भगवान परशुराम से मिलने आज भी आती हैं, मां रेणुका झील और मंदिर से जुड़ा इतिहास

रेणुका झील और मंदिर से जुड़ा इतिहास, मान्यता है कि भगवान परशुराम से मिलने आज भी आती हैं मां रेणुका

हिमाचल के जिला सिरमौर की ये रेणुका झील दुनिया भर में प्रसिद्घ है। राज्य की सबसे बड़ी झील होने के साथ साथ इसे काफी पवित्र भी माना जाता है। झील भगवान परशुराम की माता रेणुका का स्‍थाई निवास है जो सदियों से इसी झील में वास कर रही हैं।

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रेणुका वही जगह है जहां भगवान विष्‍णु के छठे स्वरूप परशुराम का जन्म हुआ था। कहते हैं महर्षि जमदाग्नि और उनकी पत्नी भगवती रेणुका जी ने झील के साथ लगती चोटी तापे का टिब्‍बा में सदियों तक तपस्या की थी

कहा जाता है कि उस समय इस झील का नाम राम सरोवर होता था। भगवान विष्‍णु ने इनकी तपस्या से खुश होकर वर दिया कि वह स्वयं उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। बाद में ऐसा ही हुआ।

वर्षों बाद सहस्‍त्रबाहु नाम के एक शक्तिशाली शासक ने इस इलाके पर हमला कर दिया। कामधेनु गाय हासिल करने के लिए उसने महर्षि को भी पकड़ लिया और जोर जबरदस्ती करने लगा।

मगर महर्षि जमदाग्नि ने यह कहकर गाय देने से इंकार कर दिया कि यह गाय उन्हें भगवान विष्‍णु ने दी है। ऐसे में वह इस गाय को किसी और को देकर भगवान का भरोसा नहीं तोड़ सकते।

 

इससे क्रोधित होकर सहस्‍त्रबाहु ने महर्षि की हत्या कर दी। उसी समय उनकी पत्नी रेणुका जी साथ लगते राम सरोवर में कूद गई और हमेशा के लिए जलसमाधि ले ली। उस समय परशुराम यहां नहीं थे।

 

बाद में जब परशुराम को इसका पता चला तो उन्होंने सहस्‍त्रबाहु का वध कर दिया। साथ ही तपस्या से हासिल की विद्या से पिता को भी नया जीवन दे दिया।

बाद में परशुराम ने अपनी मां से विनती की कि वह झील से बाहर आ जाए। मगर मां रेणुका ने कहा कि वह अब हमेशा के ‌लिए इस झील में वास करेंगी। वह परशुराम से मिलने साल में एक बार आएंगी।

 

कहते हैं कि इसके बाद से ही झील का नाम रेणुका झील पड़ा। उसी समय से इसकी आकृति भी महिला के आकार में ढल गई। पुराणों में भी इसका जिक्र किया गया है।

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मान्यता है कि दशमी से एक दिन पहले मां परशुराम से मिलने आती है। इसके लिए यहां मेले में विशाल शोभा यात्रा भी निकाली जाती है। झील के पवित्र पानी में लाखों श्रद्घालु स्नान करते हैं। यहां पांच दिन का रेणुका मेला भी मनाया जाता है।

 


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