पत्थर के मंदिरों की घाटी के नाम से प्रसिद्ध हाटकोटी मंदिर से जुड़ा इतिहास

हिमाचल के विख्‍यात मन्दिरों में से एक “माँ हाटकोटी”

हिमाचल जिसे देवभूमि की संज्ञा प्राप्त है और यहां के देवी-देवताओं के प्रति लोगों की आस्था भी उतनी ही गहरी है। ना केवल प्रदेश के लोगों की अपितु यहां के देवी-देवताओं के प्रति प्रदेश के साथ-साथ अन्य देश-विदेशों से आने वाले भी नतमस्तक अवश्य होते हैं। ऐसा ही प्रदेश का एक प्रसिद्ध मंदिर है हाटकोटी । जहां आकर एक अपार शांति का अनभुव तो होता ही है, साथ ही मनमोहक हरी-भरी वादियां भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।

हिमाचल के विख्‍यात मन्दिरों में से एक “माँ हाटकोटी” , पत्थर के मंदिरों की घाटी के नाम से प्रसिद्ध हाटकोटी मंदिर से जुड़ा इतिहास , hatkoti temple shimla himachal pradesh , hatkoti temple history in hindi

लोग दूर-दूर से माता हाटकोटी जी के दरबार में अपनी मन्नत लेकर पहुंचते हैं और माता हाटकोटी के दरबार में जो भी सच्चे मन से शीश झुकाकर मन्नत मांगता है माता उसकी हर मनोकामना पूरी करती है।

हाटकोटी मंदिर के चारों ओर का असीम सौंदर्य सैलानियों के मन को बहुत भाता है। हाटकोटी मंदिर में स्थापित महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति लोकमानस में दुर्गा रूप में पूजित है। आठवीं शताब्दी में बना यह मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से शिखर और पैगोड़ानुमा शिल्प की अमूल्य कृति है। वर्तमान में यह मंदिर दो छतरी के पैगोड़ा और शिखर शैली के मिश्रित रूप में बना है। शिखर पर सज्जे आमलक के ऊपर स्वर्ण कलश सुशोभित हैं। इस मंदिर का शेष शीर्ष भाग पत्थर की स्लेट की ढलानदार छत से आच्छादित है। हाटकोटी मंदिर दुर्गा के गर्भगृह में महिषा सुरमर्दिनी की तोरण से विभूषित आदमकद कांस्य प्रतिमा गहरी लोक आस्था का प्रतीक है।

  • “ माँ हाटकोटी ” अपार शांति, अद्भूत शक्ति की अनुभूति

हाटकोटी मंदिर , दुर्गा मंदिर के साथ शिखरनुमा शैली में बना शिव मंदिर है। इस मंदिर का द्वार शांत मुखमुद्रा में अष्टभुज नटराज शिव से सुसज्जित है। शिव मंदिर के गर्भगृह में प्रस्तर शिल्प में निर्मित शिवलिंग,दुर्गा,गरूड़ासीन लक्ष्मी-विष्णु,गणेश आदि की प्रतिमाएं है। इस मंदिर का द्वार मुख तथा बाह्यप्रस्तर दीवारें कीर्तिमुख, पूर्णघट,कमल और हंस की नक्काशी के साथ अलंकृत है।

नागर शैली में बने अन्य पांच छोटे-छोटे मंदिर प्रस्तर शिल्प के जीवन अलंकरण को प्रस्तुत करते हैं। इस पावन धारा पर संजोए पुरावशेष और प्रस्तर पर उर्त्कीण देवी-देवताओं की भाव-भंगिमाएं देवभूमि पर शैव-शाक्त संप्रदायों के प्रबल प्रभाव के उद्बोधक हैं। हाटकोटी दुर्गा का मंदिर मान्यता क्षेत्र व्यापक है। पर्वतीय क्षेत्रों में शाक्त धर्म का सर्वाधिक प्रभाव दुर्गा रूप में ही देखा जाता है।

  • हाटकोटी में महिषासुर र्मदिनी का पुरातन मंदिर

लगभग 1370 मीटर की उंचाई पर बसा पब्बर नदी के किनारे हाटकोटी में महिषासुर र्मदिनी का पुरातन मंदिर है। जिसमें वास्तुकला, शिल्पकला के उत्कृष्ठ नमूनों के साक्षात दर्शन होते हैं। शिमला से लगभग 104 किलोमीटर दूर, शिमला-रोहड़ू मार्ग पर पब्बर नदी के दाहिने किनारे पर धान के खेतों के बीच माता हाटकोटी के प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर के लिए जाना जाता है।

कहते हैं कि यह मंदिर 10वीं शताब्दी के आस-पास बना है। इसमें महिषासुर र्मदिनी की दो मीटर ऊंची कांस्य की प्रतिमा तोरण सहित विद्यमान है। इसके साथ ही शिव मंदिर है जहां पत्थर पर बना प्राचीन शिवलिंग है। द्वार को कलात्मक पत्थरों से सुसज्जित किया गया है। छत लकड़ी से निर्मित है, जिस पर देवी देवताओं की अनुकृतियां बनाई गई हैं। मंदिर के गर्भगृह में लक्ष्मी, विष्णु, दुर्गा, गणेश आदि की प्रतिमाएं हैं। इसके अतिरिक्त यहां मंदिर के प्रांगण में देवताओं की छोटी-छोटी मूर्तियां हैं। बताया जाता है कि इनका निर्माण पांडवों ने करवाया था।

मां दुर्गा व शिव भगवान का मन्दिर प्रदेश के विख्‍यात मन्दिरों की श्रेणीयों में से एक

पब्‍बर नदी के किनारे समतल स्‍थान पर निर्मित मां दुर्गा व शिव भगवान का मन्दिर हिमाचल प्रदेश के विख्‍यात मन्दिरों की श्रेणी में आता है। इस क्षेत्र में कई पर्यटक स्‍थल है तथा उतरंचल के लिए मार्ग इसी स्‍थान से होकर जाता है। इसके आस-पास महाभारत काल के कुछ अवशेष प्राप्‍त हुए हैं। ऐसा विश्‍वास है कि पांडवों ने अपना 12 वर्ष का वनवास इसी क्षेत्र में बिताया था।

ताम्र घट भगवती दुर्गा के द्वारपाल होने का प्रमाण करता है पुख्ता

महिषा नाम के दानव का मर्दन करती दर्शाई गई दुर्गा की यह प्रतिमा सौम्यभाव की अभिव्यक्ति देती है। यहां मंदिर के प्रवेश द्वार पर बाईं ओर लोहे की जंजीरों में बंधा एक विशालकाय ताम्र घट भगवती दुर्गा के द्वारपाल होने का प्रमाण पुख्ता करता है। जनश्रुति है कि इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनों ओर वृहदाकार ताम्र कुंभ स्थापित थे।

जब श्रावण मास में पब्बर खड्ड उफान पर होती थी तो यह दोनों घट लोहे की जंजीरों से मुक्ति पाने के लिए छटपटाहट में जोरदार सीटियों को मारने वाली आवाज जैसा वातावरण बना देते थे। जिससे यह स्पष्ट होता था कि दोनों घट अथाह जलवेग में बह जाने के लिए तत्पर रहते थे।

लोक मान्यता

यह भी लोक मान्यता है कि भगवती मूलतः रोहडू खशधार की माटी से उद्भासित होकर प्रबल जलवेग के साथ बहती हुई हाटकोटी के समतल भूभाग पर रूक गईं। आज भी यह लोक आस्था है कि जब-जब खशधार के नाले का बढ़ता जल वेग पब्बर नदी में शामिल होता है तब-तब हाटकोटी मंदिर में कुंभीय गर्जना अधिक भयंकर हो जाती है। कहा जाता है कि खशधार की दुर्गा के पब्बर नदी में प्रवाहित हुए अवशेषों की स्मृति में कुंभ विकराल रूंदन करते सुनाई देता है।

माँ के चरणों में बांधा गया है एक घड़ा, चरू में रखा भोजन बार-बार बांटने पर भी नहीं होता था खत्म ; पब्‍बर नदी से हुआ है घड़े का उदग्म:

  • हिमाचल के विख्‍यात मन्दिरों में से एक “माँ हाटकोटी” , पत्थर के मंदिरों की घाटी के नाम से प्रसिद्ध हाटकोटी मंदिर से जुड़ा इतिहास , hatkoti temple shimla himachal pradesh , hatkoti temple history in hindi

एक अन्‍य मान्‍यता के अनुसार माता दुर्गा के चरणों में एक बहुत बड़े घड़े को बांधा गया है जिसे चरू नाम से संम्‍बोधित किया गया है। इस घड़े का उदग्म पब्‍बर नदी से हुआ है। लोगों का यह मानना है कि जब पब्‍बर नदी में बाढ़ आती है तो यह घड़ा नदी की ओर हिलने लगता है। कहा जाता है कि हाटकोटी मंदिर की परीधि के ग्रामों में जब कोई विशाल उत्सव,यज्ञ,शादी आदि का आयोजन किया जाता था तो हाटकोटी से चरू लाकर उसमें भोजन रखा जाता था।

चरू में रखा भोजन बार-बार बांटने पर भी समाप्त नहीं होता था। यह सब दैविक कृपा का प्रसाद माना जाता था। चरू को अत्यंत पवित्रता के साथ रखा जाना आवश्यक होता था अन्यथा परिणाम उलटा हो जाता था। लोक मानस में चरू को भी देवी का बिंब माना जाता रहा है। शास्त्रीय दृष्टि से चरू को हवन या यज्ञ का अन्न भी कहा जाता है।

  • ब्रह्ममुहूर्त में प्रतिदिन स्थानीय बोली में किया जाता है भगवती का स्तुति गान

  • वाद्य यंत्रों की लय और ताल पर होती है पूजा

हाटकोटी मंदिर के दैनिक पूजा विधान में प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में भगवती का स्तुति गान स्थानीय बोली में किया जाता है। प्रात:कालीन पूजा को ढोल-नगाड़ों की देव धुन पर किया जाता है। इसे लोक मानस में प्रबाद कहा जाता है। सूर्योदय के साथ-साथ एक बार फिर पूजा की जाती है। इसके बाद दोपहर तथा सांझ होते ही पूजा-अर्चना करने का विधान है। सांयकालीन पूजा को सदीवा कहते है। रात्रिकालीन में मां दुर्गा के शयन पर नब्द बजाई जाती है। यहां प्रत्येक पूजा वाद्य यंत्रों की लय और ताल पर की जाती है। हाटकोटी मंदिर शिमला- रोहडू मार्ग पर है।

  • राजा विराट ने बनाया हाटकोटी मंदिर

मान्यता है कि हाटकोटी के मंदिर का निर्माण राजा विराट ने किया था। पांडवों का संबंध इस मंदिर से जोड़ा जाता है। मंदिर में माता की अष्टभुजा मूर्ति अद्वितीय है।

  • हाटकोटी मेला

हाटकोटी (रोहड़ू) में इस मेले को दुर्गा माता (महिषासुरमर्दिनी) की याद में आयोजित किया जाता है। मान्यता है कि हाटकोटी के मंदिर

का निर्माण राजा विराट ने किया था। पांडवों का संबंध इस मंदिर से जोड़ा जाता है। मंदिर में माता की अष्टभुजा मूर्ति अद्वितीय है। वस्तुतः भगवती सम्पूर्ण जगत की अधीश्वरी हैं।

वे अपने भक्तों की रक्षा तथा कल्याण के लिए ही प्रकट रूप में इस मन्दिर में निवास करती हैं। हाटकोटी शिमला से 104 किमी, पब्बर नदी के तट पर एक सुरम्य गांव है। दो पहाड़ी धारायें अर्थात् बिशकुल्टी और रावती, हाटकोटी में पब्बर में मिल जाती हैं। नदी के पानी का रंग स्लेटी है, जो एक पौराणिक कथा के अनुसार, नदी में से जहर बाहर रिसने के कारण है।

  • तीन पानी की धाराओं के मिलन स्थान है हाटकोटी

हाटकोटी भी हिंदुओं के लिए एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है क्योंकि यह संगम या तीन पानी की धाराओं के मिलन स्थान पर स्थित है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस जगह का धार्मिक महत्व है। यह वह जगह है जहां हिंदू देवता, भगवान शिव और उसकी पत्नी देवी पार्वती के बीच एक वाद हुआ था।

  • ‘पत्थर के मंदिरों की घाटी’ हाटकोटी

यात्रियों को लकड़ी के दरवाजे और पत्थर की दीवारों के प्राचीन युग की कलात्मक उत्कृष्टता का प्रदर्शन करने वाले सुंदर मंदिर मिल

सकते हैं। इन मंदिरों की उपस्थिति के कारण हाटकोटी ने ‘पत्थर के मंदिरों की घाटी’ का खिताब अर्जित किया। ट्रैकिंग, पर्वतारोहण और राफ्टिंग भी हाटकोटी के दर्शकों के बीच लोकप्रिय है। इस स्‍थान पर लोगों के ठहरने के लिए भी उचित सुविधाएं है। इस स्‍थान पर विश्राम गृह का निर्माण भी किया गया है।

SOURCE: Himshimla Live , Ajab Gazab


make your website , Make your own website at cheapest rates. make your own website at 1200 indian rupees. create your own website , start your own website, create your own website for free


आपको ये लेख कितना पसंद आया या इस से सम्बंधित कोई सुझाव हो तो आप हमें कमैंट्स में बता सकते हैं अन्यथा आप हमें इस पते पर मेल भी कर सकते हैं: admin@www.himachali.in

अगर आप भी लिखने के शौकीन हैं या आपके पास कोई लेख हो शेयर करने के लिए तो आप यहाँ पे क्लिक करके हमें अपना लेख तुरंत भेज सकते हैं:

Submit Your Article





 

इसे भी पढ़िए:

 

ये चमत्कारी पत्थर दोनों हाथों से नहीं हिलता लेकिन सबसे छोटी अकेली ऊँगली से हिल जाता है

यह पत्थर अपने आप में एक कौतुहल का विषय बना हुआ है। इस पत्थर की विशेषता है कि इस पत्थर को यदि दोनों हाथों से हिलाना चाहो तो यह नही हिलेगा और आप अपने हाथ की सबसे छोटी अंगुली से इस पत्थर को हिलाओगे तो यह हिल जायेगा। है ना यह पत्थर भी ….Read More!

 

बिजली महादेव कुल्लू -हर बारह साल में शिवलिंग पर गिरती है बिजली

भारत में भगवन शिव के अनेक अद्भुत मंदिर है उन्हीं में से एक है हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्तिथ बिजली महादेव। कुल्लू का पूरा इतिहास बिजली महादेव से जुड़ा हुआ है। कुल्लू शहर में ब्यास और पार्वती नदी के संगम के पास एक ऊंचे पर्वत के ऊपर बिजली महादेव….Read More!

 

हिमाचल के ममलेश्वर महादेव मंदिर में है 5 हजार साल पुराना भीम का ढोल और 200 ग्राम का गेंहू का दाना

क्या आपने कभी 200 ग्राम वजन का गेंहूं का दाना देखा है वो भी महाभारत काल का यानी की 5000 साल पुराना? यदि नहीं तो आप इसे स्वयं अपनी आँखों से देख सकते है , इसके लिए आपको जाना पड़ेगा ममलेश्वर महादेव मंदिर जो की हिमाचल….Read More!

 

जानिए क्या है चौरासी मंदिर का रहस्य, ऐसा एक मंदिर जहां मरने के बाद सबसे पहले पहुंचती है आत्मा

Chaurasi Temple History & Facts चौरासी मंदिर जहां मरने के बाद सबसे पहले पहुंचती है आत्मा” एक मंदिर ऐसा है जहां मरने के बाद हर किसी को जाना ही पड़ता है चाहे वह आस्तिक हो या नास्तिक। यह मंदिर किसी और दुनिया में नहीं बल्कि भारत की जमीन पर…. Read More!

 

यह हैं किन्नर कैलाश/हिमाचल का बदरीनाथ, चमत्कारी शिवलिंग दिन में कई बार बदलता है रंग

तिब्बत स्थित मानसरोवर कैलाश के बाद किन्नर कैलाश को ही दूसरा बडा कैलाश पर्वत माना जाता है। सावन का महीना शुरू होते ही हिमाचल की खतरनाक कही जाने वाली किन्नर कैलाश यात्रा शुरू हो जाती है।इस यात्रा के बारे में कहा जाता है कि इस यात्रा को अपने जीवन काल में….Read More!

 

रावण ले जाना चाहता था इस शिवलिंग को, पढ़ें ऐसी है बैजनाथ मंदिर की पूरी कहानी

बैजनाथ शिव मंदिर हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा ज़िले में शानदार पहाड़ी स्थल पालमपुर में स्थित है। 1204 ई. में दो क्षेत्रीय व्यापारियों ‘अहुक’ और ‘मन्युक’ द्वारा स्थापित बैजनाथ मंदिर पालमपुर का एक प्रमुख आकर्षण है और यह शहर से 16 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। हिन्दू देवता शिव को….Read More!

 

शंगचुल महादेव मंदिर – घर से भागे प्रेमियों को मिलता है यहां आश्रय

विरासत के नियमों का पालन कर रहे इस गांव में पुलिस के आने पर भी प्रतिबंध है। किसी भी जाति के प्रेमी युगल जब तक इस मंदिर की सीमा में रहते हैं तब तक उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता….Read More!

 

जय बाबा जलाधारी मंदिर पालमपुर, यहां पहाड़ से निकलता था दूध

बाबा जलाधारी / दूधाधारी की पौराणिक कथा पालमपुर उपमंडल में सुलाह से करीब 21 किलोमीटर दूरी पर स्थित दूसरे अमरनाथ के नाम प्रसिद्ध बाबा जलाधारी मंदिर क्यारवां में श्रावण माह के हर सोमवार को भारी संख्या में श्रद्धालु शिव भगवान की पूजा अर्चना कर मनवांछित फल….Read More!

 

काठगढ़ महादेव, यहां है अदभुत आधा शिव आधा पार्वती रूप शिवलिंग, दो भागों का शिवरात्रि पर हो जाता है ‘मिलन’

काठगढ़ महादेव,  अर्धनारीश्वर अदभुत: शिवलिंग   धार्मिक दृष्टि से पूरा संसार ही शिव का रूप है। इसलिए शिव के अलग-अलग अद्भुत स्वरूपों के मंदिर और देवालय हर जगह पाए जाते हैं। ऐसा ही एक मंदिर स्थित है – हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित काठगढ़ महादेव । इस मंदिर….Read More

 

कामरू नाग :हिमाचल की एक झील जिसमें गड़ा है अरबों का खजाना!

आज हम आपको एक ऐसी झील के बारे में बताने जा रहे है जिसके बारे में कहा जाता है की उसमे अरबों रुपए का खजाना दफन है यह है हिमाचल प्रदेश  के पहाड़ो में स्थित कामरू नाग / कमरुनाग झील। यह झील हरे भरे देवदार के पेड़ो से घिरी हुई है जो .…Read More!

 

वास्तव में यह है कांगड़ा की शक्तिपीठ ज्वालामुखी देवी से जुड़ा इतिहास और पुराण, यहाँ अकबर ने भी मानी थी हार, होती है नौ चमत्कारिक ज्वाला की पूजा

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलोमीटर दूर ज्वालामुखी देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। ज्वाला मंदिर को जोता वाली मां का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता है। यह मंदिर माता के अन्य मंदिरों की तुलना में अनोखा है, क्योंकि यहां पर किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है, बल्कि पृथ्वी के गर्भ .…Read More!

 

जानिए क्यों पांडवों द्वारा निर्मित शिकारी देवी मंदिर पर आज तक छत नहीं लग पाई?

शिकारी देवी का यह मंदिर करसोग , जनजेलही घाटी में एक उच्चे शिखर पर 11000 फ़ीट की उचाई में स्थित है. मगर सबसे हैरत वाली बात ये  कि मंदिर पर छत नहीं लग पाई। कहा जाता है कि कई बार मंदिर पर छत लगवाने काम शुरू किया गया। लेकिन हर बार….Read More!

 

हत्यादेवी :हिमाचल में यह रहस्यमयी मंदिर साल में सिर्फ एक बार ही खुलता है, पुरोहित की एक गलती से यहां हत्यादेवी बन गई थी राजकुमारी.

हिमालय की गोद में बसे इस मंदिर का यह रहस्यमयी कक्ष साल में सिर्फ एक दिन के लिए ही खुलता है। यहां राजकुमारी के साथ कुछ ऐसा हुआ था कि वह हत्यादेवी बन गई थी। हत्यादेवी की एक गांव पर असीम कृपा है जबकि एक गांव के लोग यहां जाने से भी डरते हैं। आइए जानते हैं पूरी कहानी…Read More!

आज हम आपको पहाड़ों पर बसे देवी भीमाकाली मंदिर की परंपरा शक्ति और इतिहास से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं

भीमाकाली मंदिर के साथ अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं जिनके अनुसार आदिकाल मंदिर के स्वरूप का वर्णन करना कठिन है परंतु पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि वर्तमान भीमाकाली मंदिर सातवीं-आठवीं शताब्दी के बीच बना है। भीमाकाली शिवजी की अनेक मानस पुत्रियों में ….Read More!

जानिए क्या है बाबा बालकनाथ जी एवं इनके पूजनीय स्थल दयोटसिद्ध से जुड़ा इतिहास और क्यों है विशेष मान्यता?

बाबा बालकनाथ जी की कहानी बाबा बालकनाथ अमर कथा में पढ़ी जा सकती है, ऐसी मान्यता है, कि बाबाजी का जन्म सभी युगों में हुआ जैसे कि सत्य युग,त्रेता युग,द्वापर युग और वर्तमान में कल युग और हर एक युग में उनको अलग-अलग नाम से जाना गया जैसे “सत युग” में….Read More!

शायद इससे आप वाकिफ न हो, आज हम आपको हिडिंबा देवी के मंदिर के इतिहास से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश— के कुल्‍लू में मनाली में स्थित हिडिंबा देवी का मंदिर है। इसका इतिहास पांडवों से जुड़ा हुआ है। शायद इससे आप वाकिफ न हो। आपको इसी मंदिर के इतिहास आज हम रू-ब-रू कराने जा रहे हैं। आप जानते हैं कि जुए में सब कुछ हारने पर धृतराष्ट्र व दुर्योधन ने पाण्डवों को वारणावत नाम ….Read More!

 

भोलेनाथ ने भक्तों को बचाने के लिए यहां किया ‌था चमत्कार, जानिए शिरगुल मंदिर का इतिहास

विशालकाय सांप से अपने भक्तों के बचाने के लिए भगवान शिव ने यहां अपना चमत्कार दिखाया था। यहां आज भी किसी देवी देवता की मूर्ति स्‍थापित नहीं है लेकिन इसके बावजूद यहां आने वाले भक्तों की सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं। शिरगुल/ Shirgul मंदिर हिमाचल के…..Read More!

 

वास्तव में यह है पहाड़ों पर बसे जाखू मंदिर से जुड़ा इतिहास और पुराण

जाखू मंदिर हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। यह प्रसिद्ध मंदिर ‘जाखू पहाड़ी’ पर स्थित है। भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान को समर्पित यह मंदिर हिन्दू आस्था का मुख्य केंद्र …..Read More!

 

मणिमहेश : आज तक इस रहस्यमयी पहाड़ की ऊंचाई कोई नहीं नाप पाया

कैलाश पर्वत मणिमहेश, रहस्यमयी पहाड़, जिस पर चढ़ने की बात से भी कांपते हैं लोग, जानिए क्या है वास्तविकता:   भगवान शिव से जुड़े देश भर में ऐसे कई स्‍थान हैं जो भोलेनाथ के चमत्कारों के गवाह रहे हैं। ऐसी ही एक जगह है मणिमहेश। कहते हैं भगवान शिव ने यहीं…..Read More!

 

एक गुफा में है गणेश जी के कटे हुए स‌िर का रहस्य

हिंदू धर्म में भगवान गणेश जी को प्रथम पूज्य माना गया है। गणेश जी के जन्म के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव ने क्रोधवश गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया था, बाद में माता पार्वतीजी के कहने पर….Read More!

 

शिव बाड़ी :कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की नगरी, जानिए मंदिर से जुड़ा इतिहास और पुराण

शिव बाड़ी यानी शिव का वास स्थान। गगरेट स्थित प्राचीन द्रोण शिव मंदिर | कहते हैं कि यह स्थल महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की नगरी थी। यहां भगवान शिव का एवं भव्य मंदिर है।धारणा है कि शिव बाड़ी निर्माण स्वयं शिवजी ने किया था। कहते….Read More!

 

हिमाचल प्रदेश, चंबा में स्थित मां शिव शक्ति मंदिर का इतिहास एवं अन्य दिलचस्प बातें!

“छतराड़ी स्थित मां शिव शक्ति” हिमाचल प्रदेश, जिला चंबा के में छतराड़ी स्थित मां शिव शक्ति के बारे में कुछ जानकारी हमारी संस्कृति देवत्व प्रधान संस्कृति रही है। देवत्व यानि देनेवाली संस्कृति, समर्पण की संस्कृति। हिमाचल एक प्राकृतिक क्षेत्र है जिसके बारह जिलों में……Read More!

Share Some Love

Comments

comments

Leave a Reply