धरती पर स्वर्ग देवभूमि हिमाचल की राजधानी शिमला से जुड़ी 30 रोचक बातें!

शिमला को लेकर 30 ऐसी बातें जिन्हें एक हिमाचली भी मुश्किल से ही जानता होगा , facts about shimla , amazing , himachal pradesh , india , shimla , shimla history , snowfall , things about shimla you should know , shimla himachal pradesh , hillstations , best hill station in the world

शिमला जिसे अंग्रेजों ने ग्रीष्मकालीन राजधानी के तौर पर स्थापित किया था. शिमला जो हिमालय की तराइयों में कुछ ऐसे बसा है कि वहां पहुंच कर व्यक्ति ख़ुद के और भी नज़दीक पहुंच पाता है.

तो इसी सभी के मद्देनज़र हम आप सभी को रू-ब-रू करा रहे हैं शिमला के बाबत कुछ ऐसे ही तथ्यों से जिन्हें आप शायद ही जानते हों…

 

30. इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज- आई.आई.ए.एस के पास सन् 1888 में ही बिजली सप्लाई के लिए अपनी समुचित व्यवस्था थी. इसे सन् 1884 में लॉर्ड डफरिन के आवास हेतु बनवाया गया था, जो आज आई.आई.ए.एस हाउस के तौर पर जाना जाता है.

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29. नाथूराम गोडसे का ट्रायल यहीं चला था, जिसे आज पीटरहॉफ होटल के तौर पर जाना जाता है. इस बिल्डिंग में कभी सात वायसराय रहा करते थे, और कभी यहीं से पंजाब का हाईकोर्ट भी चला करता था.

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28. अंग्रजों से पहले शिमला के क्षेत्र पर नेपाल का शासन चला करता था. शिमला अंग्रेजों से पहले नेपाल के पृथ्वी नारायण शाह के साम्राज्य के अंतर्गत आया करता था. इसे सन् 1864 में ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया था.

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27. शिमला को हमारे देश के सबसे जवां और युवा शहर के तौर पर शुमार किया जा सकता है. यहां की 55 प्रतिशत जनसंख्या 16 से 55 के बीच की है और बाकी की बची संख्या में 28 प्रतिशत तो 15 साल से भी नीचे हैं.

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26. शिमला सात चोटियों पर स्थित है. सर्दियों में प्रोस्पेक्ट हिल, इसके अलावा 6 हिल्स हैं ऑब्जर्वेटरी हिल, समर हिल, इन्वेरार्म हिल, बैंटोनी हिल, जाखू हिल और इलिसियम हिल.

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25. शिमला एम.टी.बी हिमालया की मेजबानी करता है, जिसे साउथ ईस्ट एशिया के सबसे बड़े और भव्य माउंटेन बाइकिंग रेस के तौर पर जाना जाता है.

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24.कालका-शिमला रेलवे को यूनेस्को ने वैश्विक धरोहर के तौर पर मान्यता दी है. कालका से शिमला रूट पर 806 पुल हैं और 103 सुरंगें हैं. (Presently 101)

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23.वाइसरीगल लॉज की तरफ जाने में आपको यैरो मिलेंगे… इन बेहद पुराने बंगलों में कभी मोहम्मद अली जिन्ना का आवास हुआ करता था.

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22.शिमला के पास पूरे दक्षिण एशिया में एक बर्फीला ग्राउंड है जहां आइस स्केटिंग रिंक है.

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21.यहां के आननडेल ग्राउंड में सन् 1888 के दौरान डूरंड कप फुटबॉल टूर्नामेंट का आयोजन किया गया था.

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20.शिमला का टाउनहॉल सन् 1888 में बना था. यह एक भूकंपरोधी बिल्डिंग है.

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19.मोहनदास करमचंद गांधी सन् 1921 में 11 मई की तारीख को यहां पहली बार आए थे.
उनके साथ पंडित मदन मोहन मालवीय और लाला लाजपत राय भी थे.

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18. ऐसा कहा जाता है कि आई.जी.एम.सी के कोरिडोर पर भूतों का कब्जा है.  यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि कई बर वे लोगों को धकेलते हैं तो वहीं कई बार वे लिफ्ट रोक देते हैं. तो वहां कई बार वे लोगों को नाम से पुकारते भी हैं.

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17.यहां के नव बहार के पास एक चुडैंल बावली नामक जगह है जो गैर शादी-शुदा लड़कों को उसकी ओर आकर्षित करती है. ऐसा कहा जाता हैं कि यहां कारें ख़ुद-ब-ख़ुद रुक जाती हैं और लोग उनकी पिछली सीट पर किसी सफेद साड़ी में लिपटी औरत को महसूस करते हैं.

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16.शिमला अनुपम खेर, प्रेम चोपड़ा, बलराज साहनी और प्रिया राजवंश जैसे बॉलीवुड के दिग्गजों की जन्मभूमि है.

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15.यहां के विश्व प्रसिद्ध जाखू मंदिर को लेकर लोगों के बीच ऐसी मान्यता है कि यहां कभी हनुमान रुके थे और वहां उनके कदमों की छाप देखी जा सकती है.

Jakhu Temple Shimla

14.यहां एक मारिया ब्रदर्स के नाम से किताबों की बहुत पुरानी दुकान है जहां 16वीं-17वीं सदी के तिब्बती पांडुलिपि “आर्य आस्था साहश्रिकास प्रज्ञा परमिता” सुरक्षित रखी हैं.इसे सोने और चांदी के स्याही से लिखा गया था.

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13.शिमला ने इसका पहला अख़बार सन् 1848 में निकाला था, इसे शिमला अख़बार का नाम दिया गया था.इसे उन दिनों मुस्लिम समुदाय द्वारा चलाया जाता था जिसे अंग्रेजों ने तुरंत ही बंद कर दिया.

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12.शिमला में पहली खोली गई दुकान एक कसाईखाने की दुकान थी जिसे मेसर्स बैरेट एंड कंपनी ने खोला था.

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11.ऑकलैंड हाउस स्कूल भारत का एक मात्र ऐसा गर्ल्स स्कूल है जहां स्कूबा डाइविंग की भी सुविधा है

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10.संजौली का जोनांग टाक्टेन फूंटसोक कोइलिंग मोनेस्ट्री(मठ) भारत में इसके तरह का अजूबा मठ है.इसके अलावा दूसरा सिर्फ़ तिब्बत में ही है जहां ‘कालचक्र’ का ज्ञान दिया जाता है.

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09.शिमला की पहली सड़क सन् 1828 में बनी थी.  इस सड़क को ब्रिटिश हुकूमत के दौरान ‘ठंडी सड़क’ के तौर पर जाना जाता था.

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08.शिमला का बी.सी.एस स्कूल भारत का ही नहीं बल्कि पूरे एशिया का सबसे पुराना बोर्डिंग स्कूल है. यह स्कूल सन् 1863 से चल रहा है. आज भी इस स्कूल का एक दरवाजा बंद है जिस दरवाजे से 100 मुस्लिम छात्र विभाजन के दौरान पाकिस्तान चले गए थे.

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07.यहां का गोरखा द्वार दरअसल गोरखाओं के सम्मान में बनाया गया था जब वे ब्रिटिश सेना की ओर से जांबाज़ी से लड़ कर वापस लौटे थे.

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06.संजौली के कब्रगाह में एक पतली सड़क है जो आत्महत्या हेतु समर्पित है.

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05.शिमला सिज्मिक दाब के चौथी श्रेणी में आता है.
यहां के अधिकारियों की मानें तो शिमला में 2 प्रतिशत इमारतें भी ऐसी नहीं हैं जो भारी भूकंप को सहन कर पावें. क्योंकि आज यहां लाखों लोगों का बसेरा है जिसे सिर्फ़ 16,000 की संख्या तक लोगों को रहने हेतु बसाया गया था.

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04.यहां के रिज का उत्तरी स्लोप धंस रहा है. यहां का ग्रांड होटल वेस्ट, लक्कड़ बाजार नीचे की ओर जा रहा है. शिमला में सिर्फ़ 187 इमारतें ही ऐसी हैं जो पांच माले से ऊंची हैं.

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03.शिमला सम्मेलन को आज एक सदी बीत चुकी है. तिब्बतवासी आज भी निर्वासितों की ज़िंदगी ही गुज़र-बसर कर रहे हैं. इस समझौते में भारत, चीन और तिब्बत शामिल थे इस समझौते के तहत तिब्बत को स्वतंत्र गणराज्य की मान्यता प्रदान की गई थी. यह समझौता सन् 1914 में हुआ था.

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02. शिमला की युवा पीढ़ी के बीच टैटूओं का जबरदस्त क्रेज है. पूरे शिमला में आपको ऐसे कई टैटू आर्टिस्ट मिल जाएंगे जो आपके मनमाफ़िक डिजाइन्स बना देंगे.

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01.यहां के रिज के उत्तरी हिस्से से बारिश का पानी सतलज नदी होते हुए अरब सागर की ओर बढ़ता है तो वहीं उत्तरी धारा यमुना का रूप लेकर बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ती है.

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रेणुका झील और मंदिर से जुड़ा इतिहास, मान्यता है कि भगवान परशुराम से मिलने आज भी आती हैं मां रेणुका

हिमाचल के जिला सिरमौर की ये रेणुका झील दुनिया भर में प्रसिद्घ है। राज्य की सबसे बड़ी झील होने के साथ साथ इसे काफी पवित्र भी माना जाता है। झील भगवान परशुराम की माता रेणुका का स्‍थाई निवास है जो सदियों से इसी झील में वास कर रही हैं।

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रेणुका वही जगह है जहां भगवान विष्‍णु के छठे स्वरूप परशुराम का जन्म हुआ था। कहते हैं महर्षि जमदाग्नि और उनकी पत्नी भगवती रेणुका जी ने झील के साथ लगती चोटी तापे का टिब्‍बा में सदियों तक तपस्या की थी

कहा जाता है कि उस समय इस झील का नाम राम सरोवर होता था। भगवान विष्‍णु ने इनकी तपस्या से खुश होकर वर दिया कि वह स्वयं उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। बाद में ऐसा ही हुआ।

वर्षों बाद सहस्‍त्रबाहु नाम के एक शक्तिशाली शासक ने इस इलाके पर हमला कर दिया। कामधेनु गाय हासिल करने के लिए उसने महर्षि को भी पकड़ लिया और जोर जबरदस्ती करने लगा।

मगर महर्षि जमदाग्नि ने यह कहकर गाय देने से इंकार कर दिया कि यह गाय उन्हें भगवान विष्‍णु ने दी है। ऐसे में वह इस गाय को किसी और को देकर भगवान का भरोसा नहीं तोड़ सकते।

 

इससे क्रोधित होकर सहस्‍त्रबाहु ने महर्षि की हत्या कर दी। उसी समय उनकी पत्नी रेणुका जी साथ लगते राम सरोवर में कूद गई और हमेशा के लिए जलसमाधि ले ली। उस समय परशुराम यहां नहीं थे।

 

बाद में जब परशुराम को इसका पता चला तो उन्होंने सहस्‍त्रबाहु का वध कर दिया। साथ ही तपस्या से हासिल की विद्या से पिता को भी नया जीवन दे दिया।

बाद में परशुराम ने अपनी मां से विनती की कि वह झील से बाहर आ जाए। मगर मां रेणुका ने कहा कि वह अब हमेशा के ‌लिए इस झील में वास करेंगी। वह परशुराम से मिलने साल में एक बार आएंगी।

 

कहते हैं कि इसके बाद से ही झील का नाम रेणुका झील पड़ा। उसी समय से इसकी आकृति भी महिला के आकार में ढल गई। पुराणों में भी इसका जिक्र किया गया है।

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मान्यता है कि दशमी से एक दिन पहले मां परशुराम से मिलने आती है। इसके लिए यहां मेले में विशाल शोभा यात्रा भी निकाली जाती है। झील के पवित्र पानी में लाखों श्रद्घालु स्नान करते हैं। यहां पांच दिन का रेणुका मेला भी मनाया जाता है।

 


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श्रीखंड महादेव :भस्मासुर से बचने के लिए यहां छिपे थे भोलेनाथ, रो पड़ीं थी मां पार्वती

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श्रीखंड महादेव – अमरनाथ से भी कठिन है महादेव की यह यात्रा

लगभग 18500 फीट की ऊंचाई पर स्थित श्रीखंड महादेव की कहानी बड़ी ही रोचक है तभी तो हर कोई यहां जाना चाहता है। कहते हैं भस्मासुर राक्षस ने यहां तपस्या की और भगवान शिव से वरदान मांगा। वरदान यह था कि जिसके सिर पर भी वह अपना हाथ रखेगा वह भस्म हो जाएगा।

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मगर अहंकार में भस्मासुर भगवान शिव के ही पीछे पड़ गया। मजबूरन भोलेनाथ को इन पहाड़ की गुफाओं में छिपना पड़ा। राक्षस के डर से पार्वती यहां रो पड़ीं। कहते हैं कि उनके अश्रुओं से यहां नयनसरोवर का निर्माण हुआ। इसकी एक एक धार यहां से 25 किमी नीचे भगवान शिव की गुफा निरमंड के देव ढांक तक गिरती है। बाद में भस्मासुर का वध किया गया। श्रीखंड यात्रा के दौरान लोग इस सरोवर पर जाना नहीं भूलते।

 

एक कथा के अनुसार जब पांडवों को 13 वर्ष का वनवास हुआ तो उन्होंने कुछ समय यहां बिताया। इसके साक्ष्य वहां भीम द्वारा बड़े-बड़े पत्थरों का काटकर रखना बताया जाता है। उन्होंने यहां एक राक्षस को मारा था, जो यहां आने वाले भक्तों को मार खाता था।

 

राक्षस का लाल रक्त जब जमीन पर पड़ा तो उस जगह की जमीन रंग लाल हो गई। यह आज भी वहां लाल रंग में मौजूद है। भीमडवार पहुंचने के बाद रात के समय यहां कई जड़ी-बूटियां चमक उठती हैं। भक्तों का दावा है कि इनमें से कई संजीवनी बूटी भी मौजूद है।

 

यात्रा के दौरान पार्वती बाग भी रास्ते में पड़ता है। कहते हैं यह बाग मां पार्वती से जुड़ा हुआ है। यहां रंग बिरंगे फूल आज भी खिलते हैं। ये फूल इस स्‍थान के अलावा और कहीं नहीं मिलते।

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करीब 32 किलोमीटर लंबी इस यात्रा में बर्फीले और जड़ी-बूटियों से लदे पहाड़ आते हैं। सुंदर और मनमोहक शीतलमंद सुगंधित वायु चलती है। शिव आराधना करते भक्त संकरे मार्ग पर आगे बढ़ते जाते हैं। इस बार यात्रा पर वही भक्त जा पाएंगे, जो मेडिकल में फिट होंगे। यात्रा पर जाने के लिए हर यात्री को 50 रुपये में पंजीकरण करवाना होगा।


श्रीखंड महादेव : एक मिलती जुलती ये कहानी भी चर्चा में है

श्रीखंड महादेव, भगवान शिव का ये सबसे पूजनीय स्‍थल माना जाता है। इसकी कहानी भी बड़ी ही रोचक है। भगवान शिव को कई महीनों तक मजबूरी में यहां की गुफा में छिपना पड़ा था।यह श्रीखंड महादेव सदियों से भगवान शिव के विशाल शिवलिंग रूप का गवाह बनता रहा है। भगवान शिव को यहां अपने एक भक्त की वजह से छिपना पड़ा था।

 

कहा जाता है कि भस्मासुर नामक राक्षस ने कई वर्षों तक भगवान शिव की कड़ी तपस्या की थी। उसकी तपस्या से खुश होकर भगवान भोलेनाथ ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा।

 

भस्मासुर ने कहा कि उसे ऐसा वरदान चाहिए कि जिस जीव के सिर पर भी वह हाथ रखेगा वह उसी समय भस्म हो जाएगा। भोलेनाथ भगवान ने भी उसे यह वरदान दे दिया।

 

वरदान पाने के बाद भस्मासुर घमंड से भर गया। उसने भगवान शिव को ही जलाने की तैयारी कर ली। इससे बचने के लिए भगवान शिव को निरंमंड के देओढांक में स्थित एक गुफा में छिपना पड़ा। कई महीनों तक भगवान शिव को यहां रहना पड़ा।

 

उधर, भगवान विष्‍णु ने भगवान शिव को बचाने और भस्मासुर का खात्मा करने के लिए मोहिनी नाम की एक सुंदर महिला का रूप धारण कर लिया। भस्मासुर भी इसके सौंदर्य को देखकर मोहित हो गया।

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मोहिनी ने भस्मासुर को अपने साथ नृत्य करने को कहा। भस्मासुर भी तैयार हो गया। वह मोहिनी के साथ नृत्य करने लगा। इसी बीच चतुराई दिखाते हुए मोहिनी ने नृत्य के दौरान अपना हाथ सिर पर रखा। इसे देखकर भस्मासुर ने जैसे ही अपना हाथ अपने सिर पर रखा वह उसी समय राख में बदल गया।

 

भस्मासुर का नाश होने के बाद सभी देवता देओ ढांक पहुंचे और भगवान शिव को यहां से बाहर आने की प्रार्थना की। मगर भोलेनाथ एक गुफा में फंस गए। यहां से वह बाहर नहीं निकल पा रहे थे। वह एक गुप्त रास्ते से होते हुए इस पर्वत की चोटी पर शक्ति रूप में प्रकट हो गए।

 

जब भगवान शिव यहां से जाने लगे तो यहां एक जोरदार धमाका हुआ जिसके बाद शिवलिंग आकार की एक विशाल शिला बच गई। इसे ही शिवलिंग मानकर उसके बाद पूजा जाने लगा। इसकेसाथ ही दो बड़ी चट्टाने हैं जिन्हें मां पार्वती और भगवान गणेश के नाम से पूजा जाता है।

 

मार्ग में पार्वती बाग नाम की जगह आती है। ऐसा माना जाता है कि सबसे दुर्लभ ब्रह्म कमल भी यहीं पाए जाते हैं। यहां पार्वती झरना भी दर्शनीय है। मां पार्वती इस झरने का स्नानागार के रूप में इस्तेमाल करती थीं।

 

श्रीखंड महादेव जाते वक्त रास्ते में खास तरह की चट्टानें भी मिलती हैं जिन पर कुछ लेख लिखे हैं। कहा जाता है भीम ने स्वर्ग जाने के लिए सीढ़ियां बनाने के लिए इनका इस्तेमाल किया था। मगर समय की कमी के कारण पूरी सीढ़ियां नहीं बन पाई।


श्रीखंड महादेव : विभिन्न स्थानों से दूरी

श्रीखंड महादेव पहुंचने के लिए शिमला जिला के रामपुर से कुल्लू जिला के निरमंड होकर बागीपुल और जाओं तक गाड़ियों और बसों में पहुंचना पड़ता है। जहां से आगे करीब तीस किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी होती है।

शिमला से रामपुर – 130 किमी
रामपुर से निरमंड – 17 किलोमीटर
निरमंड से बागीपुल – 17 किलोमीटर

बागीपुल से जाओं – करीब 12 किलोमीटर


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शंगचुल महादेव मंदिर, कुल्लू

हिमाचल प्रदेश जितना अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण जाना जाता है उतना ही यहां की परंपराओं के कारण भी। आज हम आपको बता रहा है कुल्लू के शांघड़ गांव के देवता शंगचुल महादेव के बारे में जो घर से भागे प्रेमी जोड़ों को शरण देते हैं।

 

आप लोगों को यह जान कर हैरानी होगी कि घर से भागे जिन प्रेमियों को कहीं दुनिआ के किसी कोने में सहारा नहीं मिलता उन्हें भगवान् भोले नाथ अपने शंगचुल महादेव नामक धाम में आश्रय देते हैं. मान्यता है की भगवान् शिव स्वयं इन प्रेमियों की रक्षा करते हैं

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पांडव कालीन शांघड़ गांव में कई ऐतिहासिक धरोहरें हैं। इन्ही में से एक हैं यहां का शंगचुल महादेव मंदिर। शंगचूल महादेव की सीमा में किसी भी जाति के प्रेमी युगल अगर पहुंच जाते हैं तो फिर जब तक वह इस मंदिर की सीमा में रहते हैं उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यहां तक की प्रेमी युगल के परिजन भी उससे कुछ नहीं कह सकते। शंगचुल महादेव मंदिर का सीमा क्षेत्र करीब 100 बीघा का मैदान है। जैसे ही इस सीमा में कोई प्रेमी युगल पहुंचता है वैसे ही उसे देवता की शरण में आया हुआ मान लिया जाता है।

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अपनी विरासत के नियमों का पालन कर रहे इस गांव में पुलिस के आने पर भी प्रतिबंध है। इसके साथ ही यहां शराब, सिगरेट और चमड़े का सामान लेकर आना भी मना है। न कोई हथियार लेकर यहां प्रवेश कर सकता है और न ही किसी प्रकार का लड़ाई झगड़ा तथा ऊंची आवाज में बात नहीं कर सकता है। यहां देवता का ही फैसला मान्य होता है।

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शंगचुल महादेव : पांडवों ने भी ली थी महादेव की शरण यहां

यहां भागकर आए प्रेमी युगल के मामले निपट ही नहीं जाते तब तक शंगचुल महादेव मंदिर के पंडित प्रेमी युगलों की खातिरदारी करते हैं। गांव में ऐसा कहा जाता है कि अज्ञातवास के समय पांडव यहां कुछ समय के लिए रूके थे। कौरव उनका पीछा करते हुए यहां आ गए। तब शंगचुल महादेव ने कौरवों को रोका और कहा कि यह मेरा क्षेत्र है और जो भी मेरी शरण में आएगा उसका कोई कुछ बिगाड़ सकता। महादेव के डर से कौरव वापस लौट गए। तब से लेकर आज तक जब भी कोई समाज का ठुकराया हुआ शख्स या प्रेमी जोड़ा यहां शरण लेने के लिए पहुंचता है, महादेव उसकी देखरेख करते हैं।

 


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किन्नर कैलाश सदियों से हिंदू व बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए आस्था का केंद्र है। इस यात्रा के लिए देश भर से लाखों भक्त किन्नर कैलाश के दर्शन के लिए आते हैं। किन्नर कैलाश पर प्राकृतिक रूप से उगने वाले ब्रह्म कमल के हजारों पौधे देखे जा सकते हैं।

भगवान शिव की तपोस्थली किन्नौर के बौद्ध लोगों और हिंदू भक्तों की आस्था का केंद्र किन्नर कैलाश समुद्र तल से लगभग 17000 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। किन्नर कैलाश स्थित शिवलिंग की ऊंचाई 40 फीट और चौड़ाई 16 फीट है। हर वर्ष सैकड़ों शिव भक्त जुलाई व अगस्त में जंगल व खतरनाक दुर्गम मार्ग से हो कर किन्नर कैलाश पहुचते हैं। किन्नर कैलाश की यात्रा शुरू करने के लिए भक्तों को जिला मुख्यालय से करीब सात किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-5 स्थित पोवारी से सतलुज नदी पार कर तंगलिंग गांव से हो कर जाना पडता है।

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गणेश पार्क से करीब पाच सौ मीटर की दूरी पर पार्वती कुंड है। इस कुंड के बारे में मान्यता है कि इसमें श्रद्धा से सिक्का डाल दिया जाए तो मुराद पूरी होती है। भक्त इस कुंड में पवित्र स्नान करने के बाद करीब 24 घंटे की कठिन राह पार कर किन्नर कैलाश स्थित शिवलिंग के दर्शन करने पहुचते हैं। वापस आते समय भक्त अपने साथ ब्रह्मा कमल और औषधीय फूल प्रसाद के रूप में लाते हैं।

1993 से पहले इस स्थान पर आम लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध था। 1993 में पर्यटकों के लिए खोल दिया गया। यहां 40 फीट ऊंचे शिवलिंग हैं। यह हिंदू और बौद्ध दोनों के ‍लिए पूजनीय स्थल है। इस शिवलिंग के चारों ओर परिक्रमा करने की इच्‍छा लिए हुए भारी संख्‍या में श्रद्धालु यहां पर आते हैं।

किन्नर कैलाश : पौराणिक महत्व

किन्नर कैलाश के बारे में अनेक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। कुछ विद्वानों के विचार में महाभारत काल में इस कैलाश का नाम इन्द्रकीलपर्वत था, जहां भगवान शंकर और अर्जुन का युद्ध हुआ था और अर्जुन को पासुपातास्त्रकी प्राप्ति हुई थी। यह भी मान्यता है कि पांडवों ने अपने वनवास काल का अन्तिम समय यहीं पर गुजारा था। किन्नर कैलाश को वाणासुर का कैलाश भी कहा जाता है।

क्योंकि वाणासुरशोणित पुरनगरी का शासक था जो कि इसी क्षेत्र में पड़ती थी। कुछ विद्वान रामपुर बुशैहर रियासत की गर्मियों की राजधानी सराहन को शोणितपुर नगरी करार देते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि किन्नर कैलाश के आगोश में ही भगवान कृष्ण के पोते अनिरुधका विवाह ऊषा से हुआ था।

किन्नर कैलाश : रंग बदलता है शिवलिंग

शिवलिंग की एक चमत्कारी बात यह है कि दिन में कई बार यह रंग बदलता है। सूर्योदय से पूर्व सफेद, सूर्योदय होने पर पीला, मध्याह्न काल में यह लाल हो जाता है और फिर क्रमश:पीला, सफेद होते हुए संध्या काल में काला हो जाता है। क्यों होता है ऐसा, इस रहस्य को अभी तक कोई नहीं समझ सका है।

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किन्नौर वासी इस शिवलिंग के रंग बदलने को किसी दैविक शक्ति का चमत्कार मानते हैं, कुछ बुद्धिजीवियों का मत है कि यह एक स्फटिकीय रचना है और सूर्य की किरणों के विभिन्न कोणों में पडने के साथ ही यह चट्टान रंग बदलती नजर आती है।

हिमाचल का बदरीनाथ

किन्नर कैलाश को हिमाचल का बदरीनाथ भी कहा जाता है और इसे रॉक कैसल के नाम से भी जाना जाता है। इस शिवलिंग की परिक्रमा करना बडे साहस और जोखिम का कार्य है। कई शिव भक्त जोखिम उठाते हुए स्वयं को रस्सियों से बांध कर यह परिक्रमा पूरी करते हैं। पूरे पर्वत का चक्कर लगाने में एक सप्ताह से दस दिन का समय लगता है।

ऐसी मान्यता भी है कि किन्नर कैलाश की यात्रा से मनोकामनाएं तो पूरी होती ही हैं। यहां से दो किलोमीटर दूर रेंगरिकटुगमा में एक बौद्ध मंदिर है। यहां लोग मृत आत्माओं की शांति के लिए दीप जलाते हैं। यह मंदिर बौद्ध व हिन्दू धर्म का संगम भी है। भगवान बुद्ध की अनेक छोटी-बडी मूर्तियों के बीच दुर्गा मां की भव्य मूर्ति भी स्थित है।


ऐसे शुरू होती है यात्रा- पहला दिन

सबसे पहले सभी यात्रियों को इंडो तिब्‍बत बार्डर पुलिस पोस्‍ट पर यात्रा के लिए अपना पंजीकरण कराना होता है। यह पोस्‍ट 8,727 फीट की ऊंचाई पर है। यह किन्‍नौर जिला मुख्‍यालय रेकांग प्‍यो से 41 किमी की दूरी पर है। उसके बाद लांबार के लिए प्रस्‍थान करना होता है। यह 9,678 फीट की ऊंचाई पर है। जो 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां जाने के लिए खच्‍चरों का सहारा लिया जा सकता है।

दूसरा दिन

इसके उपरांत 11,319 फीट की ऊंचाई पर स्थित चारांग के लिए चढ़ाई करनी होती है। जिसमें कुल 8 घंटे लगते हैं। लांबार के बाद ज्‍यादा ऊंचाई के कारण पेड़ों की संख्‍या कम होती जाती है। चारांग गांव के शुरू होते ही सिंचाई और स्‍वास्‍थ्‍य विभाग का गेस्‍ट हाउस मिलता है, जिसके आसपास टेंटों में यात्री विश्राम करते हैं। इसके बाद 6 घंटे की चढ़ाई वाला ललांति (14,108) के लिए चढ़ाई शुरू हो जाती है।

तीसरा दिन

चारांग से 2 किलोमीटर की ऊंचाई पर रंग्रिक तुंगमा का मंदिर स्थित है। इसके बारे में यह कहा जाता है कि बिना इस मंदिर के दर्शन किए हुए परिक्रमा अधूरी रहती है। इसके बद 14 घंटे लंबी चढ़ाई की शुरूआत हो जाती है।

चौथा दिन

इस दिन एक ओर जहां ललांति दर्रे से चारांग दर्रे के लिए लंबी चढ़ाई करनी होती है, वहीं दूसरी ओर चितकुल देवी की दर्शन हेतु लंबी दूरी तक उतरना होता है.


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कैलाश पर्वत मणिमहेश, रहस्यमयी पहाड़, जिस पर चढ़ने की बात से भी कांपते हैं लोग, जानिए क्या है वास्तविकता:   भगवान शिव से जुड़े देश भर में ऐसे कई स्‍थान हैं जो भोलेनाथ के चमत्कारों के गवाह रहे हैं। ऐसी ही एक जगह है मणिमहेश। कहते हैं भगवान शिव ने यहीं…..Read More!

 

एक गुफा में है गणेश जी के कटे हुए स‌िर का रहस्य

हिंदू धर्म में भगवान गणेश जी को प्रथम पूज्य माना गया है। गणेश जी के जन्म के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव ने क्रोधवश गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया था, बाद में माता पार्वतीजी के कहने पर….Read More!

 

शिव बाड़ी :कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की नगरी, जानिए मंदिर से जुड़ा इतिहास और पुराण

शिव बाड़ी यानी शिव का वास स्थान। गगरेट स्थित प्राचीन द्रोण शिव मंदिर | कहते हैं कि यह स्थल महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की नगरी थी। यहां भगवान शिव का एवं भव्य मंदिर है।धारणा है कि शिव बाड़ी निर्माण स्वयं शिवजी ने किया था। कहते….Read More!

मणिमहेश : आज तक इस रहस्यमयी पहाड़ की ऊंचाई कोई नहीं नाप पाया

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कैलाश पर्वत मणिमहेश, रहस्यमयी पहाड़, जिस पर चढ़ने की बात से भी कांपते हैं लोग, जानिए क्या है वास्तविकता:

 

भगवान शिव से जुड़े देश भर में ऐसे कई स्‍थान हैं जो भोलेनाथ के चमत्कारों के गवाह रहे हैं। ऐसी ही एक जगह है मणिमहेश। कहते हैं भगवान शिव ने यहीं पर सदियों तक तपस्या की थी। इसके बाद से ये पहाड़ रहस्यमयी बन गया।स्‍थानीय लोग मानते हैं कि देवी पार्वती से शादी करने के बाद भगवान शिव ने मणिमहेश नाम के इस पहाड़ की रचना की थी।पहाड़ की चोटी पर एक शिवलिंग बना है। मान्यता है कि भगवान शिव ने यहां वास करने के लिए यह रूप धारण किया था। लोग आज भी इस शिवलिंग की पूजा करते हैं।

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ऐसा माना जाता है कि आज तक इस पहाड़ की ऊंचाई कोई नहीं नाप पाया। इस पहाड़ पर चढ़ना मुश्किल नहीं है लेकिन जो भी उपर गया वह वापस नहीं लौटा।

स्‍थानीय लोग व बुजुर्ग कहते हैं कि भले ही एवरेस्ट पर लोग चढ़ गए हों लेकिन इस पहाड़ पर चढ़ना इतना आसान नहीं है। कहते हैं एक बार एक गद्दी इस पहाड़ पर चढ़ गया था।

 

मगर चोटी पर पहुंचने से पहले ही ये पत्थर में बदल गया। इसके साथ जो भेड़ें थी वे भी पत्थर की बन गई। इसके कुछ मिलते जुलते पत्‍थर आज भी यहां पड़े हैं।

एक और मान्यता ये भी है कि एक बार एक सांप ने इस पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश की थी मगर वह भी पत्‍थर का बन गया था। इसके बाद किसी ने भी यहां चढ़ने की कोशिश तक नहीं की।

 

इस पहाड़ के नीचे पवित्र मणिमहेश झील है। लोग यहीं से इस चोटी के दर्शन करते हैं। कहते हैं कि चोटी का उपरी हिस्सा हमेशा बादलों से ढका रहता है। सिर्फ वही लोग इस चोटी के दर्शन करते हैं जो सच्‍ची श्रद्घा से भगवान शिव को याद करते हैं। कई लोगों को एक साथ दर्शन करने पर ये चोटी दिखाई नहीं देती।

 

यूं तो देश की ज्यादातर पहाडि़यों में कहीं न कहीं शिव का कोई स्थान मिल जाएगा, लेकिन शिव के निवास के रूप में सर्वमान्य कैलाश पर्वत के भी एक से ज्यादा प्रतिरूप पौराणिक काल से धार्मिक मान्यताओं में स्थान बनाए हुए हैं। तिब्बत में मौजूद कैलाश-मानसरोवर को सृष्टि का केंद्र कहा जाता है। वहां की यात्रा आर्थिक, शारीरिक व प्राकृतिक, हर लिहाज से दुर्गम है। उससे थोड़ा ही पहले भारतीय सीमा में पिथौरागढ़ जिले में आदि-कैलाश या छोटा कैलाश है। इसी तरह एक और कैलाश हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में है। ये दोनों कैलाश भी बड़े कैलाश की ही तरह शिव के निवास माने जाते हैं और इनका पौराणिक महात्म्य भी उतना ही बताया जाता है।

 

मणिमहेश-कैलाश

धौलाधार, पांगी व जांस्कर पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा यह कैलाश पर्वत मणिमहेश-कैलाश के नाम से प्रसिद्ध है और हजारों वर्षो से श्रद्धालु इस मनोरम शैव तीर्थ की यात्रा करते आ रहे हैं। यहां मणिमहेश नाम से एक छोटा सा पवित्र सरोवर है जो समुद्र तल से लगभग 13,500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। इसी सरोवर की पूर्व की दिशा में है वह पर्वत जिसे कैलाश कहा जाता है। इसके गगनचुम्बी हिमाच्छादित शिखर की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 18,564 फुट है। मणिमहेश-कैलाश क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में चम्बा जिले के भरमौर में आता है। चम्बा के ”गजटियर- 1904” में उपलब्ध जानकारी के अनुसार सन् 550 ईस्वी में भरमौर शहर सूर्यवंशी राजाओं के मरु वंश के राजा मरुवर्मा की राजधानी था।

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भरमौर में स्थित तत्कालीन मंदिर समूह आज भी उस समय के उच्च कला-स्तर को संजोये हुए अपना चिरकालीन अस्तित्व बनाए हुए हैं। इसका तत्कालीन नाम था ‘ब्रह्मपुरा’ जो कालांतर में भरमौर बना। भरमौर के एक पर्वत शिखर पर ब्रह्माणी देवी का तत्कालीन मंदिर है। यह स्थान ब्रह्माणी देवी की पर्याय बुद्धि देवी और इसी नाम के स्थानीय पर्याय नाम से प्रसिद्ध बुद्धिल घाटी में स्थित है। मणिमहेश- कैलाश भी बुद्धिल घाटी का ही एक भाग है।    मरु वंश के राजाओं का शासनकाल बहुत लंबा रहा।

 

वैसे तो कैलाश यात्रा का प्रमाण सृष्टि के आदि काल से ही मिलता है। फिर 550 ईस्वी में भरमौर नरेश मरुवर्मा के भी भगवान शिव के दर्शन-पूजन के लिए मणिमहेश कैलाश आने-जाने का उल्लेख मिलता है। लेकिन मौजूदा पारंपरिक वार्षिक मणिमहेश-कैलाश यात्रा का संबंध ईस्वी सन् 920 से लगाया जाता है। उस समय मरु वंश के वंशज राजा साहिल वर्मा (शैल वर्मा) भरमौर के राजा थे।

 

उनकी कोई संतान नहीं थी। एक बार चौरासी योगी ऋषि इनकी राजधानी में पधारे। राजा की विनम्रता और आदर-सत्कार से प्रसन्न हुए इन 84 योगियों के वरदान के फलस्वरूप राजा साहिल वर्मा के दस पुत्र और चम्पावती नाम की एक कन्या को मिलाकर ग्यारह संतान हुई। इस पर राजा ने इन 84 योगियों के सम्मान में भरमौर में 84 मंदिरों के एक समूह का निर्माण कराया, जिनमें मणिमहेश नाम से शिव मंदिर और लक्षणा देवी नाम से एक देवी मंदिर विशेष महत्व रखते हैं। यह पूरा मंदिर समूह उस समय की उच्च कला-संस्कृति का नमूना आज भी पेश करता है।

 

राजा साहिल वर्मा ने अपने राज्य का विस्तार करते हुए चम्बा (तत्कालीन नाम- चम्पा) बसाया और राजधानी भी भरमौर से चम्बा में स्थानांतरित कर दी। उसी समय चरपटनाथ नाम के एक योगी भी हुए।

 

चम्बा गजटियर में वर्णन के अनुसार योगी चरपटनाथ ने राजा साहिल वर्मा को राज्य के विस्तार के लिए उस इलाके को समझने में काफी सहायता की थी। गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण पत्रिका के शिवोपासनांक में छपे एक लेख के अनुसार मणिमहेश-कैलाश की खोज और पारंपरिक वार्षिक यात्रा आरंभ करने का श्रेय योगी चरपटनाथ को जाता है।

 

तभी से लगभग दो सप्ताह के मध्य की जाने वाली यह वार्षिक यात्रा श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) से श्रीराधाष्टमी (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी) के मध्य आयोजित की जाती है। हालांकि इस यात्रा के अलावा भी यहां जाया जा सकता है। निस्संदेह ही लगभग 15 किमी. की खड़ी पहाड़ी चढ़ाई कठिन है लेकिन रोमांच व रास्ते की प्राकृतिक सुंदरता इसमें आनंद जोड़ देते हैं।

 

यह यात्रा शुरू होती है हडसर (प्राचीन नाम हरसर) नामक स्थान से जो सड़क मार्ग का अंतिम पड़ाव है। यहां से आगे पहाड़ी मार्ग ही एकमात्र माध्यम है जिसे पैदल चलकर या फिर घोड़े-खच्चरों की सवारी द्वारा तय किया जाता है। किसी समय में पैदल यात्रा चम्बा से ही आरम्भ की जाती थी। सड़क बन जाने के बाद यह यात्रा भरमौर से आरंभ होती रही और अब यह साधारण तौर पर श्रद्धालुओं के लिए यह यात्रा हडसर से आरंभ होती है।

 

लेकिन यहां के स्थानीय ब्राह्मणों-साधुओं द्वारा आयोजित पारंपरिक छड़ी यात्रा तो आज भी प्राचीन परंपरा के अनुसार चम्बा के ऐतिहासिक लक्ष्मीनारायण मंदिर से ही आरंभ होती है। हडसर से मणिमहेश-कैलाश की दूरी लगभग 15 किलोमीटर है जिसके मध्य में धन्छो नामक स्थान पड़ता है। जहां भोजन व रात्रि विश्राम की सुविधा उपलब्ध होती है।

 

मणिमहेश : गौरीकुंड

धन्छो से आगे और मणिमहेश-सरोवर से लगभग डेढ़-दो किलोमीटर पहले गौरीकुंड है। पूरे पहाड़ी मार्ग में गैर सरकारी संस्थानों द्वारा यात्रियों के लिए नि:शुल्क लंगर सेवा उपलब्ध करायी जाती है। गौरीकुंड से लगभग डेढ़-दो किलोमीटर पर स्थित है मणिमहेश- सरोवर आम यात्रियों व श्रद्धालुओं के लिए यही अंतिम पड़ाव है। ध्यान देने की बात है कि कैलाश के साथ सरोवर का होना सर्वव्यापक है.

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तिब्बत में कैलाश के साथ मानसरोवर है तो आदि-कैलाश के साथ पार्वती कुंड और भरमौर में कैलाश के साथ मणिमहेश सरोवर। यहां पर भक्तगण सरोवर के बर्फ से ठंडे जल में स्नान करते हैं। फिर सरोवर के किनारे स्थापित श्वेत पत्थर की शिवलिंग रूपी मूर्ति (जिसे छठी शताब्दी का बताया जाता है) पर अपनी श्रद्धापूर्ण पूजा-अर्चना अर्पण करते हैं। इसी मणिमहेश सरोवर से पूर्व दिशा में स्थित विशाल और गगनचुंबी नीलमणि के गुण धर्म से युक्त हिमाच्छादित कैलाश पर्वत के दर्शन होते हैं।

 

हिमाचल पर्यटन विभाग द्वारा प्रकाशित प्रचार-पत्र में इस पर्वत को ”टरकोइज माउंटेन” लिखा है। टरकोइज का अर्थ है वैदूर्यमणि या नीलमणि। यूं तो साधारणतया सूर्योदय के समय क्षितिज में लालिमा छाती है और उसके साथ प्रकाश की सुनहरी किरणें निकलती हैं। लेकिन मणिमहेश में कैलाश पर्वत के पीछे से जब सूर्य उदय होता है तो सारे आकाशमंडल में नीलिमा छा जाती है और सूर्य के प्रकाश की किरणें नीले रंग में निकलती हैं जिनसे पूरा वातावरण नीले रंग के प्रकाश से ओतप्रोत हो जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि इस कैलाश पर्वत में नीलमणि के गुण-धर्म मौजूद हैं जिनसे टकराकर प्रकाश की किरणें नीली रंग जाती हैं।

 

पिंडी रूप में दृश्यमान शिखर

 

कैलाश पर्वत के शिखर के ठीक नीचे बर्फ से घिरा एक छोटा-सा शिखर पिंडी रूप में दृश्यमान होता है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह भारी हिमपात होने पर भी हमेशा दिखाई देता रहता है। इसी को श्रद्धालु शिव रूप मानकर नमस्कार करते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार वसंत ऋतु के आरंभ से और वर्षा ऋतु के अंत तक छह महीने भगवान शिव सपरिवार कैलाश पर निवास करते हैं और उसके बाद शरद् ऋतु से लेकर वसंत ऋतु तक छ: महीने कैलाश से नीचे उतर कर पतालपुर (पयालपुर) में निवास करते हैं।

 

इसी समय-सारिणी से इस क्षेत्र का व्यवसाय आदि चलता था। शीत ऋतु शुरू होने से पहले यहां के निवासी नीचे मैदानी क्षेत्रों में पलायन कर जाते थे। और वसंत ऋतु आते ही अपने मूल निवास स्थानों पर लौट आते थे। श्रीराधाष्टमी पर मणिमहेश-सरोवर पर अंतिम स्नान इस बात का प्रतीक माना जाता है कि अब शिव कैलाश छोड़कर नीचे पतालपुर के लिए प्रस्थान करेंगे।

 

इसी प्रकार फागुन मास में पड़ने वाली महाशिवरात्रि पर आयोजित मेला भगवान शिव की कैलाश वापसी के उपलक्ष्य में आयोजित किया जाता है। पर्यटन की दृष्टि से भी यह स्थान अत्यधिक मनोरम है। इस कैलाश पर्वत की परिक्रमा भी की जा सकती है, लेकिन इसके लिए पर्वतारोहण का प्रशिक्षण व उपकरण अति आवश्यक हैं।

 

सालाना मणिमहेश यात्रा हडसर नामक स्थान से शुरू होती है जो भरमौर से लगभग 17 किलोमीटर, चम्बा से लगभग 82 किलोमीटर और पठानकोट से लगभग 220 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पंजाब में पठानकोट मणिमहेश-कैलास यात्रा के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन है जो दिल्ली-उधमपुर मुख्य रेलमार्ग पर है। निकटतम हवाई अड्डा कांगड़ा है। हडसर हिमाचल राज्य परिवहन की बसों द्वारा भलीभांति जुड़ा हुआ है। पड़ोसी राज्यों व दिल्ली से भी चम्बा तक की सीधी बस सेवा सुलभ है।

 

ट्रैकिंग

 

पैदल मार्ग भी शिव के पर्वतीय स्थानों के साथ जुड़ी हुई शर्त है। कैलाश, आदि कैलाश या मणिमहेश कैलाश-सभी दुर्गम बर्फीले स्थानों पर हैं। इसलिए यहां जाने वालों के लिए एक न्यूनतम सेहत तो चाहिए ही। जरूरी गरम कपड़े व दवाएं भी हमेशा साथ होनी चाहिए। मणिमहेश झील के लिए सालाना यात्रा के अलावा भी जाया जा सकता है। मई, सितंबर व अक्टूबर का समय इसके लिए उपयुक्त है। रोमांच के शौकीनों के लिए धर्मशाला व मनाली से कई ट्रैकिंग रास्ते भी मणिमहेश झील के लिए खोज निकाले गए हैं।

 


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समुद्र तल से 2165 मीटर की ऊंचाई पर बसे सराहन गांव को प्रकृति ने पर्वतों की तलहटी में अत्यंत सुंदर ढंग से सुसज्जित किया है। सराहन को किन्नौर का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। यहां से 7 किलोमीटर नीचे सभी बाधाओं पर विजय पाकर लांघती और आगे बढ़ती सतलुज नदी है। इस नदी के दाहिनी ओर हिमाच्छादित श्रीखण्ड पर्वत श्रृंखला है। समुद्र तल से पर्वत की ऊंचाई 18500 फुट से अधिक है।

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माना जाता है कि यह पर्वत देवी लक्ष्मी के माता-पिता का निवास स्थान है। ठीक इस पर्वत के सामने सराहन के अमूल्य सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक भीमाकाली मंदिर अद्वितीय छटा लिए स्थित है। राजाओं का यह निजी मंदिर महल में बनवाया गया था जो अब एक सार्वजनिक स्थान है।

 

मंदिर के परिसर में भगवान रघुनाथ, नरसिंह और पाताल भैरव (लांकड़ा वीर) के अन्य महत्वपूर्ण मंदिर भी हैं। लांकड़ा वीर को मां भगवती का गण माना जाता है। यह पवित्र मंदिर लगभग सभी ओर से सेबों के बागों से घिरा हुआ है और श्रीखण्ड की पृष्ठभूमि में इसका सौंदर्य देखते ही बनता है।

 

बुशहर राजवंश

 

सराहन गांव बुशहर रियासत की राजधानी रहा है। इस रियासत की सीमाओं में पूरा किन्नर देश आता था। मान्यता है किन्नर देश ही कैलाश है। बुशहर राजवंश पहले कामरू से सारे प्रदेश का संचालन करता था। राजधानी को स्थानांतरित करते हुए राजाओं ने शोणितपुर को नई राजधानी के रूप में चुना। कल का शोणितपुर ही आज का सराहन माना जाता है।

 

अंत में राजा राम सिंह ने रामपुर को राज्य की राजधानी बनाया। बुशहर राजवंश की देवी भीमाकाली में अटूट श्रद्धा है। सराहन में आज भी राजमहल मौजूद है। {आप यह लेख Himachali Roots || www.himachali.in पर पढ़ रहे हैं}  एक पौराणिक गाथा के अनुसार  शोणितपुर का सम्राट वाणासुर उदार दिल और शिवभक्त था जो राजा बलि के सौ पुत्रों में सबसे बड़ा था।

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उसकी बेटी उषा को पार्वती से मिले वरदान के अनुसार उसका विवाह भगवान कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से हुआ। परंतु इससे पहले अचानक विवाह के प्रसंग को लेकर वाणासुर और श्रीकृष्ण में घमासान युद्ध हुआ था जिसमें वाणासुर को बहुत क्षति पहुंची थी। अंत में पार्वती जी के वरदान की महिमा को ध्यान में रखते हुए असुर राज परिवार और श्रीकृष्ण में सहमति हुई। तदोपरांत पिता प्रद्युम्न और पुत्र अनिरुद्ध के वंशजों की राज परंपरा चलती रही।

महल में स्थापित भीमाकाली मंदिर के साथ अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं जिनके अनुसार आदिकाल मंदिर के स्वरूप का वर्णन करना कठिन है परंतु पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि वर्तमान भीमाकाली मंदिर सातवीं-आठवीं शताब्दी के बीच बना है। भीमाकाली शिवजी की अनेक मानस पुत्रियों में से एक है। मत्स्य पुराण में भीमा नाम की एक मूर्ति का उल्लेख आता है।

 

एक अन्य प्रसंग है कि मां पार्वती जब अपने पिता दक्ष के यज्ञ में सती हो गई थीं तो भगवान शिव ने उन्हें अपने कंधे पर उठा लिया था। हिमालय में जाते हुए कई स्थानों पर देवी के अलग-अलग अंग गिरे। एक अंग कान शोणितपुर में गिरा और भीमाकाली प्रकट हुई। मंदिर के ब्राह्मणों के अनुसार पुराणों में वर्णन है कि कालांतर में देवी ने भीम रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया और भीमाकाली कहलाई। {आप यह लेख Himachali Roots || www.himachali.in पर पढ़ रहे हैं} कहा जाता है कि आदि शक्ति तो एक ही है लेकिन अनेक प्रयोजनों से यह भिन्न-भिन्न रूपों और नामों में प्रकट होती है जिसका एक रूप भीमाकाली है।

 

हिन्दू –बौद्ध शैलियों का संगम

 

सराहन में एक ही स्थान पर भीमाकाली के दो मंदिर हैं। प्राचीन मंदिर किसी कारणवश टेढ़ा हो गया है। इसी के साथ एक नया मंदिर पुराने मंदिर की शैली पर बनाया गया है। यहां 1962 में देवी मूर्ति की स्थापना हुई। इस मंदिर परिसर में तीन प्रांगण आरोही क्रम से बने हैं जहां देवी शक्ति के अलग-अलग रूपों को मूर्ति के रूप में स्थापित किया गया है। देवी भीमा की अष्टधातु से बनी अष्टभुजा वाली मूर्ति सबसे ऊपर के प्रांगण में है।

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भीमाकाली मंदिर हिंदू और बौद्ध शैली में बना है जिसे लकड़ी और पत्थर की सहायता से तैयार किया गया है। पगोडा आकार की छत वाले इस मंदिर में पहाड़ी शिल्पकारों की दक्षता देखने को मिलती है। द्वारों पर लकड़ी की सुंदर छिलाई करके हिंदू देवी-देवताओं के कलात्मक चित्र बनाए गए हैं। फूल पत्तियां भी दर्शाए गए हैं। मंदिर की ओर जाते हुए जिन बड़े-बड़े दरवाजों से गुजरना पड़ता है उन पर चांदी के बने उभरे रूप में कला के सुंदर नमूने देखे जा सकते हैं। {आप यह लेख Himachali Roots || www.himachali.in पर पढ़ रहे हैं} भारत के अन्य भागों की तरह सराहन में भी देवी पूजा बड़ी धूमधाम से की जाती है, विशेषकर चैत्र और आश्विन नवरात्रों में। मकर संक्रांति, रामनवमी, जन्माष्टमी, दशहरा और शिवरात्रि आदि त्योहार भी बड़े हर्षोल्लास व श्रद्धा से मनाए जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि भीमाकाली की प्राचीन मूर्ति पुराने मंदिर में ही है। हर कोई उसके दर्शन नहीं कर सकता। हिमाचल प्रदेश के भाषा व संस्कृति विभाग के एक प्रकाशन के अनुसार बुशहर रियासत तो बहुत पुरानी है ही, यहां का शैल (स्लेट वाला पत्थर) भी अत्यंत पुराना है।भूगर्भवेत्ताओं  के अनुसार यह शैल एक अरब 80 करोड़ वर्ष का है और पृथ्वी के गर्भ में 20 किलोमीटर नीचे था।

कैसे जाएँ

 

ठंडा, शीतल जलवायु वाला स्थान सराहन आज भी शायद देवी कृपा से व्यवसायीकरण से बचा हुआ है। तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को सुगमता से यहां ठहरने और खाने-पीने की सुविधाएं प्राप्त हो जाती हैं। हिमपात के समय भले ही कुछ कठिनाइयां आएं अन्यथा भीमाकाली मंदिर में वर्ष भर जाया जा सकता है। शिमला से किन्नौर की ओर जाने वाले हिंदुस्तान-तिब्बत राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 22 पर चलें तो एक बड़ा स्थान रामपुर बुशहर आता है जहां से सराहन 44 कि.मी. दूर है। कुछ आगे चलने पर ज्यूरी नामक स्थान से सराहन के लिए एक अलग रास्ता जाता है। ज्यूरी से देवी मंदिर की दूरी 17 कि.मी. है।

कुछ तथ्य