Chaurasi Temple Bharmour, Chamba, Himachal Pradesh – Himachali Roots

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Key Points About Chaurasi Temple :

1) The temples at Lakshana Devi and Ganesha are the oldest in the complex

 

2) There is a spellbinding brass idol of Lakshana Devi in her Mahishasurmardini avatar

 

3) The water of Ardh-Ganga or Gupt Ganga, a water source in a corner of the complex has religious significance

 

4) Bharmaur is also referred to as Shiv Bhoomi

 

5) Yamraj Temple

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Chaurasi Temple is located in the center of Bharmour town and it holds immense religious importance because of temples built around 1400 years ago. Life of people in Bharmour centres around the temple complex-Chaurasi, named so because of 84 shrines built in the periphery of Chaurasi Temple. Chaurasi is hindi word for number eighty four.

 

The beautiful shikhara style temple of Manimahesh occupies the center of the complex. It is believed that when 84 Siddhas, who had come from kurukshetra, were passing through Bharmour to visit Manimahesh, they fell in love with the calmness of Bharmour and reconciled to meditate here. Chaurasi Temple Complex was built approximately in 7th century, although repairs of many temples have been carried out in later period.

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There is another legend associated with Chaurasi temple complex. It is believed that shortly after Sahil Varman’s accession of Brahampura (ancient name of Bharmour), 84 yogis visited this place. They were greatly pleased with the King’s hospitality. As King had no heir, Yogis promised him ten sons. They were requested by the King to stay back in Brahampura till the prediction of Yogis was fulfilled. In due course of time the king was blessed with ten sons and a daughter. Daughter was named Champavati and because of liking of Champavati new capital Chamba was established.

 

It is believed that Chaurasi temple complex in Bharmour was built to honour these 84 Yogis and named Chaurasi after them. There are 84 big and small temples in Chaurasi temple complex.

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Chaurasi is a spacious level ground in center of Bharmour where the galaxy of temples mostly in the form of Shivlingas exists. The Chaurasi Temple Complex offers a delightful, clean and a scenic view.

 

Major temples at Chaurasi temple complex:

Ganesha Temple

Lakshana devi (Lakhna devi) Temple

Swami Kartik (kelang) Temple

Manimahesh temple (Lord Shiva)

Maa Chamunda Temple

Hanuman Temple

Maa Sheetla Temple

Dharameshwar Mahadev temple

Nandi temple

Jai krishan Giriji temple

Nar Singh temple

Ardh Ganga or Ardh Gaya

Trameshwar Mahadev

Surya linga Mahadev

Kuber Linga Mahadev

 

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जानिए The Great Khali की जिन्दगी के बारे में कुछ कमाल की बातें

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The Great Khali के नाम से जाने जाने वाले दलीप सिंह राणा हिमाचल के सिरमौर जिले के एक छोटे से गाँव घिरईना के रहने वाले है और  retired professional wrestler के तौर पर इन्हें लोग जानते है | The Great Khali अपने करियर को एक WWE में professional  wrestler के तौर पर अजमाने से पहले वो पंजाब पुलिस में एक अफसर के तौर पर काम किया करते थे | हालाँकि The Great Khali अब एक जाना पहचाना नाम है लेकिन यह सब यूँ ही नहीं हुआ इसके पीछे एक लम्बी संघर्ष भरी कहानी है तो चलिए इसे जानते है कि कैसे एक छोटे से गाँव से निकलकर खली ने अपनीय इ पहचान बनाई –

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The Great Khali biography in hindi

Early Life and Struggle / शुरूआती जिन्दगी और संघर्ष – खली का जन्म August 27, 1972 को हुआ खली के पारिवारिक पृष्ठभूमी की बात करें तो खली के समेत कुल सात भाई बहन थे जिनमे से The Great Khali बचपन से अच्छे शरीर के साथ साथ सेहत भी शानदार थी और इसकी बदौलत ही वो परिवार में सबसे अलग दिखते थे | खली के पिता एक किसान थे जाहिर है किसान होने के नाते आमदनी केवल इतनी ही होती है कि वो बस अपने परिवार को पाल पाते |

 

चूँकि पिता किसान थे इसलिए परिवार में बच्चो के बड़े होने के साथ साथ आर्थिक हालत अनुकूल नहीं थे इसलिए The Great Khali यानि दलीप को भी अपने दूसरे भाइयों के साथ मजदूरी का काम करना पड़ता था और वैसे शरीर फिट और दूसरे लोगो से अधिक क्षमता के कारण खली के लिए यह कोई मुश्किल काम तो नहीं था लेकिन फिर भी मजदूरी मजदूरी ही है और इन्हें शिमला में भी बहुत दिन मजदूरी का काम करना पड़ा |

 

खली के बारे में एक बात जो कंही पढने को मिलती है वो है कि समय के साथ The Great Khali का शरीर भीमकाय होता चला गया जिसकी वजह से इनके आकार के जूते भी नहीं आते थे जिसकी वजह से गाँव के बाहर किसी मोची से वो विशेष तौर पर बनवाए जाते थे और चूँकि खली अपनी भीम काया की वजह से कंही भी जाते तो आकर्षण का केंद्र तो बन ही जाते थे | लोग उन्हें बड़े अलग तरह से देखा करते थे और अक्सर लोगो की भीड़ उन्हें घेर कर कड़ी हो जाती थी |

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लोगो की इस आदत की वजह से The Great Khali को बड़ा ही असहज महसूस होता था और अक्सर इस वजह से झेंप जाते थे और यह तो हम सब जानते है कि अलग दिखने वाले इन्सान को लेकर लोगो की कई तरह की राय होती है कुछ लोग उस अलगपन को सकारात्मक द्रष्टि से देखते है वन्ही मस्ती करने वाले इसे लेकर सामने वाले का मजाक भी उडाया करते है और यही khali के साथ भी होता था |

हालाँकि जब की यह बात है तब तक देश में न तो NAREGA पर इतने लोग निर्भर थे और शायद इसी वजह से मजदूरी में भी कुछ अधिक पैसा नहीं कमा पाने के कारण The Great Khali को कभी कभी तो अपने भोजन का प्रबंध भी अधूरा पड़ता था | ऐसे में मजदूरी करके पैसे को जोड़ पाना तो दूर की बात थी और परिवार के पालन पोषण का सोचना भी एक तरह से असंभव था |

 

सालों तक ऐसा ही चलता रहा लेकिन एक दिन खली की किस्मत ने यू-टर्न लिया और जब वो शिमला में रह रहे थे तो शिमला में ही घूमने आये एक पंजाब पुलिस के अफसर की नजर उन पर पड़ी तो अब आप समझ सकते है कि खली पंजाब पुलिस में कैसे गये | खैर पंजाब पुलिस के उस अफसर ने खली के माली हालत को देखते हुए खुद खर्च करके उसे पंजाब बुलवाया और खली अपने भाई के साथ पंजाब पुलिस में भर्ती हो गये और अब पंजाब पुलिस को khali के रूप में एक शानदार पुलिस अफसर मिल गया था |

 

The Great Khali and WWE Journey- अब खली के लिए दूसरी चीजो के बारे में और अपने करियर के बारे में सोचना संभव हो गया था क्योंकि जब तक इन्सान की बुनियादी जरूरते पूरी नहीं होती है उसके लिए दूसरी किसी चीज को और जिन्दगी को बेहतर करने के बारे में सोचना भी असंभव होता है इसलिए जब खली के करियर में अब कोई रोड़ा नहीं रह गया था और पंजाब पुलिस के अफसर के रूप में काम करने के कारन The Great Khali की वितीय हालत सुधरने लगी और अब वो अपने करियर को किसी दूसरे मुकाम पर लेके जा सकते थे |

 

उन दिनों रेसलिंग के बारे में भी लोगो के मन में गजब का क्रेज था और इसलिए The Great Khali ने भी यह सपना देखा और इस पर काम करने के लिए खुद को तैयार करने में लग गये |  Ring Name Giant Singh के नाम से खली ने अमेरिका में बतौर  professional wrestler शुरुआत की और ये सन 2000 की बात है |

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उसके बाद WWE की तरह खली ने रुख किया जबकि इसके कई कारण है एक तो International level पर इस खेल को पूरी दुनिया जानती है और दूसरा इसमें खूब income भी होती है लेकिन इसमें जाने के लिए बहुत मेहनत और लगन की जरुरत होती है जैसा कि दुनिया के हर पैसे वाले काम को करने के लिए चाहिए होती है लेकिन यंहा भी खली ने एंट्री की और उन दिनों khali ने जैसे ही एंट्री की रिंग में उनके जाने के बाद बड़े बड़े पहलवान भी एक बार तो कम से कम उनसे भिड़ने से पहले सोचने पर मजबूर हो जाते |

 

जब उन्होंने पहले दस मिनट Undertaker जैसे पहलवान को हरा दिया तो दुनिया का ध्यान भी उनकी तरफ गया | उसके बाद एक एक करके उन्होंने कई बड़े अच्छे खासे पहलवानों को हराकर उन्होंने WWE का ख़िताब अपने नाम कर लिया और इसके बाद ये पहली बार हुआ कि किसी भारतीय ने ऐसा किया हो खैर बहुत कुछ ऐसा होता है जो पहली बार होता है तो इस तरह खली ने पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर दिया और ऐसे समय में गाँव के उस दौर में खली का मजाक उड़ाने वाले लोगों ने भी सोचा नहीं होगा कि khali एक दिन आगे चलकर इस कदर सफलता के मुकाम तय करेंगे |

 

Name and Fame -तो इस तरह The Great Khali  ने देश विदेश में नाम कमाते हुए पैसे भी खूब कमायें एक गाँव का आदमी जो कभी मेहनत मजदूरी करने के बाद भी एक एक पैसे के तरसता था और भरपेट खाना खाने के लिए भी पैसे पूरे नहीं पड़ते थे उस खली के हाथ में अब नाम और पैसा दोनों था और फिर khali को एक लम्बे संघर्ष के बाद सफलता मिली और इसके बाद उन्हें नाम के साथ साथ कई पुरस्कार भी मिले और अब खली के पास इतने पैसे है कि वो आराम से अपनी जिन्दगी जी सकते है और इसके अलावा वो अब अपने गाँव के विकास पर भी पैसे खर्च कर रहे है |

 

अब गाँव वाले भी खली को सम्मान की नजर से देखते है और कहते है कि उन्हें कभी यह उम्मीद नहीं थी कि खेतों में काम करने वाला यह लड़का एक दिन आगे जाकर एक इंटरनेशनल पहलवान बनेगा लेकिन अब यह पूरे गाँव के लिए गौरव की बात है और The Great Khali के हर बार  गाँव आने पर अच्छा ख़ासा जश्न का माहौल होता है और अब खली दूसरे लोगो को भी इस खेल के लिए प्रेरित करते है |

 

अभी हाल ही मे जयपुर में रामगढ रोड स्थित एक स्कूल में बच्चो को सम्बोधित करते हुए The Great Khali ने लड़कों को खेल के प्रति जागरूक होने के लिए प्रेरित किया और साथ ही उन्होंने कहा कि खिलाडिओं को स्पोर्ट्स बोर्ड में अवसर मिलने चाहिए | उन्होंने युवा लोगो को जो खेल के प्रति रूचि रखते है उन्हें उन्होंने dedication और मेहनत करने के लिए मोटीवेट किया और इस बारे में बात की कि “ देश में खेल जगत में सुधार के लिए बहुत सी काम हो रहे है लेकिन फिर भी अभी हालात ठीक होने में बहुत समय लगेगा | ” उनका इशारा उन राजनेताओं के लिए था जो खेल के बारे में जानकारी नहीं रखते है लेकिन फिर भी खिलाडिओं पर कमेन्ट करते रहते है क्योंकि एक राजनेता ने खली को नकली पहलवान कह दिया था | इस पर The Great Khali ने यह प्रतिक्रिया दी कि खेल मंत्रालय और खेल से जुड़े राजनेतिक पद उन्ही लोगो को मिलने चाहिए जिनका बैकग्राउंड खेल रहा हो |

 

The Great Khali and Bigboss – भारत के रियलिटी शो बिग बॉस में भी khali ने अक्टूबर 2010 में शिरकत की जिसमे उन्होंने first runner up के level पर हिस्सा लिया था और ऐसे में शो ने उनके आने के लिए खास इंतजाम किये थे और जिसमे खली के लिए खास तौर पर एक बेड को बनाया गया जो उनके वजन और कद के हिसाब से पूरा पड़ता हो |

 

Films and Television / फिल्मे और टेलीविज़न – The Great Khali ने दो hindi फिल्मो और चार हॉलीवुड फिल्मो में काम किया है इसके अलावा उनके कई सारे interviews उनकी life के बारे में जानने के लिए ON AIR हुए है और यह सब उसके बाद हुए है जब खली ने WWE का ख़िताब जीतकर पूरे दुनिया का ध्यान अपनी तरफ किया उसके बाद उनकी किस्मत ही बदल गयी |

 

Khali’s Thoughts about Life – खली के बारे में एक बात बहुत कम लोग जानते है कि khali एक बुनियादी सोच में Hindu है और बहुत अधिक धार्मिक भी है और ऐसे में khali हर दिन ध्यान करते है और साथ ही शराब और दूसरे नशों के बारे में उनकी सोच बेहद साफ़ है और वो इसके धुर विरोधी है | khali का ring name (WWE में मुकाबले के दौरान भिड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाला मैदान को ring कहते है ) “ The Great Khali “ भी हिन्दू देवी “माँ काली” से प्रेरित है क्योंकि हिन्दुओ में ऐसा माना जाता है कि “ माँ काली “ अथाह शक्ति का प्रतीक है |

 


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देवभूमि हिमाचल की विश्व प्रसिद्ध हिमाचली धाम आपके मुंह में पानी ला देगी!

देवभूमि हिमाचल प्रदेश जहां देश-विदेश में अपनी धर्म आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य, लोक संस्कृति, त्यौहार, व मेलों जैसी आलौकिक संस्कृति व रीति-रिवाजों के लिए विख्यात है, वहीं हिमाचल प्रदेश अपने पहाड़ी पारम्परिक खान-पान के लिए न केवल देश में ही, बल्कि विदेशों में भी अपने लज़ीज पहाड़ी व्यंजनों के लिए विशेष ख्याति प्राप्त किए हुए है। , himachali dham , kangri dham , madyali dham , himachali food ,

नहीं है आम… म्हारी हिमाचली धाम !

देवभूमि हिमाचल  प्रदेश जहां देश-विदेश में अपनी धर्म आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य, लोक संस्कृति, त्यौहार, व मेलों जैसी आलौकिक संस्कृति व रीति-रिवाजों के लिए विख्यात है, वहीं हिमाचल प्रदेश अपने पहाड़ी पारम्परिक खान-पान के लिए न केवल देश में ही, बल्कि विदेशों में भी अपने लज़ीज पहाड़ी व्यंजनों के लिए विशेष ख्याति प्राप्त किए हुए है।

 

इसी के चलते इस बार हम आपको हिमाचल प्रदेश के शादी ब्याह या अन्य मांगलिक अवसरों पर आयोजित सामूहिक भोजन जिसे हिमाचल में धाम कहते हैं के बारे में विस्तार से जानकारी देने जा रहे हैं। हिमाचल के सभी जिलों में अपने-अपने पारम्परिक तौर तरीकों से शादी ब्याह, त्यौहार, उत्सवों या अन्य मांगलिक अवसरों पर खाना परोसने का अपना ही एक अनूठा ढंग है। यह प्रथा पूर्वजों द्वारा कई सालों से चली आ रही है। जिसका पालन इस आधुनिकी युग में भी लोग भली-भांति रूप से कर रहे हैं।

देवभूमि हिमाचल प्रदेश जहां देश-विदेश में अपनी धर्म आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य, लोक संस्कृति, त्यौहार, व मेलों जैसी आलौकिक संस्कृति व रीति-रिवाजों के लिए विख्यात है, वहीं हिमाचल प्रदेश अपने पहाड़ी पारम्परिक खान-पान के लिए न केवल देश में ही, बल्कि विदेशों में भी अपने लज़ीज पहाड़ी व्यंजनों के लिए विशेष ख्याति प्राप्त किए हुए है। , himachali dham , kangri dham , madyali dham , himachali food ,

हिमाचली धाम की हम बात कर रहे हैं तो आपको पहले ये बात बता दें कि प्रदेश के हर जिले में धाम बनाने का अपना तरीका होता है। धाम का नाम लेते ही मुहं में पानी आ जाता है। तरह- तरह के स्वादिष्ट व्यंजन। शादी-ब्याह हो या फिर कोई और मागंलिक कार्य हिमाचली धाम की अपनी ही विशेषता है।

 

निचली पहाड़ी धाम में बनाए जाने वाले स्वादिष्ट व्यंजन चने का मदरा, माह की दाल, सेपू बड़िया, अरबी, राजमाह, पूड़े, खीर, मीठा कद्दू, या खटा कद्दू, वेदाना व कई अन्य व्यंजन बनाए जाते हैं। साथ ही अगर खाने में कढ़ी की बात न हो तो धाम अधूरी ही समझो। जी हां निचली पहाड़ी इलाकों में धाम में मीठे में वेदाना और कढ़ी ख़ास हैं। वहीं ऊपरी पहाड़ी इलाकों में जहां तीज-त्यौहारों में सीडू बनाए जाते हैं।

 

धाम में मीट और शाकाहरी धाम बनाई जाती है। मीट को ख़ास तौर से कई तरह से बनाया जाता है। लुह्न्दरी मीट, बुठा मीट व सुखा मीट आदि को विशेष रूप से धाम के लिए तैयार किया जाता है। वहीं शाकाहरी धाम में मटर पनीर, मटर मसरूम व अन्य कई दालें बनाई जाती हैं। मीठे में चावलों का बरंज बनाया जाता है। हिमाचली धाम के स्वादिष्ट होने की ख़ास वजह यह भी होती है कि इसमें गाँव के लोगों का अपना प्यार भी शामिल होता है। हिमाचल के हर जिले के हर गांव की यह ख़ास बात है कि सब लोग मिल-जुलकर हर खुशी, हर गम में एक-दूसरे के साथ सरीक होते हैं। वहीं शादी या फिर अन्य समारोह की बात कि जाए तो धाम बनाने के लिए विशेष रूप से बोटी यानि धाम बनाने वाले को बुलाया जाता है।

देवभूमि हिमाचल प्रदेश जहां देश-विदेश में अपनी धर्म आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य, लोक संस्कृति, त्यौहार, व मेलों जैसी आलौकिक संस्कृति व रीति-रिवाजों के लिए विख्यात है, वहीं हिमाचल प्रदेश अपने पहाड़ी पारम्परिक खान-पान के लिए न केवल देश में ही, बल्कि विदेशों में भी अपने लज़ीज पहाड़ी व्यंजनों के लिए विशेष ख्याति प्राप्त किए हुए है। , himachali dham , kangri dham , madyali dham , himachali food ,

जिनके घर समारोह होता है उनके घर गाँव के सब लोग मिलकर धाम बनाने में सहयोग देते हैं व अन्य काम में हाथ बंटाते हैं। कहीं- कहीं खाने को गाँव के लोगों द्वारा परोसा जाता है। दरी बिछाकर लोग पालथी मारकर जमींन में बैठकर धाम का आनन्द लेते हैं। खाना (टोर नामक बेल) के पत्तों के द्वारा बनाई प्लेट यानी पतल में दिया जाता है। जिससे धाम का स्वाद चार गुना बढ़ जाता है। पेट तो भर जाता है लेकिन मन नहीं भरता।

 

हिमाचल में जहां त्योहारों, पारंपरिक रीति-रिवाजों का अहम स्थान है, वहीं प्रदेश में हिमाचली व्यंजनों का भी अलग महत्व है। कांगड़ा में जहां कांगड़ी धाम प्रसिद्ध है, वहीं जिला मंडी में सेपु बडिय़ां, कुल्लू के सिड्डू, बिलासपुर की मांश की दाल प्रसिद्ध है। इसी प्रकार सिरमौर में असकली, पटांडे, सिडक़ु, धरोटी-भात, लुश्के, बिलोई का अपना अलग ही स्वाद व महत्व है।

धाम का मुख्य आकर्षण है सभी मेहमानों को समान रूप से, जमीन पर बिछी पंगत पर एक साथ बैठाकर खाना खिलाना। खाना आमतौर पर पत्तल पर ही परोसा जाता है और किसी-किसी क्षेत्र में साथ में डोने भी रखे जाते हैं।

 

हिमाचली खाना बनाने, परोसने व खाने की सैंकड़ों बरस पुरानी परंपरा के साथ-साथ एक कहावत भी पक चुकी है- पूरा चौका कांगड़े आधा चौका कहलूर, बचा खच्या बाघला धूढ़ धमाल हंडूर। इसके अनुसार चौके (रसोई) की सौ प्रतिशत शुद्घता तो कांगड़ा में ही है। कहलूर (बिलासपुर) क्षेत्र तक आते-आते यह पचास प्रतिशत रह जाती है। बचा खुचा बाघल (सोलन) तक और हंडूर (नालागढ़) क्षेत्र तक आते-आते धूल, मिट्टी में जूतों समेत बैठ कर खाना खा लिया जाता है।

 

देवभूमि हिमाचल प्रदेश जहां देश-विदेश में अपनी धर्म आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य, लोक संस्कृति, त्यौहार, व मेलों जैसी आलौकिक संस्कृति व रीति-रिवाजों के लिए विख्यात है, वहीं हिमाचल प्रदेश अपने पहाड़ी पारम्परिक खान-पान के लिए न केवल देश में ही, बल्कि विदेशों में भी अपने लज़ीज पहाड़ी व्यंजनों के लिए विशेष ख्याति प्राप्त किए हुए है। , himachali dham , kangri dham , madyali dham , himachali food , प्रदेश की राजधानी शिमला के ग्रामीण अंचल से शुरू करें तो वहां माह (उड़द) की दाल, चने की दाल, मदरा (स्पेशल सब्जी) के रूप में दही में बनाए सफेद चने, आलू, जिमीकंद, पनीर, माहनी (खट्टा) में काला चना या पकौड़े, मीठे में बदाणा या छोटे गुलाब जामुन। मीठे के बाद और मिठाई भी परोसी जाती है। हालांकि परंपरा के मुताबिक सभी पकवान एक निश्चित क्रम से आने चाहिए मगर समय के साथ थोड़ा बहुत बदलाव कई जगह आ चुका है।

 

चंबा में डोने भी पतल का साथ देते हैं। यहां चावल, मूंग साबुत, मदरा, माह, कढ़ी, मीठे चावल, खट्टा, मोटी सैंवियां खाने का हिस्सा हैं। यहां मदरा हैड बोटी (खाना बनाने वाली टीम का मुखिया) डालता है। किसी जमाने में बोटी पूरा अनुशासन बनाए रखते थे और खाना-पीना बांटने का सारा काम बोटी ही करते थे। एक पंगत से उठ कर दूसरी पंगत में बैठ नहीं सकते थे। खाने का सत्र पूरा होने से पहले उठ नहीं सकते थे। मगर जीवन की हड़बड़ाहट व अनुशासन की कमी ने बदलाव लाया है।

 

कांगड़ा में चने की दाल, माह (उड़द साबुत), मदरा (दही चना), खट्टा (चने अमचूर), पनीर मटर, राजमा, सब्जी (जिमीकंद, कचालू, अरबी), मीठे में ज्यादातर बेसन की रेडीमेड बूंदी, बदाणा या रंगीन चावल भी परोसे जाते हैं। यहां चावल के साथ पूरी भी परोसी जाती है। हमीरपुर में दालें ज्यादा परोसी जाती हैं। वहां कहते हैं कि पैसे वाला मेजबान दालों की संख्या बढ़ा देता है। मीठे में यहां पेठा ज्यादा पसंद किया जाता है मगर बदाणा व कद्दू का मीठा भी बनता है। राजमा या आलू का मदरा, चने का खट्टा व कढ़ी प्रचलित है।

 

ऊना में सामूहिक भोज को कुछ क्षेत्रों में धाम कहते हैं, कुछ में नहीं। पहले यहां नानकों, मामकों (नाना, मामा की तरफ से) की धाम होती थी। यहां पतलों के साथ दोने भी दिए जाते हैं विशेषकर शक्कर या बूरा परोसने के लिए। यहां चावल, दाल चना, राजमा, दाल माश खिलाए जाते हैं। दालें वगैरह कहीं-कहीं चावलों पर डलती है कहीं अलग से। यहां सलूणा (कढ़ीनुमा खाद्य, इसे बलदा भी कहते हैं) खास लोकप्रिय है। यह हिमाचली इलाका कभी पंजाब से हिमाचल आया था सो यहां पंजाबी खाने-पीने का खासा असर है।

 

बिलासपुर क्षेत्र में उड़द की धुली दाल, उड़द, काले चने खट्टे, तरी वाले फ्राइ आलू या पालक में बने कचालू, रौंगी (लोबिया), मीठा बदाणा या कद्दू या घिया के मीठे का नियमित प्रचलन है। समृद्घ परिवारों ने खाने में सादे चावल की जगह बासमती, मटर पनीर व सलाद भी खिलाना शुरू किया है। सोलन के बाघल (अर्की) तक बिलासपुरी धाम का रिवाज है। उस क्षेत्र से इधर एकदम बदलाव दिखता है। हलवा-पुरी, पटांडे खूब खाए खिलाए जाते हैं। सब्जियों में आलू गोभी या मौसमी सब्जी होती है। मिक्स दाल और चावल आदि भी परोसे जाते हैं। यहां खाना धोती पहन कर भी नहीं परोसा जाता है।

 

मंडी क्षेत्र के खाने की खासियत है सेपू बड़ी, जो बनती है बड़ी मेहनत से और खाई भी बड़े चाव से जाती है। यहां मीठा (मूंगदाल या कद्दू का), छोटे गुलाब जामुन, मटर पनीर, राजमा, काले चने (खट्टे), खट्टी रौंगी (लोबिया) व आलू का मदरा (दही लगा) व झोल (पकौड़े रहित पतली कढ़ी) खाया व खिलाया जाता है। कुल्लू का खाना मंडीनुमा है। यहां मीठा (बदाणा या कद्दू), आलू या कचालू (खट्टे), दाल राजमा, उड़द या उड़द की धुली दाल, लोबिया, सेपू बड़ी, लंबे पकौड़ों वाली कढ़ी व आखिर में मीठे चावल खिलाए जाते हैं।

देवभूमि हिमाचल प्रदेश जहां देश-विदेश में अपनी धर्म आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य, लोक संस्कृति, त्यौहार, व मेलों जैसी आलौकिक संस्कृति व रीति-रिवाजों के लिए विख्यात है, वहीं हिमाचल प्रदेश अपने पहाड़ी पारम्परिक खान-पान के लिए न केवल देश में ही, बल्कि विदेशों में भी अपने लज़ीज पहाड़ी व्यंजनों के लिए विशेष ख्याति प्राप्त किए हुए है। , himachali dham , kangri dham , madyali dham , himachali food ,

किन्नौर की दावत में शराब व मांस का होना हर उत्सव में लाजमी है। हालांकि शाकाहारी बढ़ रहे है, इसलिए यहां बकरा कटता ही है। खाने में चावल, पूरी, हलवा, सब्जी (जो उपलब्ध हो) बनाई जाती है। लाहौल-स्पीति का माहौल ज्यादा नहीं बदला। वहां तीन बार मुख्य खाना दिया जाता है। चावल, दाल चना, राजमा, सफेद चना, गोभी आलू मटर की सब्जी और एक समय भेडू (नर भेड़) का मीट कभी फ्रायड मीट या कलिचले। सादा रोटी या पूरी (भटूरे जैसी जिसके लिए रात को आटा गूंथ कर रखते हैं) खाते हैं। परोसने के लिए कांसे की थाली, शीशे या स्टील का गिलास व तरल खाद्य के लिए तीन तरह के प्याले इस्तेमाल होते हैं। नमकीन चाय, सादी चाय व सूप तीनों के लिए अलग से।

 

सिरमौर प्रदेश भर में अपने पारंपरिक व्यंजनों के लिए मशहूर है। यहां पर दिवाली आदि पर्वों पर ये पकवान बनाए जाते हैं। जिला की विशेष व स्वादिष्ट डिश असकली की बात की जाए तो यह पत्थर के विशेष आकार के सांचे में तैयार की जाती है। इस सांचे को असकली का पत्थर कहा जाता है, जिसमें कटोरी के आकार के सात, पांच या नौ खाने होते हैं।

 

गेहूं व चावल के आटे का घोल इन सांचों में भरकर पारंपरिक चूल्हे पर पकाया जाता है। इस प्रकार सात या नौ असकली एक ही बार में तैयार हो जाती है, जिसे राजमांश, उड़द की दाल या शहद के साथ खाया जाता है। गिरिपार के सभी क्षेत्रों में यह पकवान बनाया जाता है। पहाड़ी डोसा कहलाने वाला पटांडे भी सिरमौर की विशेष डिश है। इसे बनाने के लिए आटे का पतला घोल तैयार किया जाता है, जिसे बड़े तवे पर सफाई से फैलाकर पकाया जाता है। यह पहाड़ी डोसा पटांडे अकसर दाल व मीठे भोजन दोनों के साथ परोसे जाते हैं।

 

सिरमौर का पारंपरिक व्यंजन धरोटी-भात बहुत ही स्वादिष्ट होता है। इसे भाप में तैयार किया जाता है। उड़द की दाल को भिगोकर उसका छिलका उतारने के बाद उसे सीलबट्टे पर पीसा जाता है फिर उसमें नमक, मिर्च, मसाला, अदरक, लहसुन आदि मिलाया जाता है।

 

पतली लकडिय़ों से एक बरतन में सांचा तैयार किया जाता है, फिर एक दो धरोटी को पत्ते पर रखकर इस सांचे पर रखा जाता है और भाप में पकाया जाता है। इसे चावल के साथ परोसा जाता है। दिवाली के मौके पर जिला में बिलोई को विशेष रूप से बनाया जाता है। इसे लस्सी व चावलों को उबालकर केले के पत्तों में दाब विधि से तैयार किया जाता है तथा गुड़ के रस के साथ परोसा जाता है।

देवभूमि हिमाचल प्रदेश जहां देश-विदेश में अपनी धर्म आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य, लोक संस्कृति, त्यौहार, व मेलों जैसी आलौकिक संस्कृति व रीति-रिवाजों के लिए विख्यात है, वहीं हिमाचल प्रदेश अपने पहाड़ी पारम्परिक खान-पान के लिए न केवल देश में ही, बल्कि विदेशों में भी अपने लज़ीज पहाड़ी व्यंजनों के लिए विशेष ख्याति प्राप्त किए हुए है। , himachali dham , kangri dham , madyali dham , himachali food ,

शादी में बकरे का मीट भी लाजमी है। आज के आधुनिक युग में जहां फास्ट फूड का प्रचलन बढ़ चला है, वहीं पुरानी पीढ़ी ने पारंपरिक व्यंजनों को भी सहेज कर रखा है। इस बदलाव के जमाने में जहां हमने अपनी कितनी ही सांस्कृतिक परंपराओं को भुला दिया है, वहीं हिमाचली खानपान की समृद्ध परंपरा बिगड़ते-छूटते भी काफी हद तक बरकरार है।


हालांकि आज बहुत सा बदलाव हमारे रीति-रिवाजों, परम्पराओं में भी हुआ है लेकिन आज भी ज्यादातर हिमाचल में धर्म-आस्था, शादी-ब्याह, त्यौहार, उत्सव, अन्य मांगलिक कार्य, लोक संस्कृति मेलों आदि में हमारी परम्पराएं जीवित हैं। ये हमारे बुजुर्गों की पुराणिक परम्पराए, रीति-रिवाज हैं। जो हमेशा से कायम हैं और रहेंगे। इन्हीं से हमारे हिमाचल की ख़ास पहचान है न केवल देशों में अपितु विदेशों में भी।

 


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जानिए शक्तिशाली व रहस्यमय देवता महासू के मंदिरों से जुड़ा इतिहास

mahasu temple hanol , जानिए शक्तिशाली व रहस्यमय देवता महासू के मंदिरों से जुड़ा इतिहास

महासू देवता से जुड़ी मुख्य बातें:

 

-हणोग मन्दिर में महासू की अष्टधातु की मूर्ति तिब्बती मूर्तियों जैसी

-हिमाचल में महासू बहुत ही शक्तिशाली ग्राम देवता हैं  जोकि हैं रहस्यमय

-शिमला में 90 और सिरमौर में हैं 10 महासू मन्दिर

 

महासू मंदिरों से जुड़ा इतिहास : हिमाचल को जहाँ देवी- देवताओं का वास माना जाता है वहीं यहां के लोगों की देवी- देवताओं के प्रति गहरी आस्था है। इतना ही नहीं बाहर से आने वाले लोगों की भी इनके अटूट आस्था देखने को मिलती है। जिसके चलते बाहर से आने वाले लोग इन मन्दिरों में आकर यहां के  देवी- देवताओं का आशीर्वाद लेने जरुर पहुंचते हैं। ऐसे ही  हैं शिमला में 90 और सिरमौर में 10  महासू मन्दिर हैं।

mahasu temple hanol , जानिए शक्तिशाली व रहस्यमय देवता महासू के मंदिरों से जुड़ा इतिहास

महासू देवता के सम्बन्ध में अनेक धारणाएं प्रचलित हैं। पौराणिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करने पर महासू देवता सूर्यवंश के आदि देव भगवान विवस्वान (सूर्य) के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। महासू महाशिव का अपभ्रंश है। लोक विश्वास है कि महाशिव का विकृत रूप महासूदेव है।

जौनसार (उत्तराखंड ) क्षेत्र में लोगों की विभिन्न आस्थाएं और विश्वास हैं, उनका प्रमुख देवता महासु है। हिमाचल में उसे नाग करके भी पूजा जाता है। हणोग मन्दिर में महासू की अष्टधातु की मूर्ति तिब्बती मूर्तियों जैसी है।

महासू अमरनाथ का एक वीर है। महासू की उत्पति नागों से हुई है। इस शब्द की व्युत्पति महाशिव से है। हिमाचल में महासू बहुत ही शक्तिशाली ग्राम देवता है जो रहस्यमय है।

 

महासू के बारे में दो विभिन्न जनश्रुतियां प्रचलित हैं। एक जनश्रुति अनुसार महासु नाग के रूप में प्रकट हुआ। उनकी मूर्ति बनाकर स्थापित किया गया और महासू नाम दिया, भक्तों के लिए कुछ नियम निश्चित किए। वास्तव में लोकगाथा में सब कुछ इतिहास ही नहीं होता। उसमें लोक श्रद्धा, भक्ति और कल्पना का भी सुन्दर समन्वय होता है। हनोल (जौनसार , उत्तराखंड ) में महासू का सबसे पुराना और प्रधान मन्दिर माना जाता है।

 

महासू के सम्बंध में प्रचलित विवरण से बात स्पष्ट हो जाती है कि महासू अब ग्राम देवताओं की तरह साधारण लोक देवता नहीं है और न ही पुराणों में इसका कहीं वर्णन मिलता है। वास्तव में लोकवार्ता सृजन में सत्य और कल्पना के अतिरिक्त जो तत्व सक्रिय रहते हैं उनमें पुराकथा, आद्यबिंब एवं फैंटेसी का प्रमुख स्थान रहता है। पुराकथा या देवकथा पूरी कल्पना पर ही अधारित न होकर लोकानुभूति से संश्लिष्ट ऐसी कथा होती है जो अलौकिकता का भी संदेश देती है। यह तर्काश्रित नहीं होती ।

 

ऐसी कथाओं के पीछे कुछ आदिम विश्वास होते हैं, जो अंध विश्वास का रूप धारण कर लेते हैं। इसमें रहस्यात्मकता, विलक्षणता, लाक्षणिकता आ जाती है। महासू भी एक मिथकीय नायक या प्रतीक के रूप में जौनसार और हिमाचल के कुछ जनपदों के लोकजीवन में रच बस गया है। परस्पर विरोधी धारणाएं भी पनपती हैं। जैसे कोटखाई जनपदों के सभी लोकदेवता, चौपाल में शिरगुल, बिजट और महेश्वर के भक्तों को महासू के प्रति आस्था रखने की मनाही है। इन लोक देवताओं की मान्यता पर कश्मीर के तान्त्रिक शैवमत का प्रचुर-प्रभाव विद्यमान है।

 

महासू की पूजा एक लोकदेवता की तरह होती है, न कि वीर की तरह। तौंस नदी के किनारे पर हणोल ( उत्तराखंड ) में महासू देवता का प्रमुख धाम है। तमसा नदी यद्यपि सारे भारत में अपवित्र मानी जाती हैं किन्तु महासू भक्तों की दृष्टि में यह पवित्र नदी है।

 

हिमाचल की लोक संस्कृति में तीन प्रकार के लोकदेवता मान्य हैं- वैदिक, पौराणिक और लौकिक। लोक देवताओं की कोटि में एक और स्थान यहां के आदिम देवताओं का भी है, ये लोकदेवता इस क्षेत्र की आदिम जाति से सम्बंधित हैं जो बाद में सबने अपना लिया। महासू भी एक ऐसे ही देवता हैं जिनकी पूजा विधि आनुष्ठानिक नहीं।

 

प्राचीन काल से कश्मीर भारत की समन्वय प्रधान संस्कृति का केन्द्र रहा है। वहां अनेक देवी-देवताओं की पूजा की लोक परम्परा विद्यमान रही हैं। नागपूजा प्रमुख रूप से रही है। यहां तांत्रिक शिव मत का प्रभाव स्पष्ट रहा है। वही प्रभाव हिमाचल में स्पष्ट दृष्टिगोचर है।

 

 

इस मंदिर में रहते हैं चार भाई, अंदर भक्तों का जाना है मना

प्रकृति की गोद में बसा एक प्रसिद्ध मंदिर है ‘महासू देवता’। माना जाता है कि जो भी यहां सच्चे दिल से कुछ मांगता है कि महासू देवता उसकी मुराद पूरी करते हैं।
दिलचस्प है कि यहां हर साल दिल्ली से राष्ट्रपति भवन को ओर से नमक भेंट किया जाता है। मिश्रित शैली की स्थापत्य कला को संजोए यह मंदिर देहरादून से 190 किमी और मसूरी से 156 किमी दूर है। यह मंदिर चकराता के पास हनोल गांव में टोंस नदी के पूर्वी तकट पर स्थित है।

महासू मंदिर के गर्भ गृह में पानी की एक धारा का रहस्य

महासू देवता के मंदिर के गर्भ गृह में भक्तों का जाना मना है। केवल मंदिर का पुजारी ही मंदिर में प्रवेश कर सकता है। यह बात आज भी रहस्य है। मंदिर में हमेशा एक ज्योति जलती रहती है जो दशकों से जल रही है।

मंदिर के गर्भ गृह में पानी की एक धारा भी निकलती है, लेकिन वह कहां जाती है, कहां से निकलती है यह अज्ञात है।

दरअसल ‘महासू देवता’ एक नहीं चार देवताओं का सामूहिक नाम है और स्थानीय भाषा में महासू शब्द ‘महाशिव’ का अपभ्रंश है। चारों महासू भाइयों के नाम बासिक महासू, पबासिक महासू, बूठिया महासू (बौठा महासू) और चालदा महासू है, जो कि भगवान शिव के ही रूप हैं।

न्यायालय भी माना जाता है इस महासू मंदिर को

उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी, संपूर्ण जौनसार-बावर क्षेत्र, रंवाई परगना के साथ साथ हिमाचल प्रदेश के सिरमौर, सोलन, शिमला, बिशैहर और जुब्बल तक महासू देवता की पूजा होती है।

इन क्षेत्रों में महासू देवता को न्याय के देवता और मन्दिर को न्यायालय के रूप में माना जाता है। वर्तमान में महासू देवता के भक्त मन्दिर में न्याय की गुहार करते हैं जो उनकी पूरी होती है।

महासू ने जीता था हनोल का मंदिर

यह मंदिर 9वीं शताब्दी में बनाया गया था। वर्तमान में यह मंदिर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के संरक्षण में है। महासू देवता भगवान भोलेनाथ के रूप हैं। मान्यता भी है कि महासू ने किसी शर्त पर हनोल का यह मंदिर जीता था। महासू देवता जौनसार बावर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ईष्ट देव हैं।

किवदंती है कि महासू देवता का मंदिर जिस गांव में बना है उस गांव का नाम हुना भट्ट ब्राह्मण के नाम पर रखा गया है। इससे पहले यह जगह चकरपुर के रूप में जानी जाती थी। पांडव लाक्षा ग्रह( लाख का महल) से निकलकर यहां आए थे। हनोल का मंदिर लोगों के लिए तीर्थ स्थान के रूप में भी जाना जाता है।

ये हैं महासू मंदिर जाने का रास्ते

देहरादून से महासू देवता के मंदिर पहुंचने के लिए तीन रास्ते हैं। पहला है देहरादून, विकासनगर, चकराता, त्यूणी होते हुये हनोल जो कि लगभग 188 किमी है, दूसरा रास्ता देहरादून, मसूरी, नैनबाग, पुरोला, मोरी होते हुये हनोल जो कि लगभग 175 किमी है। तीसरा रास्ता देहरादून से विकासनगर, छिबरौ डैम, क्वाणू, मिनस, हटाल, त्यूणी होते हुये लगभग 178 किमी हनोल पहुंचा जा सकता है।


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हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलोमीटर दूर ज्वालामुखी देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। ज्वाला मंदिर को जोता वाली मां का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता है। यह मंदिर माता के अन्य मंदिरों की तुलना में अनोखा है, क्योंकि यहां पर किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है, बल्कि पृथ्वी के गर्भ .…Read More!

 

जानिए क्यों पांडवों द्वारा निर्मित शिकारी देवी मंदिर पर आज तक छत नहीं लग पाई?

शिकारी देवी का यह मंदिर करसोग , जनजेलही घाटी में एक उच्चे शिखर पर 11000 फ़ीट की उचाई में स्थित है. मगर सबसे हैरत वाली बात ये  कि मंदिर पर छत नहीं लग पाई। कहा जाता है कि कई बार मंदिर पर छत लगवाने काम शुरू किया गया। लेकिन हर बार….Read More!

 

हत्यादेवी :हिमाचल में यह रहस्यमयी मंदिर साल में सिर्फ एक बार ही खुलता है, पुरोहित की एक गलती से यहां हत्यादेवी बन गई थी राजकुमारी.

हिमालय की गोद में बसे इस मंदिर का यह रहस्यमयी कक्ष साल में सिर्फ एक दिन के लिए ही खुलता है। यहां राजकुमारी के साथ कुछ ऐसा हुआ था कि वह हत्यादेवी बन गई थी। हत्यादेवी की एक गांव पर असीम कृपा है जबकि एक गांव के लोग यहां जाने से भी डरते हैं। आइए जानते हैं पूरी कहानी…Read More!

आज हम आपको पहाड़ों पर बसे देवी भीमाकाली मंदिर की परंपरा शक्ति और इतिहास से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं

भीमाकाली मंदिर के साथ अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं जिनके अनुसार आदिकाल मंदिर के स्वरूप का वर्णन करना कठिन है परंतु पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि वर्तमान भीमाकाली मंदिर सातवीं-आठवीं शताब्दी के बीच बना है। भीमाकाली शिवजी की अनेक मानस पुत्रियों में ….Read More!

जानिए क्या है बाबा बालकनाथ जी एवं इनके पूजनीय स्थल दयोटसिद्ध से जुड़ा इतिहास और क्यों है विशेष मान्यता?

बाबा बालकनाथ जी की कहानी बाबा बालकनाथ अमर कथा में पढ़ी जा सकती है, ऐसी मान्यता है, कि बाबाजी का जन्म सभी युगों में हुआ जैसे कि सत्य युग,त्रेता युग,द्वापर युग और वर्तमान में कल युग और हर एक युग में उनको अलग-अलग नाम से जाना गया जैसे “सत युग” में….Read More!

शायद इससे आप वाकिफ न हो, आज हम आपको हिडिंबा देवी के मंदिर के इतिहास से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश— के कुल्‍लू में मनाली में स्थित हिडिंबा देवी का मंदिर है। इसका इतिहास पांडवों से जुड़ा हुआ है। शायद इससे आप वाकिफ न हो। आपको इसी मंदिर के इतिहास आज हम रू-ब-रू कराने जा रहे हैं। आप जानते हैं कि जुए में सब कुछ हारने पर धृतराष्ट्र व दुर्योधन ने पाण्डवों को वारणावत नाम ….Read More!

 

भोलेनाथ ने भक्तों को बचाने के लिए यहां किया ‌था चमत्कार, जानिए शिरगुल मंदिर का इतिहास

विशालकाय सांप से अपने भक्तों के बचाने के लिए भगवान शिव ने यहां अपना चमत्कार दिखाया था। यहां आज भी किसी देवी देवता की मूर्ति स्‍थापित नहीं है लेकिन इसके बावजूद यहां आने वाले भक्तों की सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं। शिरगुल/ Shirgul मंदिर हिमाचल के…..Read More!

 

मणिमहेश : आज तक इस रहस्यमयी पहाड़ की ऊंचाई कोई नहीं नाप पाया

कैलाश पर्वत मणिमहेश, रहस्यमयी पहाड़, जिस पर चढ़ने की बात से भी कांपते हैं लोग, जानिए क्या है वास्तविकता:   भगवान शिव से जुड़े देश भर में ऐसे कई स्‍थान हैं जो भोलेनाथ के चमत्कारों के गवाह रहे हैं। ऐसी ही एक जगह है मणिमहेश। कहते हैं भगवान शिव ने यहीं…..Read More!

 

एक गुफा में है गणेश जी के कटे हुए स‌िर का रहस्य

हिंदू धर्म में भगवान गणेश जी को प्रथम पूज्य माना गया है। गणेश जी के जन्म के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव ने क्रोधवश गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया था, बाद में माता पार्वतीजी के कहने पर….Read More!

 

शिव बाड़ी :कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की नगरी, जानिए मंदिर से जुड़ा इतिहास और पुराण

शिव बाड़ी यानी शिव का वास स्थान। गगरेट स्थित प्राचीन द्रोण शिव मंदिर | कहते हैं कि यह स्थल महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की नगरी थी। यहां भगवान शिव का एवं भव्य मंदिर है।धारणा है कि शिव बाड़ी निर्माण स्वयं शिवजी ने किया था। कहते….Read More!

 

हिमाचल प्रदेश, चंबा में स्थित मां शिव शक्ति मंदिर का इतिहास एवं अन्य दिलचस्प बातें!

“छतराड़ी स्थित मां शिव शक्ति” हिमाचल प्रदेश, जिला चंबा के में छतराड़ी स्थित मां शिव शक्ति के बारे में कुछ जानकारी हमारी संस्कृति देवत्व प्रधान संस्कृति रही है। देवत्व यानि देनेवाली संस्कृति, समर्पण की संस्कृति। हिमाचल एक प्राकृतिक क्षेत्र है जिसके बारह जिलों में……Read More!

 

हिमाचल के कांगडा में स्थित शक्तिपीठ चामुण्डा, आइये जानें मंदिर से जुड़ा इतिहास एवं पुराण!

चामुण्डा देवी का मंदिर भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक है, जो कि पश्चिम पालमपुर से लगभग 10 किलोमीटर, कांगडा से 24 किलोमीटर व धर्मशाला से 15 किलोमीटर की दूरी पर, कांगडा जिले, हिमाचल प्रदेश में स्थित है। यह मंदिर माँ चामुंडा देवी का समर्पित है जोकि भगवती काली….Read More!

 

पत्थर के मंदिरों की घाटी के नाम से प्रसिद्ध हाटकोटी मंदिर से जुड़ा इतिहास

हिमाचल के विख्‍यात मन्दिरों में से एक “माँ हाटकोटी” हिमाचल जिसे देवभूमि की संज्ञा प्राप्त है और यहां के देवी-देवताओं के प्रति लोगों की आस्था भी उतनी ही गहरी है। ना केवल प्रदेश के लोगों की अपितु यहां के देवी-देवताओं के प्रति प्रदेश के साथ-साथ अन्य देश-विदेशों से आने वाले….Read More!

हिमाचल की पौराणिक स्मृतियों को संजोए महर्षि वशिष्ठ का तपस्या स्थल “वशिष्ठ”

हिमाचल में यहां है 4000 साल पुराना महर्षि वशिष्ठ का तपस्या स्थल , हिमाचल में यहां है महर्षि वशिष्ठ का तपस्या स्थल जानिए गाँव एवं मंदिर से जुड़ा इतिहास , Vashisht Temple and hot spring manali himachal pradesh , history of vashisht village and temple in hindi

हिमाचल प्रदेश के मनाली से करीब चार किलोमीटर दूर लेह राजमार्ग पर स्थित है वशिष्ठ। एक ऐसा गांव जो अपने दामन में पौराणिक स्मृतियां छुपाये हुए है। महर्षि वशिष्ठ ने इसी स्थान पर बैठकर तपस्या की थी।

कालान्तर में यह स्थल उन्हीं के नाम से जाना जाने लगा। वशिष्ठ ऋषि का यहां प्राचीन मन्दिर है। वशिष्ठ पहुंच कर ऐसा लगता है मानो सौन्दर्य, धर्म, पर्यटन, परम्पराएं, आधुनिकता, ग्रामीण शैली व उपभोक्तावादी चमक-दमक आपस में एक हो रहे हैं।

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वशिष्ठ गांव के नीचे ब्यास और मनालसू नदियों का संगम

वशिष्ठ के नजदीक छोईड नाम का सुन्दर झरना है। इस झरने की विशेषता यह है कि लोग इसमें अपने बच्चों को मुण्डन हेतु यहां पर लाते हैं। प्रचलित धारणा है कि यहां मुण्डन कराने से बच्चों को प्रेत बाधा अथवा छाया से मुक्ति मिलती है। गांव के ठीक नीचे ब्यास और मनालसू नदियों का संगम भी आकर्षक है।

परम्परागत शैली में बना है वशिष्ठ मन्दिर

वशिष्ठ मन्दिर लोक शैली में बना हुआ है। लकड़ियों पर सुन्दर नक्काशी की गई है। मन्दिर के भीतर वशिष्ठ मुनि की काले रंग की भव्य आदमकद पाषाण मूर्ति है। वशिष्ठ मन्दिर के साथ रामचन्द्र जी का प्राचीनतम भव्य मन्दिर भी कुछ ही दूरी पर है। मन्दिर परम्परागत शैली में बना है। मन्दिर में लगी परिचय पट्टिका के अनुसार लगभग 4000 वर्ष पूर्व राजा परीक्षित की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र जनमेजय राजा बना। उसने पिता की आत्मा शान्ति हेतु तीर्थ यात्राएं कीं। उसने जगह-जगह पर अपने कुल देवता रामचन्द्र जी के मन्दिर बनवाये व राम पंचायतें स्थापित कीं। यह मन्दिर तब का ही है।

सभी मकान पुरानी कुल्लुई काठकुणी शैली के

यह गांव भी कम दर्शनीय नहीं है। सभी मकान पुरानी कुल्लुई काठकुणी शैली के हैं जो बहुत सुन्दर व कलात्मक लगते हैं। लकड़ियों पर की गई मोहक पच्चीकारी आकर्षित करती है। यहां के सेब बगीचे भी मशहूर हैं। हर साल यहां बसन्त आगमन के साथ ही विरशु मेले का परम्परागत आयोजन होता है। सर्दी की ठिठुरन से निजात पाकर यहां के जनजीवन में एक नई स्फूर्ति और उल्लास का संचार होने लगता है।

 

विरशु मेला इन्हीं खुशियों की सामाजिक अभिव्यक्ति है। इस मेले में चरासे तरासे नामक लोकनृत्य में जब महिलाएं नाचती हैं तो लास्य भाव बेहद मुग्ध करता है। इस अवसर पर आसपास क्षेत्र के स्थानीय देवताओं की डोलियां भी यहां आती हैं। देवता स्नान करते हैं और ऋषि वशिष्ठ को अर्घ्य चढ़ाते हैं। यूं भी बड़े स्नान के लिये वर्ष भर घाटी के देवताओं का यहां तांता लगा रहता है।

वशिष्ठ के बारे में पौराणिक गाथा

वशिष्ठ के बारे में पौराणिक श्रुति इस प्रकार है कि वनवास के दौरान जब युद्ध में रामचन्द्र जी द्वारा रावण मार दिया गया तो रामचन्द्र पर ब्रह्महत्या का पाप लगा। अयोध्या वापस आने पर श्रीराम इस पाप के निवारण के लिये अश्वमेध यज्ञ को करने की तैयारी में जुट गये। यज्ञ शुरू हुआ तो उपस्थित सारे ऋषि मुनियों ने गुरू वशिष्ठ को कहीं नहीं देखा। वशिष्ठ राजपुरोहित थे, बिना उनके यह यज्ञ सफल नहीं हो सकता था। उस समय वशिष्ठ हिमालय में तपस्यारत थे। श्रंगी ऋषि लक्ष्मण को लेकर मुनि वशिष्ठ की खोज में निकल पड़े।

 

लम्बी यात्रा के बाद वे इसी स्थान पर आ पहुंचे। सर्दी बहुत थी। लक्ष्मण ने गुरू के स्नान के लिये गर्म जल की आवश्यकता समझी। लक्ष्मण ने तुरन्त धरती पर अग्निबाण मारकर गर्म जल की धाराएं निकाल दीं। प्रसन्न होकर गुरू वशिष्ठ ने दोनों को दर्शन देकर कृतार्थ किया। गुरू ने कहा कि अब यह धारा हमेशा रहेगी व जो इसमें नहायेगा, उसकी थकान व चर्मरोग दूर हो जायेंगे। लक्ष्मण ने गुरूजी को यज्ञ की बात बतलाई। तदुपरान्त गुरू वशिष्ठ ने अयोध्या जाकर यज्ञ को सुचारू रूप से सम्पन्न कराया।

अभी तक दर्जनों फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है वशिष्ठ में

यहां प्रकृति के जादुई आकर्षण का अछूतापन बिखरा हुआ है। फिर यहां कुदरत का सबसे निराला उपहार है- गर्म जल के स्त्रोत। जिन्हें स्नान कुण्डों की शक्ल दे दी गई है। ताजा दम होकर रोहतांग दर्रे की हिमश्रंखलाओं से लेकर गोशाल, बाहंग, बुरुआ, सोलांग व मनाली व्यास घाटी को यहां से निहारें तो ऐसा लगता है मानो स्वप्न लोक में विचर रहे हों। इसी अनाम सम्मोहन के वशीभूत होकर यहां बड़े पैमाने पर देश-विदेश से प्रकृति प्रेमी व पर्यटक आते हैं। हिप्पियों की एक भरपूर जमात यहां गांव में डेरा डाले रह रही है। मुम्बई की फिल्म कम्पनियों को यह स्थल विशेष पसन्द है।

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Vashisht Hot Spring

अब तक दर्जनों फिल्मों की शूटिंग यहां हो चुकी है। एक दशक पूर्व तक यहां पैदल मार्ग से पहुंचा जाता था। तब कम ही लोग यहां पहुंचते थे, लेकिन अब सड़क बन जाने व अन्य कई सुविधाओं के जुटने से भारी भीड़ यहां पहुंचती है। बड़े से बड़े व भव्य होटल यहां खुल गये हैं। एक होटल तो हैलीस्कीइंग की सुविधा तक मुहैया करा रहा है। पर्यटन निगम, हिमाचल ने गर्म जलों के डीलक्स व लग्जरी बाथ्स तैयार कराये हैं। विदेशियों के लिये तो यह स्थल तीर्थ की तरह है।


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जानिए लाहौल-स्पीति के उदयपुर गांव में सातवीं सदी में बने इस मृकुला देवी मंदिर का इतिहास

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सातवीं शताब्दी से लाहौल-स्पीति के उदयपुर गांव में बसा मृकुला देवी मंदिर

हिमाचल को देवभूमि से जाना जाता है। यहां के लोगों की देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था है, तो वहीं इन्हीं देवी-देवताओं की यहां के लोगों पर अपार कृपा भी रहती है। हिमाचल के देवी-देवताओं का कोने-कोने में वास है और यहां की धरती पर बसने वाले देवी-देवताओं के प्रति अपार श्रद्धा यहां के लोगों में हमेशा देखने को मिलती है। यहां के तीज-त्यौहार,संस्कृति, उत्सव व मेले इसका मुख्य उदाहरण है।

 

हम आपको धर्म आस्था के जरिए इस बार जिला लाहौल-स्पीति के गांव उदयपुर में सातवीं शताब्दी में बनाये गये प्रसिद्ध मंदिर मृकुला देवी से परिचित करवाने जा रहे हैं।

 

मां महिषासुर्मर्दिनि के नाम से भी जाना जाता है मंदिर में स्थापित मृकुला देवी मूर्ति को

जिला लाहौल-स्पीति के मुख्यालय केलांग से 56 किलोमीटर दूर स्थित है खूबसूरत गांव उदयपुर। इस गांव में मृकुला देवी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है जिसे सातवीं शताब्दी में बनाया गया है। यह मंदिर प्राचीन काष्ठ कला का अद्भुत उदाहरण है।मंदिर में स्थापित मूर्ति को मां महिषासुर्मर्दिनि के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह मूर्ति अष्ठधातु से बनी है।

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श्रद्धालु यहां मंदिर में श्रद्धा अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं। कोई महिषासुर्मर्दिनि मां के नाम से तो कोई नवदुर्गा भवानी के नाम से पूजा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि मां काली खप्पर वाली कलकत्ते से आई है जिसका प्रमाण मंदिर प्रांगण में शिला पर बने पैरों के निशान हैं। उसके बाद ऐसा निशान कापुंर्जो नामक स्थान पर है। ऐसा ही निशान चिनाव नदी के पार भी है तथा उसी सीध में पहाड़ी पर भी चरण चिन्ह हैं।

 

दोरजेफामो के नाम से पूजते हैं बौद्ध धर्म के अनुयायी 

ऐसा भी बताया जाता है कि बौद्ध धर्म अनुयायी इन्हें दोरजेफामो के नाम से पूजते हैं। यहां चिरकाल से एक गोम्पा रहा है। ऐसी मान्यता है कि गुरू पदमसंभव ने प्रवास के दौरान यहां गोम्पे में पूजा-अर्चना एवं सिद्धियां की होंगी। बौद्ध धर्म ग्रन्थों में उदयपुर में चिनाव एवं मियाडनाला नदी के संगम स्थल को तान्दी संगम से भी पवित्र माना गया है।

 

उदयपुर गांव कभी मारूल या मर्गुल कहलाता था। इसके नामकरण के बारे में ऐसा बताया जाता है कि एक बार चम्बा नरेश राजा उदयसिंह यहां प्रवास पर आए। राजा ने मां मृकुला देवी के मंदिर में दर्शन करने के उपरान्त वहां प्रांगण के साथ सहो नामक स्थान पर आकर आदेश जारी किया कि आज के बाद यह गांव उदयपुर कहलाएगा। तब से यह गांव उदयपुर के नाम से प्रसिद्ध है।

 

  • चंबा के राजा मेरूवर्मन ने सातवीं शताब्दी में करवाया था मृकुला देवी मंदिर का निर्माण 

  •  कश्मीरी कन्नौज शैली में बना है मृकुला देवी मंदिर 

तांदी से एक सड़क पट्टन घाटी होकर उदयपुर तक जाती है। उदयपुर से एक सड़क पांगी घाटी की तरफ मुड़ जाती है। उदयपुर खूबसूरत कस्बा है। यहां स्थित मृकुला देवी मंदिर खास तौर से दर्शनीय है। मंदिर बाहर से देखने पर साधारण घर जैसा लगता है, लेकिन इसके भीतर एक ऐसा अनोखा कला संसार है जिसे देखकर कलाप्रेमी अभिभूत हो उठते हैं।

कश्मीरी कन्नौज शैली में बने इस मंदिर के भीतर देवदार के शहतीरों और तख्तों पर खुदी मूर्तियां बिल्कुल सजीव लगती हैं। कहा जाता है कि इस मृकुला देवी मंदिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में चंबा के राजा मेरूवर्मन ने करवाया था। कुछ विद्वान इसे कश्मीर के राजा अजय वर्मन और राजा ललितादित्य द्वारा निर्मित बताते हैं। मंदिर में लकड़ी की दीवारों पर एक ओर महाभारत के दृश्य हैं और दूसरी तरफ रामायण के प्रसंग।

 

शहतीरों पर बौद्ध इतिहास के प्रसंग भी चित्रित हैं। राजा बलि द्वारा वामन को धरती दान और सागर मंथन आदि पौराणिक गाथाओं का भी प्रभावशाली चित्रण किया गया है। कुछ चित्रों में गंधर्वो को योग मुद्राओं व अप्सराओं को नृत्य मुद्रा में दर्शाया गया है।

उदयपुर गांव के आसपास कई प्राकृतिक झरने हैंजिन्हें देखकर सैलानी आनंदित हो उठते हैं। सर्दियों में तो बर्फबारी के कारण यहां कोई सैलानी नहीं आतापर रोहतांग दर्रे के खुलते ही यहां मृकुला देवी मंदिर की अद्भुत कलाकृतियां देखने के लिए देश भर के कलाप्रेमी सैलानियों का तांता लग जाता है। यहां के लोग खुले दिल से सैलानियों का स्वागत करते हैं। 

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Udaipur Valley, Lahul Spiti , Himachal Pradesh

इस गांव की उत्तर दिशा में मंदिर के साथ एक चरणामृत सा चश्मा है। एक अन्य प्राचीन चश्मा गांव की पूर्व दिशा में है जो कोईडी मूर्ति  के नाम से प्रसिद्ध है। यह संयोग ही है कि दोनों चश्मों के साथ-साथ विशालकाय कायल के पेड़ हैं जो आज भी मौजूद हैं। उदयपुर गांव के दक्षिण-पश्चिम से चिनाब नदी बहती है।

 

ऐसा बताते हैं कि उदयपुर कभी 140 घरों का गांव था जो उजड़ गया था। इसके उजडऩे की पुष्टि यहां खुदाई में दीवारों के अवशेष मिलने से होती है। गांव के लोगों का मानना है कि वर्तमान के उदयपुर गांव में 60 साल पहले केवल 4 घर थे और अब यह गांव एक किलोमीटर के कस्बे में फैल चुका है। उदयपुर के पश्चिम में देवदार के पेड़ों का घना जंगल कभी रियोढन नाम से जाना जाता था। आज इसे लोग मिनी मनाली के नाम से जानते हैं। यह उदयपुर से एक किलोमीटर की दूरी पर मनाली-जम्मू राजमार्ग पर स्थित है। उससे चार किलोमीटर की दूरी पर प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण मडग्राम (पांच गांवों का समूह) है। यहां ढलानदार घासनियों, समतल खेत और कुदरती नज़ारों को देखकर हर पर्यटक मंत्रमुगध हो जाता है।

 


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हिमाचल की प्राकृतिक खूबसूरती की छटा बिखरेती मनमोहक सुंदर घाटी किन्नौर, जो भी जाए इस अदभुत मनमोहक घाटी की खुबसूरती में खोकर रह जाए। किन्नौर की इस घाटी को बर्फ और झरनों की घाटी के साथ-साथ सौन्दर्य की खान तक कहा जाता है। यहां का सौन्दर्य नयनाभिराम है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन करना बहुत ही मुश्किल है।

आसमान छूते पर्वत, खूबसूरत हरे-भरे पेड़, सेब और केसर की सौंधी-सौंधी महक, खुबसरत फूलों का परिधान ओढ़े घाटियां, बर्फीले झरनें, झर-झर बहती नदियां, सुंदरता व संस्कृति का परिधान ओढ़े परंपराएं। जो भी इन हरी भरी वादियों का दीदार करने जाएं अपने आपको इन खूबसूरत वादियों के हसीन नजारों में खुद को खो दे। किन्नौर प्रदेश का कबायली इलाका है जिसका जिक्र महाभारत काल में भी मिलता है। कुछ इतिहासकारों के मत में अर्जुन ने जिस ‘इमपुरुष’ नामक स्थान को जीता था, वह वास्तव में किन्नौर ही था। कुछ विद्वानों की राय में पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास का आखिरी समय यहीं गुजारा था। यह भी मान्यता है कि किन्नौर ने इसी क्षेत्र में महाभारत से बहुत पहले हनुमान के साथ राम की उपासना की थी।

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हिमाचल के उत्तर पूर्व में स्थित एक बेहद खूबसूरत जिला है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से घिरा यह क्षेत्र ऊपरी, मध्य और निचले किन्नौर हिस्सों में बंटा हुआ है। यहां पहुंचने का मार्ग दुर्गम होने के कारण यह क्षेत्र काफी लम्बे समय तक पर्यटकों से अछूता रहा है, लेकिन अब साहसिक और रोमांचप्रिय पर्यटक यहां बड़ी संख्या में आने लगे हैं। प्राकृतिक दृश्यावली से भरपूर इस नगर की सीमा तिब्बत से सटी हुई है, जो इसे सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से लगभग 25० किमी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर स्थित यह नगर स्थित है। पहाड़ों और जंगलों के बीच कलकल ध्वनि से बहती सतलुत और स्पीति नदी का संगीत यहां की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है। स्पीति नदी आगे चलकर खाब में सतलुज से मिल जाती है। विश्व की विशालतम जांस्कर और ग्रेट हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के आकर्षक नजारे यहां से देखे जा सकते हैं। इस अनूठी घाटी की यात्रा हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से शुरू होती है और कहीं सुरम्य तो कहीं खतरनाक, ढलानदार पहाड़ी सडक़ें. पहाड़ों का वक्ष चीरकर जिस तरह सडक़ें बनाई गईं हैं, 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और बाकी क्षेत्र हरियाली से लहलहा उठा। भले ही यह मात्र किंवदंती ही हो लेकिन रंगीन फसलों, फूलों का परिधान ओढ़े सांगला घाटी स्वर्ग से कम नहीं लगती। अनेक घुमक्कड़ों ने अपने संस्मरणों में इस घाटी के नैसर्गिक सौन्दर्य का वर्णन किया है। सांगला में बेरिंग नाग मन्दिर और बौद्ध मठ दर्शनीय है। सांगला में ही कृषि विश्वविद्यालय का क्षेत्रीय अनुसंधान उपकेन्द्र स्थित है। सांगला के ऊपर कामरू गांव है। यहां का पांच मंजिला ऐतिहासिक किला कला का उत्कृष्ट नमूना है। गांव के बीच में ही नारायण मन्दिर और बौद्ध मन्दिर स्थित हैं और दोनों मन्दिरों का एक ही प्रांगण है। नारायण मन्दिर की काष्ठकला देखती ही बनती है। सांगला घाटी से किन्नर कैलाश के दर्शन भी किये जा सकते हैं। वास्तव में किन्नर कैलाश के पृष्ठ भाग में ही यह घाटी फैली हुई है। यहां पर आप किन्नौरी शोलें और टोपियां खरीद सकते हैं। कल्पा यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य की तरह यहां के लोग भी सुन्दर हैं। किन्नर बालाएं फूलों से सुसज्जित अपनी परम्परागत टोपियां पहनती हैं। टोपियों के दोनों ओर पीपल पत्र नामक चांदी का एक गहना बना होता है और चांदी के ही एक नक्काशीदार कड़े पर कसा रहता है। अपने शरीर को ये ऊनी कम्बल से साड़ी की भांति लपेटे रखती हैं। इस ऊनी कम्बल को स्थानीय भाषा में ‘दोहडू’ कहा जाता है। किन्नरियों में मेहमानों के आदर-सत्कार की भावना भी बहुत होती है। मेहमानों का स्वागत वे अपने हाथों से शराब पेश करके करती हैं। ऐसा करते समय उन्हें कोई संकोच नहीं होता, क्योंकि शराब को किन्नर समाज में महत्व प्राप्त है, लेकिन ताज्जुब की बात यह भी है कि जहां किन्नरियां शराब को बनाने से लेकर पेश करने तक का कार्य अपने हाथों से करती हैं, वहीं वे स्वयं शराब को मुंह तक नहीं लगातीं। शॉल बुनने में तो उनका कोई सानी नहीं है। उनकी बनाई शालों में प्रकृति के विभिन्न रूप परिलक्षित होते हैं। सर्दियों में जब भारी बर्फबारी के कारण किन्नौर का सम्पर्क शेष दुनिया से कट जाता है तो किन्नरियां ऊनी कपड़े, कालीन और अन्य चीजें बुनने का काम करती हैं। उनके बनाये ऊनी वस्त्रों में डोहरियां, पट्टू, गुदमा आदि उल्लेखनीय हैं।किन्नौर घाटी वर्ष में तकरीबन छह मास बर्फ की सफेद चादर से ढकी रहती है। अगस्त से अक्तूबर तक का मौसम यहां खुशगवार होता है। इन्हीं दिनों यहां सैलानियों और घुमक्कड़ों का सैलाब उमड़ता है। सेब, खुबानी, चूली, बग्गूगोशे, चिलगोजे और अंगूर यहां उम्दा किस्म के होते हैं। अंगूर की शराब भी यहां बड़े चाव से पी जाती है। किन्नौर में वर्ष भर त्यौहारों का सिलसिला चलता रहता है। ‘फूलैच’ किन्नौर घाटी का प्रमुख त्यौहार है। इस त्यौहार को ‘उख्यांग’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘उख्यांग’ दो शब्दों ‘ऊ’ और ‘ख्यांग’ से मिलकर बना है। ‘ऊ’ का अर्थ है फूल और ‘ख्यांग’ फूलों को देखना। यह त्यौहार फूलों के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से घिरा कल्पा- ओल्ड हिन्दुस्तान तिब्बत रोड़ पर स्थित कल्पा किन्नौर का प्रारंभिक जिला मुख्यालय था। समुद्र तल से 2759 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव शिमला से 260 किमी. दूर है। हेरिटेज विलेज की तमाम खूबियां यहां देखी जा सकती हैं। प्रात: काल में बर्फीले पहाड़ों के बीच में उगता हुआ सूर्य की स्वर्णिम आभा यहां से बेहद खूबसूरत लगती है। यहां का नारायण नागनी मंदिर स्थानीय कला का बेजोड़ उदाहरण है। कल्पा में अनेक प्राचीन बौद्ध मठ बने हुए हैं। यह गांव 6०5० मीटर ऊंचे किन्नर कैलाश के बहुत ही निकट स्थित है। किन्नर कैलाश को भगवान शिव का शीतकालीन आवास माना जाता है। सांगला किन्नौर का यह लोकप्रिय गांव बास्पा नदी के दायें तट पर स्थित है। समुद्र तल से 2621 मीटर ऊंचा स्थित यह गांव अपनी अति उपजाऊ भूमि के लिए लोकप्रिय है। यह गांव ढलान पर बसा हुआ है जिसके पीछे रालदांग पर्वत की विशाल चोटियां देखी जा सकती हैं। यहां के जंगलों और सदैव बर्फ से आच्छादित पर्वत चोटियों की सुंदरता इसे अन्य स्थानों से अलग बनाती है। बास्पा नदी के बहने के कारण इस स्थान को बस्पा घाटी भी कहा जाता है। यह घाटी किन्नौर जिले की सबसे खूबसूरत घाटियों में एक है। सांगला – (2,860 मी.) किन्नौर क्षेत्र में सबसे बड़ा एवं दर्शनीय गांव हैं, जो करचम से 18 कि.मी. दूर हैं। यहां केसर के खेत, फलोद्यान और ऊपर जाने पर आल्पस के चरागाह हैं। किन्नौर कैलाश चोटी मन मोह लेती हैं। यहां से काली देवी का किले जैसा मंदिर ‘कमरू फोर्ट‘ भी देखा जा सकता हैं।सांगला से 14 किलोमीटर आगे रकछम गांव है। समुद्र तल से करीब तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित रकछम का नामकरण रॉक और छम के मिलन से हुआ है। रॉक अर्थात चट्टान या पत्थर और छम यानी पुल। कहते हैं कभी यहां पत्थर का पुल हुआ करता था, जिस वजह से गांव का नाम ही रकछम पड़ गया। रकछम से 12 किलोमीटर दूर किन्नौर जिले का आखिरी गांव है- छितकुल। लगभग साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर चीन की सीमा के साथ सटा है यह गांव। आबादी होगी कोई पांच सौ के करीब। साठ-सत्तर घर हैं। एक ओर वास्पा नदी बहती है तो दूसरी ओर दैत्याकार नंगे पहाड़ दिखते हैं। साल में चार माह से ज्यादा यह हिमपात के कारण दुनिया से कटा रहता है। उत्तराखण्ड के गंगोत्री और चीन के तिब्बत इलाके से सटे इस गांव में आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी, पशु चिकित्सालय, ब्रांच पोस्ट ऑफिस, पुलिस पोस्ट और स्कूल जैसी आधुनिक सुविधाएं हैं। सांगला के बाद दूसरी खूबसूरत घाटी कल्पा है, लेकिन कल्पा पहुंचने के लिये पहले फिर से करछम लौटना पड़ता है। करछम से करीब 20 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद आता है- पियो और यहां से 15 किलोमीटर आगे कल्पा है। दुर्गम चढ़ाई तय करने के बाद जब सैलानी कल्पा पहुंचता है, तो एक शहर सरीखा कस्बा देख उसकी बांछें खिल जाती हैं। यही कल्पा किन्नौर घाटी का मुख्यालय है और यहां सभी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं। कहते हैं कि यहां मूसलाधार बरसात नहीं होती बल्कि हल्की हल्की सी फुहारें पड़ती हैं। यहां के झरनों की छटा निराली है। ये गुनगुनाते झरने यहां सैलानी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं, वही यहां के खेतों और बागों को सींचते भी हैं। खरीददारी किन्नौर हैंडलूम और हस्तशिल्प के सामानों के लिए प्रसिद्ध है। यहां से शॉल, टोपियां, मफलर, लकड़ी की मूर्तियां और धातुओं से बना बहुत-सा सामान खरीदा जा सकता है। इसके अलावा किन्नौर फलों और ड्राई फूडस के उत्पादन के लिए भी काफी जाना जाता है। सेब, बादाम, चिलगोजा, ओगला, अंगूर और अखरोट आदि भी यहां से खरीदे जा सकते हैं। काल्पा, रिकांग पिऊ, करचम ताप्री आदि स्थानों में अनेक दुकानें है, जहां से इनकी खरीदारी की जा सकती है। कोठी काल्पा तहसील के इस विशाल प्राचीन गांव को कोष्टांपी के नाम से भी जाना जाता है। इस गांव के खेत और फलों के पेडृ इसकी सुंदरता को और बढृा देते हैं। देवी सुआंग चन्द्रिका मंदिर यहां बना हुआ है। यहां के स्थानीय निवासी इस देवी का बहुत सम्मान करते हैं और इसे बहुत शक्तिशाली मानते हैं। भैरों को समर्पित यहां एक अन्य मंदिर भी खासा लोकप्रिय है। निचार यह गांव तरांगा और वांगटू के बीच सतलुज नदी के बाएं तट पर बसा हुआ है। समुद्र तल से 215० मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव प्राकृतिक दृश्यावली से भरपूर है। यदि इस गांव से ऊपर की ओर जाया जाए तो घोरल, एंटीलोप्स, काले और लाल भालुओं को देखा जा सकता है। नाको कल्पा से 117 किमी. की दूरी पर नाको स्थित है। हंगरांग घाटी में स्थित यह गांव समुद्र तल से 36०० मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह गांव यहां की नाको झील के कारण भी लोकप्रिय है जिसमें गर्मियों के दौरान नौकायन की सुवधा है। सर्दियों में इस झील का पानी जम जाता है और उसमे स्केटिंग की जाती है। बौद्ध मठ भी यहां देखा जा सकता है। काजा एक जमाने में काजा स्पीति के प्रमुख की राजधानी थी। स्पीति नदी के बाएं किनारे पर स्थित यह नगर समुद्र तल से 36०० मीटर की ऊंचाई पर है। वर्तमान में काजा स्पीति सब डिवीज़न का मुख्यालय है। इस खूबसूरत स्थान में बहुत से बौद्ध मठ और हिन्दु मंदिर देखे जा सकते हैं। छितकुल समुद्र तल से 345० मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह बास्पा घाटी का अंतिम और सबसे ऊंचा गांव है। बास्पा नदी के दाहिने तट पर स्थित इस गांव में स्थानीय देवी माथी के तीन मंदिर बने हुए हैं। कहा जाता है कि माथी के सबसे प्रमुख मंदिर को 5०० साल पहले गढ़वाल के एक निवासी ने बनवाया था। भोजपत्र नामक वृक्षों के जंगलों से घिरा यह अल्पास के खूबसूरत चरागाहों और हिम भूदृश्यों के लिए जाना जाता हैं। करछम करछम (1899 मी.) सतलुज और बस्पा नदियों के संगम स्थल जोअरी, वांग्तु और तापरी गांवों के बाद आता हैं, जहां से सुन्दर बस्पा और सांगला घाटी प्रारंभ होती हैं। पोवारी पोवारी रामपुर से 70 कि.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर अंतिम मुख्य ठहराव हैं। रिकांग पिओ रिकांग पिओ 2670 मी.) शिमला से 231 कि.मी. और पोवारी से 7 कि.मी. दूर स्थित, किन्नौर जिले का मुख्यालय हैं। यहां स्थित उप-जिला मुख्यालय से किन्नौर घाटी में पर्यटन हेतु अनुमति ली जा सकती हैं। निकट ही भगवान बुद्ध की प्रतिमायुक्त कालाचक्र मंदिर से किन्नौर कैलाश का सुन्दर दृश्य दिखाई देता हैं। कोठी: कोठी, रिकांग पिओ से मात्र 3 कि.मी. दूर स्थित है, जहां चंडिका देवी का मंदिर हैं। पहाड़ों की गोद और देवदार के झुरमुट के बीच स्थापित इस मंदिर की शैली और शिल्प असाधारण हैं। देवी की स्वर्ण-निर्मित प्रतिमा अप्रतिम हैं। कल्पा कल्पा रिकोंग पिओ से 7 कि.मी. दूर स्थित ह। नदी के पार, कल्पा के सामने किन्नर कैलाश श्रृंखला हैं। भोर के समय जब उगते सूर्य की लाल और हल्की सुनहरी किरणें हिमानी चौटियों को चूमती हैं तो वह दृश्य बड़ा नयनाभिराम होता हैं पांगी पांगी रिकांग पिओ से चिलगोजा चीड़ के जंगलों से गुजरते हुए 10 कि.मी. दूर स्थित हैं। यह सेब के उद्यानों से घिरा है, जहां बुद्ध मंदिर, शेशरी नाग मंदिर दर्शनीय हैं। रिब्बा रिब्बा पोवारी से 16 कि.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर स्थित, अपने अंगूर के बगीचों और अंगूर से बनाई गई स्थानीय शराब ‘अंगूरी‘ के लिए मशहूर है। मूरंग मूरंग राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर पोवारी से 26 कि.मी. दूर, खूमानी की वाटिकाओं के मध्य स्थित हैं। पुह पुह राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर पोवारी से 58 कि.मी. दूर स्थित हैं जहां हरियाले खेत, खूमानी व अंगूर के बगीचे और बादाम के उद्यान देखे जा सकते हैं। यहां ठहरने की आरामदायक सुविधाएं हैं। चांगो एवं लियों चांगो एवं लियों सेब के उद्यानों से भरपूर हैं। चांगो में बुद्ध मठ भी स्थित है। सुमधो सुमधो स्पिति एवं पारे-चू नदियों के संगम स्थल पर स्थित, किन्नौर का अंतिम गांव हैं। कैसे पहुंचें: वायु मार्ग किन्नौर का निकटतम एयरपोर्ट शिमला में है। दिल्ली से शिमला के लिए सीधी फ्लाइट है। रेल मार्ग शिमला को रेलवे स्टेशन किन्नौर का निकटतम रेलवे स्टेशन है जो कालका से नेरो गैज लाइन से जुड़ा हुआ है। शिमला से कालका की दूरी 96 किमी.है। सडक़ मार्ग  सडक़ मार्ग से किन्नौर पहुंचने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग 22 की प्रयोग किया जाता है। दिल्ली, चंडीगढ़, शिमला, मनाली और कुल्लू से किन्नौर के लिए टैक्सी भी की जा सकती है।

पौराणिक किन्नरों की भूमि किन्नौर हिमाचल के उत्तर पूर्व में स्थित एक बेहद खूबसूरत जिला है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से घिरा यह क्षेत्र ऊपरी, मध्य और निचले किन्नौर हिस्सों में बंटा हुआ है। यहां पहुंचने का मार्ग दुर्गम होने के कारण यह क्षेत्र काफी लम्बे समय तक पर्यटकों से अछूता रहा है, लेकिन अब साहसिक और रोमांचप्रिय पर्यटक यहां बड़ी संख्या में आने लगे हैं।

 

प्राकृतिक दृश्यावली से भरपूर इस नगर की सीमा तिब्बत से सटी हुई है, जो इसे सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से लगभग 25० किमी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर स्थित यह नगर स्थित है। पहाड़ों और जंगलों के बीच कलकल ध्वनि से बहती सतलुत और स्पीति नदी का संगीत यहां की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है। स्पीति नदी आगे चलकर खाब में सतलुज से मिल जाती है। विश्व की विशालतम जांस्कर और ग्रेट हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के आकर्षक नजारे यहां से देखे जा सकते हैं। इस अनूठी घाटी की यात्रा हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से शुरू होती है और कहीं सुरम्य तो कहीं खतरनाक, ढलानदार पहाड़ी सडक़ें.

 

पहाड़ों का वक्ष चीरकर जिस तरह सडक़ें बनाई गईं हैं, इंजीनियरों के अथक परिश्रम और कार्यकुशलता का नमूना हैं। रास्ते में झर-झर झरते झरनों को देखकर मन प्रफुल्लित हो उठता है। ऐसा ही सफर तय करके आता है भावनगर। हिमाचल की मशहूर संजय विद्युत परियोजना यहीं है। पूरी तरह से भूमिगत यह परियोजना उच्च स्तरीय तकनीक का जीवंत उदाहरण है। यहां से करीब दस किलोमीटर आगे वांगतू पुल है। पहले यहां पुलिस चौकी पर परमिट चैक किये जाते थे लेकिन अब यह क्षेत्र सैलानियों के लिये खोल दिये जाने के कारण ऐसा नहीं होता।

 

लेकिन औपचारिकता निभाने के लिये पुलिसकर्मी अपनी तसल्ली जरूर करते हैं। वांगतू से आगे आता है टापरी और फिर कड़छम। कड़छम इस जिले की दो प्रमुख नदियों सतलुज और वास्पा का संगम कहलाता है। वास्पा नदी यहां सतलुज के आगोश में समा जाती है। यहां से एक मार्ग इस घाटी के एक खूबसूरत स्थल सांगला को जाता है। सांगला किन्नौर की सर्वाधिक प्रसिद्ध और रमणीय घाटी है। समुद्र तल से करीब ढाई हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित सांगला घाटी को पहले वास्पा घाटी भी कहा जाता था। ऐसी भी मान्यता है कि पूरी सांगला घाटी कभी एक विशालकाय झील थी, लेकिन कालान्तर में इस झील का पानी वास्पा नदी में तब्दील हो गया और बाकी क्षेत्र हरियाली से लहलहा उठा। भले ही यह मात्र किंवदंती ही हो लेकिन रंगीन फसलों, फूलों का परिधान ओढ़े सांगला घाटी स्वर्ग से कम नहीं लगती।

अनेक घुमक्कड़ों ने अपने संस्मरणों में इस घाटी के नैसर्गिक सौन्दर्य का वर्णन किया है। सांगला में बेरिंग नाग मन्दिर और बौद्ध मठ दर्शनीय है। सांगला में ही कृषि विश्वविद्यालय का क्षेत्रीय अनुसंधान उपकेन्द्र स्थित है। सांगला के ऊपर कामरू गांव है। यहां का पांच मंजिला ऐतिहासिक किला कला का उत्कृष्ट नमूना है।

 

गांव के बीच में ही नारायण मन्दिर और बौद्ध मन्दिर स्थित हैं और दोनों मन्दिरों का एक ही प्रांगण है। नारायण मन्दिर की काष्ठकला देखती ही बनती है। सांगला घाटी से किन्नर कैलाश के दर्शन भी किये जा सकते हैं। वास्तव में किन्नर कैलाश के पृष्ठ भाग में ही यह घाटी फैली हुई है। यहां पर आप किन्नौरी शोलें और टोपियां खरीद सकते हैं।

 

कल्पा

यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य की तरह यहां के लोग भी सुन्दर हैं। किन्नर बालाएं फूलों से सुसज्जित अपनी परम्परागत टोपियां पहनती हैं। टोपियों के दोनों ओर पीपल पत्र नामक चांदी का एक गहना बना होता है और चांदी के ही एक नक्काशीदार कड़े पर कसा रहता है। अपने शरीर को ये ऊनी कम्बल से साड़ी की भांति लपेटे रखती हैं। इस ऊनी कम्बल को स्थानीय भाषा में ‘दोहडू’ कहा जाता है।

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किन्नरियों में मेहमानों के आदर-सत्कार की भावना भी बहुत होती है। मेहमानों का स्वागत वे अपने हाथों से शराब पेश करके करती हैं। ऐसा करते समय उन्हें कोई संकोच नहीं होता, क्योंकि शराब को किन्नर समाज में महत्व प्राप्त है, लेकिन ताज्जुब की बात यह भी है कि जहां किन्नरियां शराब को बनाने से लेकर पेश करने तक का कार्य अपने हाथों से करती हैं, वहीं वे स्वयं शराब को मुंह तक नहीं लगातीं। शॉल बुनने में तो उनका कोई सानी नहीं है।

उनकी बनाई शालों में प्रकृति के विभिन्न रूप परिलक्षित होते हैं। सर्दियों में जब भारी बर्फबारी के कारण किन्नौर का सम्पर्क शेष दुनिया से कट जाता है तो किन्नरियां ऊनी कपड़े, कालीन और अन्य चीजें बुनने का काम करती हैं। उनके बनाये ऊनी वस्त्रों में डोहरियां, पट्टू, गुदमा आदि उल्लेखनीय हैं।किन्नौर घाटी वर्ष में तकरीबन छह मास बर्फ की सफेद चादर से ढकी रहती है। अगस्त से अक्तूबर तक का मौसम यहां खुशगवार होता है।

 

इन्हीं दिनों यहां सैलानियों और घुमक्कड़ों का सैलाब उमड़ता है। सेब, खुबानी, चूली, बग्गूगोशे, चिलगोजे और अंगूर यहां उम्दा किस्म के होते हैं। अंगूर की शराब भी यहां बड़े चाव से पी जाती है। किन्नौर में वर्ष भर त्यौहारों का सिलसिला चलता रहता है। ‘फूलैच’ किन्नौर घाटी का प्रमुख त्यौहार है। इस त्यौहार को ‘उख्यांग’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘उख्यांग’ दो शब्दों ‘ऊ’ और ‘ख्यांग’ से मिलकर बना है। ‘ऊ’ का अर्थ है फूल और ‘ख्यांग’ फूलों को देखना। यह त्यौहार फूलों के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।

ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से घिरा

कल्पा- ओल्ड हिन्दुस्तान तिब्बत रोड़ पर स्थित कल्पा किन्नौर का प्रारंभिक जिला मुख्यालय था। समुद्र तल से 2759 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव शिमला से 260 किमी. दूर है। हेरिटेज विलेज की तमाम खूबियां यहां देखी जा सकती हैं। प्रात: काल में बर्फीले पहाड़ों के बीच में उगता हुआ सूर्य की स्वर्णिम आभा यहां से बेहद खूबसूरत लगती है। यहां का नारायण नागनी मंदिर स्थानीय कला का बेजोड़ उदाहरण है। कल्पा में अनेक प्राचीन बौद्ध मठ बने हुए हैं। यह गांव 6०5० मीटर ऊंचे किन्नर कैलाश के बहुत ही निकट स्थित है। किन्नर कैलाश को भगवान शिव का शीतकालीन आवास माना जाता है।

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किन्नर कैलाश
  • सांगला

  • किन्नौर का यह लोकप्रिय गांव बास्पा नदी के दायें तट पर स्थित है। समुद्र तल से 2621 मीटर ऊंचा स्थित यह गांव अपनी अति उपजाऊ भूमि के लिए लोकप्रिय है। यह गांव ढलान पर बसा हुआ है जिसके पीछे रालदांग पर्वत की विशाल चोटियां देखी जा सकती हैं। यहां के जंगलों और सदैव बर्फ से आच्छादित पर्वत चोटियों की सुंदरता इसे अन्य स्थानों से अलग बनाती है। बास्पा नदी के बहने के कारण इस स्थान को बस्पा घाटी भी कहा जाता है। यह घाटी किन्नौर जिले की सबसे खूबसूरत घाटियों में एक है। सांगला – (2,860 मी.) किन्नौर क्षेत्र में सबसे बड़ा एवं दर्शनीय गांव हैं, जो करचम से 18 कि.मी. दूर हैं। यहां केसर के खेत, फलोद्यान और ऊपर जाने पर आल्पस के चरागाह हैं। किन्नौर कैलाश चोटी मन मोह लेती हैं। यहां से काली देवी का किले जैसा मंदिर ‘कमरू फोर्ट‘ भी देखा जा सकता हैं।सांगला से 14 किलोमीटर आगे रकछम गांव है। समुद्र तल से करीब तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित रकछम का नामकरण रॉक और छम के मिलन से हुआ है।
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  • रॉक अर्थात चट्टान या पत्थर और छम यानी पुल। कहते हैं कभी यहां पत्थर का पुल हुआ करता था, जिस वजह से गांव का नाम ही रकछम पड़ गया। रकछम से 12 किलोमीटर दूर किन्नौर जिले का आखिरी गांव है- छितकुल। लगभग साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर चीन की सीमा के साथ सटा है यह गांव। आबादी होगी कोई पांच सौ के करीब। साठ-सत्तर घर हैं। एक ओर वास्पा नदी बहती है तो दूसरी ओर दैत्याकार नंगे पहाड़ दिखते हैं। साल में चार माह से ज्यादा यह हिमपात के कारण दुनिया से कटा रहता है। उत्तराखण्ड के गंगोत्री और चीन के तिब्बत इलाके से सटे इस गांव में आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी, पशु चिकित्सालय, ब्रांच पोस्ट ऑफिस, पुलिस पोस्ट और स्कूल जैसी आधुनिक सुविधाएं हैं। सांगला के बाद दूसरी खूबसूरत घाटी कल्पा है, लेकिन कल्पा पहुंचने के लिये पहले फिर से करछम लौटना पड़ता है।
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  • करछम से करीब 20 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद आता है- पियो और यहां से 15 किलोमीटर आगे कल्पा है। दुर्गम चढ़ाई तय करने के बाद जब सैलानी कल्पा पहुंचता है, तो एक शहर सरीखा कस्बा देख उसकी बांछें खिल जाती हैं। यही कल्पा किन्नौर घाटी का मुख्यालय है और यहां सभी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं। कहते हैं कि यहां मूसलाधार बरसात नहीं होती बल्कि हल्की हल्की सी फुहारें पड़ती हैं। यहां के झरनों की छटा निराली है। ये गुनगुनाते झरने यहां सैलानी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं, वही यहां के खेतों और बागों को सींचते भी हैं।

खरीददारी

किन्नौर हैंडलूम और हस्तशिल्प के सामानों के लिए प्रसिद्ध है। यहां से शॉल, टोपियां, मफलर, लकड़ी की मूर्तियां और धातुओं से बना बहुत-सा सामान खरीदा जा सकता है। इसके अलावा किन्नौर फलों और ड्राई फूडस के उत्पादन के लिए भी काफी जाना जाता है। सेब, बादाम, चिलगोजा, ओगला, अंगूर और अखरोट आदि भी यहां से खरीदे जा सकते हैं। काल्पा, रिकांग पिऊ, करचम ताप्री आदि स्थानों में अनेक दुकानें है, जहां से इनकी खरीदारी की जा सकती है।

कोठी

काल्पा तहसील के इस विशाल प्राचीन गांव को कोष्टांपी के नाम से भी जाना जाता है। इस गांव के खेत और फलों के पेडृ इसकी सुंदरता को और बढृा देते हैं। देवी सुआंग चन्द्रिका मंदिर यहां बना हुआ है। यहां के स्थानीय निवासी इस देवी का बहुत सम्मान करते हैं और इसे बहुत शक्तिशाली मानते हैं। भैरों को समर्पित यहां एक अन्य मंदिर भी खासा लोकप्रिय है।

Chandika Temple Kothi Kinnaur , जन्नत-ए-हिमाचल: किन्नौर घाटी की सम्पूर्ण जानकारी- Himachali Roots , complete information about kinnaur himachal pradesh , kinnaur tourism , places to see in kinnaur , places of interest in kinnaur , history of kinnaur , Kinnaur himachal pradesh , history and information about kinnaur in hindi , प्रकृति की जन्नत: किन्नौर, खूबसूरती की छटा बिखरेती किन्नौर घाटी
Chandika Temple Kothi, Kinnaur

निचार

यह गांव तरांगा और वांगटू के बीच सतलुज नदी के बाएं तट पर बसा हुआ है। समुद्र तल से 215० मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव प्राकृतिक दृश्यावली से भरपूर है। यदि इस गांव से ऊपर की ओर जाया जाए तो घोरल, एंटीलोप्स, काले और लाल भालुओं को देखा जा सकता है।

Nichar Kinnaur , जन्नत-ए-हिमाचल: किन्नौर घाटी की सम्पूर्ण जानकारी- Himachali Roots , complete information about kinnaur himachal pradesh , kinnaur tourism , places to see in kinnaur , places of interest in kinnaur , history of kinnaur , Kinnaur himachal pradesh , history and information about kinnaur in hindi , प्रकृति की जन्नत: किन्नौर, खूबसूरती की छटा बिखरेती किन्नौर घाटी
Nichar Village, Kinnaur

नाको

कल्पा से 117 किमी. की दूरी पर नाको स्थित है। हंगरांग घाटी में स्थित यह गांव समुद्र तल से 36०० मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह गांव यहां की नाको झील के कारण भी लोकप्रिय है जिसमें गर्मियों के दौरान नौकायन की सुवधा है। सर्दियों में इस झील का पानी जम जाता है और उसमे स्केटिंग की जाती है। बौद्ध मठ भी यहां देखा जा सकता है।

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Nako Lake & Village, Kinnaur

काजा

एक जमाने में काजा स्पीति के प्रमुख की राजधानी थी। स्पीति नदी के बाएं किनारे पर स्थित यह नगर समुद्र तल से 36०० मीटर की ऊंचाई पर है। वर्तमान में काजा स्पीति सब डिवीज़न का मुख्यालय है। इस खूबसूरत स्थान में बहुत से बौद्ध मठ और हिन्दु मंदिर देखे जा सकते हैं।

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छितकुल

समुद्र तल से 345० मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह बास्पा घाटी का अंतिम और सबसे ऊंचा गांव है। बास्पा नदी के दाहिने तट पर स्थित इस गांव में स्थानीय देवी माथी के तीन मंदिर बने हुए हैं। कहा जाता है कि माथी के सबसे प्रमुख मंदिर को 5०० साल पहले गढ़वाल के एक निवासी ने बनवाया था। भोजपत्र नामक वृक्षों के जंगलों से घिरा यह अल्पास के खूबसूरत चरागाहों और हिम भूदृश्यों के लिए जाना जाता हैं।

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Chitkul Village, Kinnaur

करछम

करछम (1899 मी.) सतलुज और बस्पा नदियों के संगम स्थल जोअरी, वांग्तु और तापरी गांवों के बाद आता हैं, जहां से सुन्दर बस्पा और सांगला घाटी प्रारंभ होती हैं।

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Karcham, Kinnaur

पोवारी

पोवारी रामपुर से 70 कि.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर अंतिम मुख्य ठहराव हैं।

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रिकांग पिओ

रिकांग पिओ 2670 मी.) शिमला से 231 कि.मी. और पोवारी से 7 कि.मी. दूर स्थित, किन्नौर जिले का मुख्यालय हैं। यहां स्थित उप-जिला मुख्यालय से किन्नौर घाटी में पर्यटन हेतु अनुमति ली जा सकती हैं। निकट ही भगवान बुद्ध की प्रतिमायुक्त कालाचक्र मंदिर से किन्नौर कैलाश का सुन्दर दृश्य दिखाई देता हैं।

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PWD Headquarters, Reckong Peo

 

कल्पा

कल्पा रिकोंग पिओ से 7 कि.मी. दूर स्थित ह। नदी के पार, कल्पा के सामने किन्नर कैलाश श्रृंखला हैं। भोर के समय जब उगते सूर्य की लाल और हल्की सुनहरी किरणें हिमानी चौटियों को चूमती हैं तो वह दृश्य बड़ा नयनाभिराम होता हैं

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पांगी

पांगी रिकांग पिओ से चिलगोजा चीड़ के जंगलों से गुजरते हुए 10 कि.मी. दूर स्थित हैं। यह सेब के उद्यानों से घिरा है, जहां बुद्ध मंदिर, शेशरी नाग मंदिर दर्शनीय हैं।

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रिब्बा

रिब्बा पोवारी से 16 कि.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर स्थित, अपने अंगूर के बगीचों और अंगूर से बनाई गई स्थानीय शराब ‘अंगूरी‘ के लिए मशहूर है।

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Ribba In Winters

मूरंग

मूरंग राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर पोवारी से 26 कि.मी. दूर, खूमानी की वाटिकाओं के मध्य स्थित हैं।

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पुह

पुह राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर पोवारी से 58 कि.मी. दूर स्थित हैं जहां हरियाले खेत, खूमानी व अंगूर के बगीचे और बादाम के उद्यान देखे जा सकते हैं। यहां ठहरने की आरामदायक सुविधाएं हैं।

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चांगो एवं लियों

चांगो एवं लियों सेब के उद्यानों से भरपूर हैं। चांगो में बुद्ध मठ भी स्थित है।

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सुमधो

सुमधो स्पिति एवं पारे-चू नदियों के संगम स्थल पर स्थित, किन्नौर का अंतिम गांव हैं।

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कैसे पहुंचें:

 

वायु मार्ग

किन्नौर का निकटतम एयरपोर्ट शिमला में है। दिल्ली से शिमला के लिए सीधी फ्लाइट है।

रेल मार्ग

शिमला को रेलवे स्टेशन किन्नौर का निकटतम रेलवे स्टेशन है जो कालका से नेरो गैज लाइन से जुड़ा हुआ है। शिमला से कालका की दूरी 96 किमी.है।

सडक़ मार्ग

 सडक़ मार्ग से किन्नौर पहुंचने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग 22 की प्रयोग किया जाता है। दिल्ली, चंडीगढ़, शिमला, मनाली और कुल्लू से किन्नौर के लिए टैक्सी भी की जा सकती है।


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