के लोग यहां जाने से भी डरते हैं। आइए जानते हैं पूरी कहानी…Read More!

 

मणिमहेश : आज तक इस रहस्यमयी पहाड़ की ऊंचाई कोई नहीं नाप पाया

कैलाश पर्वत मणिमहेश, रहस्यमयी पहाड़, जिस पर चढ़ने की बात से भी कांपते हैं लोग, जानिए क्या है वास्तविकता:   भगवान शिव से जुड़े देश भर में ऐसे कई स्‍थान हैं जो भोलेनाथ के चमत्कारों के गवाह रहे हैं। ऐसी ही एक जगह है मणिमहेश। कहते हैं भगवान शिव ने यहीं…..Read More!

 

एक गुफा में है गणेश जी के कटे हुए स‌िर का रहस्य

हिंदू धर्म में भगवान गणेश जी को प्रथम पूज्य माना गया है। गणेश जी के जन्म के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव ने क्रोधवश गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया था, बाद में माता पार्वतीजी के कहने पर….Read More!

 

शिव बाड़ी :कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की नगरी, जानिए मंदिर से जुड़ा इतिहास और पुराण

शिव बाड़ी यानी शिव का वास स्थान। गगरेट स्थित प्राचीन द्रोण शिव मंदिर | कहते हैं कि यह स्थल महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की नगरी थी। यहां भगवान शिव का एवं भव्य मंदिर है।धारणा है कि शिव बाड़ी निर्माण स्वयं शिवजी ने किया था। कहते….Read More!

हिमाचल में यहां है पांडवों द्वारा निर्मित बेजोड़ कला का नमूना रॉक कट मसरूर मंदिर!

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हिमाचल प्रदेश की धरती दार्शनिक स्थलों व देवस्थलों के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है।  ऐसा ही एक धार्मिक स्थल  नगरोटा सूरियां से तकरीबन 11 किलोमीटर की दूरी पर मसरूर पंचायत में स्थित है जोकि रॉक कट टेंपल के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर को पांडवों द्वारा अपने अज्ञातवास के दौरान विशालकाय चट्टानों को तराश कर बनाया गया है। इस मंदिर के बीच चौबीस छोटे मंदिर तथा इसके सामने एक विशालकाय तालाब स्थित है।

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कथानुसार इस मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा अपने अज्ञातवास के दौरान शुरू किया गया था तथा एक ही रात में इस मंदिर को पूर्णतया बनाने का लक्ष्य रखा गया था। पांडवों द्वारा छह महीने की एक ही रात बना दी गई। इसी के पास एक तेलन कोहलू चलाकर तेल निकालने का कार्य करती थी तथा रात को उसने इकट्ठे ही छह माह की सरसों का तेल निकाल लिया और रात उसके उपरांत भी खत्म नहीं हो पाई। तभी तेलन चिल्लाई कि यह कैसी रात है, उस चीख को पांडवों ने सुन लिया तथा मंदिर को आधा-अधूरा छोड़कर ही अन्यत्र कहीं चले गए।

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मंदिर का निर्माण योजनाबद्ध तरीके से किया गया है जिसमें केंद्रीय मंदिर का एक गर्भगृह है,  जिसमें पूर्व दिशा से चार स्तंभों युक्त एक मंडप के द्वारा प्रवेश किया जाता है। इस प्रवेश द्वार के दोनों तरफ दो छोटे प्रवेशद्वार हैं और उसी से आगे मंदिर से कुछ ही दूरी पर उत्तर व दक्षिण दिशा में दो और उपमंदिर हैं जहां से मंदिर की छत को जाने के लिए सीढ़ीनुमा रास्ता बनाया गया है। मंदिर की दीवारों पर कलाकृतियां बनाई गई हैं।

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इनमें मुख्यताः गर्भगृह के पूर्वी दरवाजे के ललाटबिंब पर भगवान शिव की मूर्ति, दरवाजे के दोनों और गंगा और यमुना नदी, देवियां तथा अन्य स्थानों पर शिव, स्कंद, वैकुंठ, इंद्र, दुर्गा, कार्तिकेय, घोड़ों द्वारा चलित रथ पर सवार सूर्य, सिंहासनारूढ़ बुद्ध सहित काफी देवताओं के चित्रों की चित्रकारी की गई है। मुख्य मंदिर में आज भी राम, लक्ष्मण व माता सीता की पत्थर से बनी मूर्तियां स्थापित हैं जोकि 19वीं शताब्दी की हैं। मंदिर में आज भी इन तीनों विराजमान मूर्तियों की पूजा की जाती है।

हिमाचल प्रदेश में बहुत से प्राकृतिक स्थल, मंदिर और भव्य एवं अद्भुत धरोहरें मौजूद हैं जो न केवल देश अपितु विदेश से आने वाले लोगों को हिमाचल में बार-बार आने के लिए अपनी और आकर्षित करती है। ऐसा ही एक शैलोत्कीर्ण एकाश्म मन्दिर मसरूर चट्टानों (पर्वत) का फैला हुआ विशाल मन्दिर है जो (हिमाचल प्रदेश) के जिला कांगड़ा में बसा है। यह अदभुत मंदिर के रूप में वो धरोहर है जो यहां आने वाले लोगों को बार-बार आने के लिए प्रेरित करता है। मिट्टी रंग की चट्टानों को तराश कर आकर्षक शैली का रूप दिया गया है। बारीक छोटी-छोटी हस्तकला-शिल्प का सुन्दर नमूना है। इस हस्तकला-शिल्प को बारीकी से मिट्टी रंग की चट्टानों में गढ़ा गया है।

 

इसके आगे बहुत ही सुन्दर तालाब है। तालाब के आस-पास बुहत से सुन्दर फुल खिले हुए है। इतना ही नहीं अपितु तालाब के साथ खिलते सुन्दर फूल, हरी-भरी घास, प्राचीन वृक्ष, आम के वृक्ष आदि इसकी सुषमा को चार चांद लगाते हैं। तालाब के इर्द-गिर्द लोहे के जंगले हैं। इस मन्दिर में अद्भुत कारीगरी की गयी है या यूं कहना ठीक होगा कि यह मन्दिर कारीगरी का एक अद्भुत नमूना है। जो चट्टानों को तराश कर बनाया गया है। यह मन्दिर विश्व प्रसिद्ध है।

1905 ई. में कांगड़ा में आये विनाशकारी भूकंप ने इन एकाश्म मंदिरों को बहुत क्षति पहुंचाई

 

 

मसरूर के शैलोत्कीर्ण मंदिर कांगड़ा जिले में धर्मशाला से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थानीय शिवालिक बलुआ पत्थर की पहाड़ी और उसके संबंधित क्षेत्र लाहौर में पदस्थापित अंग्रेज़ अधिकारी ने इन स्मारकों में रूचि ली और इन्हें पुरातात्विक सामग्री वाले स्मारकों में शामिल किया। कांगड़ा में 1905 ई. आये विनाशकारी भूकंप ने इन एकाश्म मंदिरों को बहुत क्षति पहुंचाई। लेकिन 1891 ई. के अनुमार्गणीय संदर्भों से पता चलता है कि 1905 ई. में आए भूकंप से पहले के मौसम के प्रभाव के कारण दक्षिणी भाग काफी क्षतिग्रस्त हो गया था। इसके उपरांत भारतीय पुरात्व सर्वेक्षण ने 1912-13 ई. में केंद्रीय संरक्षित स्मारक के रूप में इन्हें अभिलेखित कर परिरक्षित किया।

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  • मंदिर समूह के बारे में कुछ रहस्यमयी, रोचक, लोकोक्तियां एवं कथाएं प्रचलित

भव्य एवं अद्भूत मंदिर समूह के बारे में कुछ रहस्यमयी, रोचक, लोकोक्तियां एवं कथाएं प्रचलित हैं। एक कथानक के अनुसार एक एकाश्म मंदिरों का निर्माण पांडवों द्वारा अपने अज्ञातवास के दौरान किया गया। मंदिरों की विशालता एवं उनकी बनावट को देखकर यह कहा जाता सकता है कि इन मंदिरों का निर्माण पंजाब के किसी जालन्धर राजवंश के अज्ञात शासक की सहायता से किया गया होगा जिसका साम्राज्य प्रत्यक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से कांगड़ा जिले तक फैला हुआ था।

 

पहाड़ी के ढलान पर जंगली क्षेत्र में फैली हुई विशाल निर्माण एवं वास्तु अवशेषों के आधार पर ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राचीन समय में मसरूर मंदिर के आस-पास एक नगर रहा होगा। ऐसी संभावना है कि जालन्धर शासकों को जब अपने मूल मैदानी क्षेत्र से निष्कासित कर दिया गया था तब उन्होंने इस क्षेत्रों को अपनी अस्थायी राजधानी बनाया होगा।

 

  • एक बड़े बलुआ पत्थर की पहाड़ी को काटकर किया गया है सोलह-मंदिरों का निर्माण

  • कालातीत में मसरूर मंदिर समूह में चट्टान को काटकर बनाए गए उन्नीस स्वतंत्र खड़े हुए मंदिर थे, परंतु वर्तमान में इनमें से कुछ ही शेष बचे हैं। मुख्य मंदिर ठाकुरद्वार मध्य में स्थित है, इसी के चारों ओर अन्य मंदिरों को इसी समरूपता में बनाया गया था। इनमें से सोलह-मंदिरों का निर्माण एक बड़े बलुआ पत्थर की पहाड़ी को काटकर किया गया है जबकि दो मंदिर मुख्य समूह से अलग स्वतंत्र रूप से दोनों किनारों पर निर्मित हैं।
    • पांडवों द्वारा निर्मित बेजोड़ कला का नमूना रॉक कट मसरूर मंदिर - Himachali Roots , हिमाचल में यहां है पांडवों द्वारा निर्मित बेजोड़ कला का नमूना रॉक कट मसरूर मंदिर , Rock Cut Temple Himachal Pradesh , Rock Cut Temple Kangra , Ajanta and Ellora of Himachal , Rock Cut Masroor Temple , temples of himachal pradesh
    • नागर-शैली में निर्मित इस मंदिर में वर्गाकार गर्भगृह, अंतराल, मंडप एवं मुखमंडप

    उत्तर पूर्व दिशा में स्थित मंदिर में उत्कीर्ण स्कन्द ठाकुरद्वार मंदिर का निर्माण गुफा के रूप में चटटान को विस्तृत रूप से अंलकृत किया गया है। मंदिर का द्वार उत्तर-पूर्व दिशा में है। गर्भगृह के मुख्यद्वार के ललाटबिम्ब पर उत्कीर्ण शिव की प्रतिमा से पता चलता है कि वास्तव में यह एक शिव मंदिर था। नागर-शैली में निर्मित इस मंदिर में वर्गाकार गर्भगृह, अंतराल, मंडप एवं मुखमंडप हैं।

  • मंडप व मुखमंडप का पता विशाल गोलाकार स्तंभों के भगनावशेषों से चलता है जो अभी भी मुख्य योजनानुसार अपनी जगह पर मौजूद हैं। मंदिर के मंडप एवं मूल-प्रसाद के बीच एक बृहद अंतराल है, जिसकी छत को बहुत सुंदर ढंग से अलंकृत किया गया है जिनमें सात खिले हुए कमल एवं हीरक अलंकरण प्रमुख हैं।
    • ललाटबिम्ब की शाखाएं 17 शिव आकृतियों से अलंकृत

    गर्भगृह का विशाल द्वारा पूर्ण रूप से अलंकृत है, जिनमें पांच द्वारशाखाएं एवं भारपट्ट हैं। ललाटबिम्ब की शाखाएं 17 शिव आकृतियों से अलंकृत हैं। इनके अलावा

    शक्ति-देवी की पांच अलग-अलग मूर्तियां हैं जिनमें द्वार के ऊपर बनी महेश्वरी, इन्द्राणी एवं तीन सिर वाली वज्र-वाराही को आसानी से पहचाना जा सकता है।

    • खुर, कुम्भ, कलश और कपोतपालिका अलंकरण मंदिर की पीठिका में प्रमुख

    • गर्भगृह के अंदर मध्य में एक उठी हुई पादपीठिका है जिसके ऊपर राम-लक्षण एवं सीता की पाषाण मूर्तियां हैं जोकि बाद के काल की प्रतीत होती हैं। मुख्य मंदिर का शिखर नागर शैली का है जिसमें नौ-भूमियां हैं, प्रत्येक भूमि के कोनों पर आमलक बने हैं। वरण्डिका के ऊपर चौड़े चैत्य कोष्ठ से सुसज्जित शिखर है, जो अत्यं जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। चारों दिशाओं में सुकनासिका के ऊपर तीन भद्रमुख बने हैं जोकि क्रमानुसार एक-दूसरे के ऊपर अवस्थित हैं। दो स्वास्तिकाकार देव-मंदिर मुख्य मंदिर समूह से दोनों कर्ण-पाशर्व पर अलग से अवस्थित हैं।
    • उनमें से उत्तर-पूर्वी दिशा में स्थित मंदिर पूर्ण अवस्था में है। मंदिर की पीठिका में खुर, कुम्भ, कलश और कपोतपालिका अलंकरण प्रमुख हैं। मंदिरों की दीवारों में बने हुए अलंकृत आलों में इंद्र, शिव, दुर्गा व कार्तिकेय की मूर्तियां उत्कीर्ण है। दीवारों के ऊपर मण्डित वरण्डिका भाग को चैत्य कोष्ठों से सुसज्जित किया गया है। पूर्वी द्वार के उतरंग पर सात देवी-देवताओं को दर्शाया गया है जिनके मध्य में शिव अवस्थित हैं। उत्तरी प्रवेश द्वार के उतरंग पर पांच देवियों को दर्शाया गया है जिनके मध्य लक्ष्मी विराजमान है। अन्य प्रवेश द्वारों की द्वार शाखा एवं उतरंग पर कमलाकृति एवं पत्रलता का अलंकरण उत्कीर्ण हैं।
      • पहाड़ी की पूर्वी दिशा में कुछ शैलोत्कीर्ण गुफाएं एवं एक तालाब

      मुख्य मंदिर समूह के अतिरिक्त पहाड़ी की पूर्वी दिशा में कुछ शैलोत्कीर्ण गुफाएं एवं सम्मुख एक तालाब है, जो विद्वानों और पर्यटकों को ध्यान सहसा ही अपनी ओर आकृष्ट करती हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि ये गुफाएं शैव-धर्मावलम्बियों एवं अनुयायियों के आवास-गृह थे। मंदिर समूह के सामने निर्मित तालाब में असंख्य मछलियां हैं। यहां पर आने वाले पर्यटक इन जल-क्रीड़ारत मछलियों के खेल का आनंद उठाते हैं।

 


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हत्यादेवी :हिमाचल में यह रहस्यमयी मंदिर साल में सिर्फ एक बार ही खुलता है, पुरोहित की एक गलती से यहां हत्यादेवी बन गई थी राजकुमारी.

हिमालय की गोद में बसे इस मंदिर का यह रहस्यमयी कक्ष साल में सिर्फ एक दिन के लिए ही खुलता है। यहां राजकुमारी के साथ कुछ ऐसा हुआ था कि वह हत्यादेवी बन गई थी। हत्यादेवी की एक गांव पर असीम कृपा है जबकि एक गांव के लोग यहां जाने से भी डरते हैं। आइए जानते हैं पूरी कहानी…Read More!

आज हम आपको पहाड़ों पर बसे देवी भीमाकाली मंदिर की परंपरा शक्ति और इतिहास से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं

भीमाकाली मंदिर के साथ अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं जिनके अनुसार आदिकाल मंदिर के स्वरूप का वर्णन करना कठिन है परंतु पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि वर्तमान भीमाकाली मंदिर सातवीं-आठवीं शताब्दी के बीच बना है। भीमाकाली शिवजी की अनेक मानस पुत्रियों में ….Read More!

जानिए क्या है बाबा बालकनाथ जी एवं इनके पूजनीय स्थल दयोटसिद्ध से जुड़ा इतिहास और क्यों है विशेष मान्यता?

बाबा बालकनाथ जी की कहानी बाबा बालकनाथ अमर कथा में पढ़ी जा सकती है, ऐसी मान्यता है, कि बाबाजी का जन्म सभी युगों में हुआ जैसे कि सत्य युग,त्रेता युग,द्वापर युग और वर्तमान में कल युग और हर एक युग में उनको अलग-अलग नाम से जाना गया जैसे “सत युग” में….Read More!

शायद इससे आप वाकिफ न हो, आज हम आपको हिडिंबा देवी के मंदिर के इतिहास से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश— के कुल्‍लू में मनाली में स्थित हिडिंबा देवी का मंदिर है। इसका इतिहास पांडवों से जुड़ा हुआ है। शायद इससे आप वाकिफ न हो। आपको इसी मंदिर के इतिहास आज हम रू-ब-रू कराने जा रहे हैं। आप जानते हैं कि जुए में सब कुछ हारने पर धृतराष्ट्र व दुर्योधन ने पाण्डवों को वारणावत नाम ….Read More!

 

भोलेनाथ ने भक्तों को बचाने के लिए यहां किया ‌था चमत्कार, जानिए शिरगुल मंदिर का इतिहास

विशालकाय सांप से अपने भक्तों के बचाने के लिए भगवान शिव ने यहां अपना चमत्कार दिखाया था। यहां आज भी किसी देवी देवता की मूर्ति स्‍थापित नहीं है लेकिन इसके बावजूद यहां आने वाले भक्तों की सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं। शिरगुल/ Shirgul मंदिर हिमाचल के…..Read More!

 

मणिमहेश : आज तक इस रहस्यमयी पहाड़ की ऊंचाई कोई नहीं नाप पाया

कैलाश पर्वत मणिमहेश, रहस्यमयी पहाड़, जिस पर चढ़ने की बात से भी कांपते हैं लोग, जानिए क्या है वास्तविकता:   भगवान शिव से जुड़े देश भर में ऐसे कई स्‍थान हैं जो भोलेनाथ के चमत्कारों के गवाह रहे हैं। ऐसी ही एक जगह है मणिमहेश। कहते हैं भगवान शिव ने यहीं…..Read More!

 

एक गुफा में है गणेश जी के कटे हुए स‌िर का रहस्य

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हिमाचल के कांगडा में स्थित शक्तिपीठ चामुण्डा, आइये जानें मंदिर से जुड़ा इतिहास एवं पुराण!

चामुण्डा देवी का मंदिर भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक है, जो कि पश्चिम पालमपुर से लगभग 10 किलोमीटर, कांगडा से 24 किलोमीटर व धर्मशाला से 15 किलोमीटर की दूरी पर, कांगडा जिले, हिमाचल प्रदेश में स्थित है। यह मंदिर माँ चामुंडा देवी का समर्पित है जोकि भगवती काली….Read More!

 

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रेणुका झील और मंदिर से जुड़ा इतिहास, मान्यता है कि भगवान परशुराम से मिलने आज भी आती हैं मां रेणुका हिमाचल के जिला सिरमौर की ये रेणुका झील दुनिया भर में प्रसिद्घ है। राज्य की सबसे बड़ी झील होने के साथ साथ इसे काफी पवित्र भी माना जाता है। झील….Read More!

 

पत्थर के मंदिरों की घाटी के नाम से प्रसिद्ध हाटकोटी मंदिर से जुड़ा इतिहास

हिमाचल के विख्‍यात मन्दिरों में से एक “माँ हाटकोटी” हिमाचल जिसे देवभूमि की संज्ञा प्राप्त है और यहां के देवी-देवताओं के प्रति लोगों की आस्था भी उतनी ही गहरी है। ना केवल प्रदेश के लोगों की अपितु यहां के देवी-देवताओं के प्रति प्रदेश के साथ-साथ अन्य देश-विदेशों से आने वाले….Read More!

 

तिरंगे को कहीं भी, कभी भी नहीं फहराया जा सकता, जानिये इससे जुड़े नियम

तिरंगे को कहीं भी, कभी भी नहीं फहराया जा सकता, जानिये इससे जुड़े नियम

15 अगस्त के दिन सारे देश ने आज़ादी की 70वीं सालगिरह को अपनी-अपनी तरह से मनाया. एक ओर जहां लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को अपनी उपलब्धि गिनवा रहे थे. वहीं दूसरी ओर बॉलीवुड भी आज़ादी की खुशियों को अपने ही अंदाज़ में बांट रहा था.

 

15 अगस्त को मनाते हुए प्रियंका चोपड़ा ने भी सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया, जिसके बाद सोशल मीडिया का एक ख़ास तबका उन्हें घेरने लगा और उनकी आलोचना करने लगा. दरअसल, प्रियंका ने 15 अगस्त की शाम अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें वो तिरंगे के रंग में रंगे स्कार्फ़ के साथ दिखाई दे रही हैं.

Independence Day #Vibes 🇮🇳#MyHeartBelongsToIndia #happyindependencedayindia #jaihind

A post shared by Priyanka Chopra (@priyankachopra) on

 

उनके इस वीडियो को डालते ही कुछ खास लोगों का देशप्रेम जाग गया और वो प्रियंका को ट्रोल करने लगे. कुछ लोग तो प्रियंका को नसीहत देने लगे और तिरंगे का अपमान करने के लिए उनसे माफ़ी मांगने के लिए कहने लगे. एक यूज़र ने तो यहां तक कहा कि ‘ये तुम्हारा दुप्पटा नहीं है, इसका सम्मान करना सीखो.’

 

लोगों के अंदर इस तरह से देश के लिए खड़ा होना वाकई काबिले तारीफ़ है, पर क्या प्रियंका की आलोचन करने वाले खुद राष्ट्रभक्ति की परिभाषा जानते हैं? इन तथाकथित देशभक्तों में अधिकतर वो लोग नज़र आते हैं, जो धारा में बहते हुए लैपटॉप और मोबाइल के पीछे छिप कर बिना राष्ट्रभक्ति की परिभाषा जाने खुद की देशभक्ति साबित करने पर तुले हुए हैं.

 

ऐसे लोगों के लिए आज हम थोड़ा ज्ञान लाये हैं कि देखो भाई, सबसे पहली बात ये है कि, जो प्रियंका ने दुपट्टा डाला हुआ था, वो तीन रंग का ज़रूर था, पर तिरंगा नहीं था. क्योंकि भाई तिरंगे में अशोक चक्र नाम की भी एक चीज़ होती है, जो प्रियंका के दुपट्टे में कहीं नज़र नहीं आ रही थी और रही बात इस दुप्पटे की, तो ऐसा दुपट्टा आपको बाज़ार में कहीं भी बड़े आराम से मिल जाता है.

 

हां, यदि आप भी रेड लाइट या गली के पास वाली दुकान से तिरंगा खरीदते हैं, तो दोस्त आप भी उतने ही अपराधी हैं, जितना आप प्रियंका को मानते हैं. क्योंकि Flag Code Of India के मुताबिक, तिरंगे का सिर्फ़ और सिर्फ़ खादी के कपड़े से बना होना ज़रूरी है, जबकि आप खुद कई बार प्लास्टिक और नाइलोन के बने तिरंगे को खरीद चुके हैं.

चलो मान लिया कि आप खादी का तिरंगा ढूंढने में कामयाब हो जाते हैं, तो क्या आप इसे फहराने का सही तरीका जानते हैं? केसरिया रंग हमेशा ऊपर होना चाहिए ये, तो हम सब जानते हैं, पर ये हमेशा 90 डिग्री के कोण पर होना चाहिए. इसके साथ ही

 

  • हाथों से झंडा फहराते समय हरा रंग ऊपर की तरफ़ होना चाहिए. इसके पीछे लॉजिक ये है कि हाथों से तिरंगा फहराते समय हरा रंग पकड़ने पर केसरिया रंग आगे की तरफ़ आ जाता है. हाल ही में हुए महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप के मौके पर अक्षय कुमार भी ऐसा ही करते हुए दिखाई दिए थे.

तिरंगे को कहीं भी, कभी भी नहीं फहराया जा सकता, जानिये इससे जुड़े नियम , Indian flag hoisting rules

  • ऐसे ही कुछ नियम रात के समय तिरंगे को फहराते हुए भी है. दरअसल, रात को तिरंगा फहराते हुए उस पर रौशनी का होना ज़रूरी है. अब रात के समय घर की छत्त पर तिरंगा फहराने वाले रौशनी का कितना ख़्याल रखते हैं, ये तो हम सब जानते हैं.

ख़ैर, बात निकली है, तो बहुत दूर तलक जायेगी.

 


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शनिदेव – कैसे हुआ जन्म और कैसे टेढ़ी हुई नजर

अक्सर शनि का नाम सुनते ही शामत नजर आने लगती है, सहमने लग जाते हैं, शनि के प्रकोप का खौफ खा जाते हैं। कुल मिलाकर शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है लेकिन असल में ऐसा है नहीं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि न्यायधीश या कहें दंडाधिकारी की भूमिका का निर्वहन करते हैं। वह अच्छे का परिणाम अच्छा और बूरे का बूरा देने वाले ग्रह हैं। अगर कोई शनिदेव के कोप का शिकार है तो रूठे हुए शनिदेव को मनाया भी जा सकता है। शनि जयंती का दिन तो इस काम के लिये सबसे उचित माना जाता है। आइये जानते हैं शनिदेव के बारे में, क्या है इनके जन्म की कहानी और क्यों रहते हैं शनिदेव नाराज।

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शनिदेव जन्मकथा

शनिदेव के जन्म के बारे में स्कंदपुराण के काशीखंड में जो कथा मिलती वह कुछ इस प्रकार है। राजा दक्ष की कन्या संज्ञा का विवाह सूर्यदेवता के साथ हुआ। सूर्यदेवता का तेज बहुत अधिक था जिसे लेकर संज्ञा परेशान रहती थी। वह सोचा करती कि किसी तरह तपादि से सूर्यदेव की अग्नि को कम करना होगा। जैसे तैसे दिन बीतते गये संज्ञा के गर्भ से वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना तीन संतानों ने जन्म लिया।

संज्ञा अब भी सूर्यदेव के तेज से घबराती थी फिर एक दिन उन्होंने निर्णय लिया कि वे तपस्या कर सूर्यदेव के तेज को कम करेंगी लेकिन बच्चों के पालन और सूर्यदेव को इसकी भनक न लगे इसके लिये उन्होंने एक युक्ति निकाली उन्होंने अपने तप से अपनी हमशक्ल को पैदा किया जिसका नाम संवर्णा रखा। संज्ञा ने बच्चों और सूर्यदेव की जिम्मेदारी अपनी छाया संवर्णा को दी और कहा कि अब से मेरी जगह तुम सूर्यदेव की सेवा और बच्चों का पालन करते हुए नारीधर्म का पालन करोगी लेकिन यह राज सिर्फ मेरे और तुम्हारे बीच ही बना रहना चाहिये।

अब संज्ञा वहां से चलकर पिता के घर पंहुची और अपनी परेशानी बताई तो पिता ने डांट फटकार लगाते हुए वापस भेज दिया लेकिन संज्ञा वापस न जाकर वन में चली गई और घोड़ी का रूप धारण कर तपस्या में लीन हो गई। उधर सूर्यदेव को जरा भी आभास नहीं हुआ कि उनके साथ रहने वाली संज्ञा नहीं सुवर्णा है। संवर्णा अपने धर्म का पालन करती रही उसे छाया रूप होने के कारण उन्हें सूर्यदेव के तेज से भी कोई परेशानी नहीं हुई। सूर्यदेव और संवर्णा के मिलन से भी मनु, शनिदेव और भद्रा (तपती) तीन संतानों ने जन्म लिया।

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एक अन्य कथा के अनुसार शनिदेव का जन्म महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में कश्यप यज्ञ से हुआ। छाया शिव की भक्तिन थी। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे तो छाया ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कि वे खाने-पीने की सुध तक उन्हें न रही। भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने के कारण उसका प्रभाव छाया के गर्भ मे पल रही संतान यानि शनि पर भी पड़ा और उनका रंग काला हो गया। जब शनिदेव का जन्म हुआ तो रंग को देखकर सूर्यदेव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता।

मां के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्यदेव बिल्कुल काले हो गये, उनके घोड़ों की चाल रूक गयी। परेशान होकर सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी इसके बाद भगवान शिव ने सूर्यदेव को उनकी गलती का अहसास करवाया।

 

सूर्यदेव अपने किये का पश्चाताप करने लगे और अपनी गलती के लिये क्षमा याचना कि इस पर उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला। लेकिन पिता पुत्र का संबंध जो एक बार खराब हुआ फिर न सुधरा आज भी शनिदेव को अपने पिता सूर्य का विद्रोही माना जाता है।

क्यों है शनिदेव की दृष्टि टेढ़ी

शनि देव के गुस्से की एक वजह उपरोक्त कथा में सामने आयी कि माता के अपमान के कारण शनिदेव क्रोधित हुए लेकिन वहीं ब्रह्म पुराण इसकी कुछ और ही कहानी बताता है। ब्रह्मपुराण के अनुसार शनिदेव भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थे। जब शनिदेव जवान हुए तो चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह हुआ। शनिदेव की पत्नी सती, साध्वी और परम तेजस्विनी थी लेकिन शनिदेव भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में इतना लीन रहते कि अपनी पत्नी को उन्होंनें जैसे भुला ही दिया।

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एक रात ऋतु स्नान कर संतान प्राप्ति की इच्छा लिये वह शनि के पास आयी लेकिन शनि देव हमेशा कि तरह भक्ति में लीन थे। वे प्रतीक्षा कर-कर के थक गई और उनका ऋतुकाल निष्फल हो गया। आवेश में आकर उन्होंने शनि देव को शाप दे दिया कि जिस पर भी उनकी नजर पड़ेगी वह नष्ट हो जायेगा। ध्यान टूटने पर शनिदेव ने पत्नी को मनाने की कोशिश की उन्हें भी अपनी गलती का अहसास हुआ लेकिन तीर कमान से छूट चुका था जो वापस नहीं आ सकता था अपने श्राप के प्रतिकार की ताकत उनमें नहीं थी। इसलिये शनि देवता अपना सिर नीचा करके रहने लगे।

 


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Patrode, Arbi Leaves, Colocasia leaves Snack Recipe

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About Arbi Leaves Snack ( Patrode ), a famous and seasonal dish of Himachal Pradesh.

 

Arbi Leaves Snack or Patrode , a succulent delicacy which is famous all over the world. Arbi Leaves Snack (Patrode) is one dish which makes its accompaniments tastier. With the overflow of flavours, Arbi Leaves Snack (Patrode) has always been everyone’s favourite. This recipe is the perfect one to try at home for your family.

 

It’s a get together at home and you realise that you want to make a Arbi Leaves Snack ( Patrode ), just the perfect situation when you realise that you need to know how to make the perfect Arbi Leaves Snack . So, at that time you can try out this delicious recipe. The recipe of Arbi Leaves Snack ( Patrode )is very simple and can be made in restaurant style using a few ingredients. The time taken while preparing Arbi Leaves Snack ( Patrode ) is 30.0.

 

This recipe of Arbi Leaves Snack ( Patrode ) is perfect to serve 5. Arbi Leaves Snack  is just the appropriate option to prepare when you have a get together or night party at home. And do remember that be it kids or grownups, everyone just absolutely love it. So do try it next time!

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Ingredients to make Arbi Leaves Snack ( Patrode )

  • 20 – Colocasia leaves (Arbi leaves)
  • 650 gm – Chickpea flour (Besan) Or Besan can be replaced with Maize Flour (Makki ka aata)
  • 4 tsp – Coriander powder (Dhaniya)
  • 2 tsp – Red chili powder
  • Hing- A pinch
  • 3 tsp – Turmeric powder (Haldi Powder)
  • 1 tsp – Ajwain
  • 4 tsp – Green chilies paste
  • 1 tsp – Garam masala
  • Salt to taste
  • 4 tsp – Garlic paste (Lahsun ka paste)
  • 4 tsp- Onion paste (Pyaj ka paste)
  • 5 tbsp – Mustard Oil (Sarson Ka Tel)
  • 1 tsp – Amchoor powder

 

How to make Arbi Leaves Snack (Patrode):

 

  1. 1) Wash the arbi leaves and soak it for 1 hour.
  2. 2) Mix all the ingredients together and make a paste by adding the mustard oil along with some water (do not make it too thick or too thin).
  3. 3) Take an arbi leaf, keep it faced down and apply the paste. Repeat this process with rest of the leaves as well.
  4. 4) Make a roll shape like a candy and keep aside.
  5. 5) Put some water along with all the arbi leaf rolls in a pressure cooker and close the lid. Cook on a medium heat till 4 whistles blow, then turn off the gas.
  6. 6) Once the pressure releases and it cools down. Take out all the rolls and keep them in the fridge for 30 mins.
  7. 7) Cut thin round pieces and shallow fry in mustard oil.
  8. 8) Serve it hot for best taste.

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शेषनाग की हुंकार से आज तक उबलता है यहाँ का पानी, जानिए क्या है मणिकर्ण के इस चमत्कार का रहस्य

शेषनाग की हुंकार से आजतक उबलता है यहाँ का पानी, जानिए क्या है मणिकर्ण के इस चमत्कार का रहस्य, manikaran hot water spring , manali , kullu , himachal , india

दोस्तो शुरू करने से पहले ही मैं बता दूँ , मणिकर्ण की इस कहानी से हमारा मतलब अन्धविश्वास फैलाना बिलकुल भी नहीं हैं एवं इस कहानी में हमनें अपनी तरफ से कोई भी रहस्य नहीं जोड़े हैं. जो कहानी आप पढ़ने जा रहे वो मणिकर्ण तीर्थ स्थल पर लिखी हुई है। ना तो हम इसे पूरी तरह से स्वीकार करते हैं और ना ही नकार सकते हैं। तो आइये अब शुरू करें:

 

मणिकर्ण —यूं ताे मनाली घूमने-फिरने वालों की पसंदीदा जगह है। वहां की वादियां, नजारे किसी काे भी मोह लेते हैं। लेकिन मनाली में एक धार्मिक जगह ऐसी है, जहां बर्फीली ठण्‍ड में भी पानी उबलता रहता है। मान्‍यता है कि शेषनाग के गुस्‍से के कारण यह पानी उबल रहा है।

 

इस जगह का नाम है मणिकर्ण। कहा जाता है कि शेषनाग ने भगवान शिव के क्रोध से बचने के लिए यहां एक दुर्लभ मणि फेंकी थी। इस वजह से यह चमत्कार हुआ और यह आज भी जारी है

 

मणिकर्ण में शेषनाग ने भगवान शिव के क्रोध से बचने के लिये यह मणि क्यों फेंकी, इसके पीछे की कहानी भी अनोखी है। मान्यताओं के अनुसार मणिकर्ण ऐसा सुंदर स्‍थान है, जहां भगवान शिव और माता पार्वती ने करीब 11 हजार वर्षों तक तपस्या की थी।

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मां पार्वती जब जल-क्रीड़ा कर रही थीं, तब उनके कानों में लगे आभूषणों की एक दुर्लभ मणि पानी में गिर गई थी। भगवान शिव ने अपने गणों को इस मणि को ढूंढने को कहा लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी मणि नहीं मिली। इससे भगवान शिव बेहद नाराज हो गए। यह देख देवता भी कांप उठे। शिव का क्रोध ऐसा बढ़ा कि उन्‍होंने अपना तीसरा नेत्र खोल लिया, जिससे एक शक्ति पैदा हुई। इसका नाम नैनादेवी पड़ा।

 

नैना देवी ने बताया कि दुर्लभ मणि पाताल लोक में शेषनाग के पास है। सभी देवता शेषनाग के पास गए और मणि मांगने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर शेषनाग ने दूसरी मणियों के साथ इस विशेष मणि को भी वापस कर दिया। हांलाकि वह इस घटनाक्रम से काफी नाराज भी हुए। शेषनाग ने जोर की फुंकार भरी, जिससे इस जगह पर गर्म जल की धारा फूट पड़ी। मणि वापस पाने के बाद पार्वती और शंकर जी प्रसन्‍न हो गए। तब से इस जगह का नाम मणिकर्ण पड़ गया।

 

मणिकरण स्थित गुरुनानक देव गुरुद्वारा

 

हिमाचल के मणिकरण का यह गुरुद्वारा बहुत ही प्रख्यात स्थल है। ज्ञानी ज्ञान सिंह लिखित “त्वरीक गुरु खालसा” में यह वर्णन है कि मणिकरण के कल्याण के लिए गुरु नानक देव अपने 5 चेलों संग यहाँ आये थे।

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गुरु नानक ने अपने एक चेले “भाई मर्दाना” को लंगर बनाने के लिए कुछ दाल और आटा मांग कर लाने के लिए कहा। फिर गुरु नानक ने भाई मर्दाने को जहाँ वो बैठे थे वहां से कोई भी पत्थर उठाने के लिए कहा। जब उन्होंने पत्थर उठाया तो वही से गर्म पानी का स्रोत बहना शुरू हो गया। यह स्रोत अब भी कायम है और इसके गर्म पानी का इस्तमाल लंगर बनाने में होता है। कई श्रद्धालू इस पानी को पीते और इसमें डुबकी लगाते हैं। कहते है के यहाँ डुबकी लगाने से मोक्ष प्राप्त होता है।

महाभारत के ग्रंथकार महारुशी वेद व्यास ने अपने “भविष्य पुराण” में लिखा था कि गुरु नानक के बाद सिखों के दसवे गुरु, गुरु गोबिंद सिंह अपने 5 प्यारों संग मणिकरण के दर्शन करेंगे।

 

मणिकर्ण-मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से:

मणिकर्ण भारत के हिमाचल प्रदेश राज्य में कुल्लू जिले के भुंतर से उत्तर पश्चिम में पार्वती घाटी में व्यास और पार्वती नदियों के मध्य बसा है, जो हिन्दुओं और सिक्खों का एक तीर्थस्थल है। यह समुद्र तल से १७६० मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और कुल्लू से इसकी दूरी लगभग ४५ किमी है। भुंतर में छोटे विमानों के लिए हवाई अड्डा भी है। भुंतर-मणिकर्ण सडक एकल मार्गीय (सिंगल रूट) है, पर है हरा-भरा व बहुत सुंदर। सर्पीले रास्ते में तिब्बती बस्तियां हैं। इसी रास्ते पर शॉट नाम का गांव भी है, जहां कई बरस पहले बादल फटा था और पानी ने गांव को नाले में बदल दिया था।

 

मणिकर्ण अपने गर्म पानी के चश्मों के लिए भी प्रसिद्ध है।[1] देश-विदेश के लाखों प्रकृति प्रेमी पर्यटक यहाँ बार-बार आते है, विशेष रूप से ऐसे पर्यटक जो चर्म रोग या गठिया जैसे रोगों से परेशान हों यहां आकर स्वास्थ्य सुख पाते हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां उपलब्ध गंधकयुक्त गर्म पानी में कुछ दिन स्नान करने से ये बीमारियां ठीक हो जाती हैं। खौलते पानी के चश्मे मणिकर्ण का सबसे अचरज भरा और विशिष्ट आकर्षण हैं। प्रति वर्ष अनेक युवा स्कूटरों व मोटरसाइकिलों पर ही मणिकर्ण की यात्रा का रोमांचक अनुभव लेते हैं।

 

पर्यटन एवँ तीर्थाटन

समुद्र तल से छह हजार फुट की ऊँचाई पर बसे मणिकर्ण का शाब्दिक अर्थ है, कान की बाली। यहां मंदिर व गुरुद्वारे के विशाल भवनों से लगती हुई बहती है पार्वती नदी, जिसका वेग रोमांचित करने वाला होता है। नदी का पानी बर्फ के समान ठंडा है। नदी की दाहिनी ओर गर्म जल के उबलते स्रोत नदी से उलझते दिखते हैं। इस ठंडे-उबलते प्राकृतिक संतुलन ने वैज्ञानिकों को लंबे समय से चकित कर रखा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यहाँ के पानी में रेडियम है।

 

मणिकर्ण में बर्फ खूब पड़ती है, मगर ठंड के मौसम में भी गुरुद्वारा परिसर के अंदर बनाए विशाल स्नानास्थल में गर्म पानी में आराम से नहाया जा सकता है, जितनी देर चाहें, मगर ध्यान रहे, अधिक देर तक नहाने से चक्कर भी आ सकते हैं। पुरुषों व महिलाओं के लिए अलग-अलग प्रबंध है। दिलचस्प है कि मणिकर्ण के तंग बाजार में भी गर्म पानी की आपुर्ति की जाती है, जिसके लिए विशेष रूप से पाइप भी बिछाए गए हैं। अनेक रेस्त्राओं और होटलों में यही गर्म पानी उपलब्ध है। बाजार में तिब्बती व्यवसायी छाए हुए हैं, जो तिब्बती कला व संस्कृति से जुडा़ सामान और विदेशी वस्तुएं उपलब्ध कराते हैं। साथ-साथ विदेशी स्नैक्स व भोजन भी।

 

इन्हीं गर्म चश्मों में गुरुद्वारे के लंगर के लिए बडे-बडे गोल बर्तनों में चाय बनती है, दाल व चावल पकते हैं। पर्यटकों के लिए सफेद कपड़े की पोटलियों में चावल डालकर धागे से बांधकर बेचे जाते हैं। विशेषकर नवदंपती इकट्ठे धागा पकडकर चावल उबालते देखे जा सकते हैं, उन्हें लगता हैं कि यह उनकी जीवन का पहला खुला रसोईघर है और सचमुच रोमांचक भी।

 

यहां पानी इतना खौलता है कि भूमि पर पांव नहीं टिकते। यहां के गर्म गंधक जल का तापमान हर मौसम में एक सामान ९४ डिग्री सेल्सियस रहता है। कहते हैं कि इस पानी की चाय बनाई जाए तो आम पानी की चाय से आधी चीनी डालकर भी दो गुना मीठी हो जाती है। गुरुद्वारे के विशालकाय किलेनुमा भवन में ठहरने के लिए पर्याप्त स्थान है। छोटे-बड़े होटल व कई निजी अतिथि गृह भी हैं। ठहरने के लिए तीन किलोमीटर पहले कसोल भी एक शानदार विकल्प है।

पर्वतारोहियों और पर्यटकों का स्वर्ग

 

मणिकर्ण अन्य कई मनलुभावन पर्यटक स्थलों का आधार स्थल भी है। यहां से आधा किमी दूर ब्रह्म गंगा है जहां पार्वती नदी व ब्रह्म गंगा मिलती हैं। यहां थोडी़ देर रुकना प्रकृति से जी भर मिलना है। डेढ़ किमी दूर नारायणपुरी है, ५ किमी दूर राकसट है, जहां रूप गंगा बहती हैं। यहां रूप का आशय चांदी से है। पार्वती पदी के बांई ओर १६ किलोमीटर दूर और १६०० मीटर की कठिन चढा़ई के बाद आने वाला सुंदर स्थल पुलगा जीवन अनुभवों में शानदार बढोतरी करता है। इसी प्रकार २२ किमी दूर रुद्रनाथ लगभग ८००० फुट की ऊंचाई पर बसा है और पवित्र स्थल माना जाता रहा है।

 

यहां खुल कर बहता पानी हर पर्यटक को नया अनुभव देता है। मणिकर्ण से लगभग २५ किमी दूर, दस हजार फुट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित खीरगंगा भी गर्म जल सोतों के लिए जानी जाती हैं। यहां के पानी में भी औषधीय तत्व हैं। एक स्थल पांडव पुल ४५ किमी दूर है। गर्मी में मणिकर्ण आने वाले रोमांचप्रेमी लगभग ११५ किमी दूर मानतलाई तक जा पहुंचते हैं। मानतलाई के लिए मणिकर्ण से तीन-चार दिन लग जाते हैं। सुनसान रास्ते के कारण खाने-पीने का सामान, दवाएं इत्यादि साथ ले जाना नितांत आवश्यक है।

 

इस दुर्गम रास्ते पर मार्ग की पूरी जानकारी रखने वाले एक सही व्यक्ति को साथ होना बहुत आवश्यक है। संसार से विरला, अपने प्रकार के अनूठे संस्कृति व लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था रखने वाला अद्भुत ग्राम मलाणा का मार्ग भी मणिकर्ण से लगभग १५ किमी पीछे जरी नामक स्थल से होकर जाता है। मलाणा के लिए नग्गर से होकर भी लगभग १५ किलोमीटर पैदल रास्ता है। इस प्रकार यह समूची पार्वती घाटी पर्वतारोहिण के शौकीनों के लिए स्वर्ग के समान है।

 

कितने ही पर्यटकों से छूट जाता है कसोल, जो कि मणिकर्ण से तीन किमी पहले आता है। यहां पार्वती नदी के किनारे, पेडों के बीच बसे खुलेपन में पसरी सफेद रेत, जो कि पानी को हरी घास से विलग करती है, यहां की दृश्यावली को विशेष बना देती है। यहां ठहरने के लिए हिमाचल पर्यटन के हट्स भी हैं।

 

मणिकर्ण की घुम्मकडी के दौरान आकर्षक पेड पौधों के साथ-साथ अनेक रंगों की मिट्टी के मेल से रची लुभावनी पर्वत श्रृंखलाओं के दृश्य मन में बस जाते हैं। प्रकृति के यहां और भी कई अनूठे रंग हैं। कहीं सुंदर पत्थर, पारदर्शी क्रिस्टल जो देखने में टोपाज जैसे होते है, मिल जाते हैं। तो कहीं चट्टानें अपना अलग ही आकार ले लेती हैं जैसे कि बीच सडक पर टकी ईगल्स नोज जो दूर से बिल्कुल किसी बाज के सिर जैसी लगती है। प्रकृति प्रेमी पर्यटकों को सुंदर ड्रिफ्टवुडस या फिर जंगली फूल-पत्ते मिल जाते हैं, जो उनके अतिथि कक्ष का स्मरणीय अंग बन जाते हैं और मणिकर्ण की रोमांचक स्मृतियों के स्थायी साक्ष्य बने रहते हैं।

मणिकर्ण से संबधित कुछ तथ्य

  • समुद्र तल से १७६० मीटर की ऊंचाई पर स्थित मणिकर्ण कुल्लू से ४५ किलोमीटर दूर है। भुंतर तक राष्ट्रीय राजमार्ग है जो आगे संकरे पहाडी़ रास्ते में परिवर्तित हो जाता है।
  • १९०५ में आए विनाशकारी भूकंप के बाद इस क्षेत्र का भूगोल बहुत-कुछ बदल गया था।
  • पठानकोट (२८५ किमी) और चंडीगढ़ (२५८ किमी) सबसे निकट के रेल स्टेशन हैं। दिल्ली से भुंतर के लिए प्रतिदिन उडा़न भी है।
  • मणिकर्ण किसी भी मौसम में जाया जा सकता हैं। लेकिन जनवरी में यहां बर्फ गिर सकती है। तब ठंड कडा़के की रहती है। मार्च के बाद से मौसम थोड़ा अनुकूल होने लगता है। बारिश में इस क्षेत्र की यात्रा खतरनाक हो सकती है। जाने से पहले मौसम की जानकारी अवश्य प्राप्त कर लें।
  • पार्वती नदी में नहाने का खतरा ना उठाएं। न केवल इस नदी का पानी बहुत ठंडा है, बल्कि वेग इतना तेज़ होता है कि कुशल से कुशल तैराक भी अपना संतुलन नहीं बना पाते। बहुत लोग दुर्घटना का शिकार हो चुके हैं क्योंकि एक पल की भी असावधानी, बचा पाने के किसी भी प्रयास को विफल कर देती है।

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